भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

उपनिषद् ३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५५५

नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तं पीठगं येऽनुयजन्ति धीरा- स्तेषां सिद्धिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ ९ ॥ एतद् विष्णोः परमं पदं ये नित्योद्युक्ताः संयजन्ते न कामात् । तेषामसौ गोपरूपः प्रयत्नात् प्रकाशयेदात्मपदं तदैव ॥ १० ॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यास्तस्मै गापयति स्म कृष्णः । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणममुं व्रजेत् ॥ ११ ॥ ॐकारान्तरितं ये जपन्ति गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुं तम् । तेषामसौ दर्शयेदात्मरूपं तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्त्यै ॥ १२ ॥ 'एकमात्र सबको वशमें रखनेवाले सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा स्तवन करने योग्य हैं। वे एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं। जो धीर भक्तजन पूर्वोक्त पीठपर विराजमान उन भगवान्‌का प्रतिदिन पूजन करते हैं, उन्हींको शाश्वत सुख प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं। जो नित्योंके भी नित्य हैं, चेतनोंके भी परम चेतन हैं और एक ही सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको पूर्वोक्त पीठमें स्थापित करके जो धीर पुरुष निरन्तर उनका पूजन करते हैं, उन्हींको सनातन सिद्धि प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। जो नित्य उत्साहपूर्वक उद्यत रहकर श्रीविष्णुके परमपदस्वरूप इस मन्त्रकी विधिपूर्वक पूजा करते हैं तथा भगवान्‌के सिवा दूसरी किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, उनके लिये वे गोपालरूपधारी भगवान् श्यामसुन्दर अपना स्वरूप तथा अपना परम धाम तत्काल ही प्रयत्नपूर्वक प्रकाशित कर देते हैं। जो श्रीकृष्ण सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं तथा निश्चय ही जो उनको वेदविद्या- का उपदेश करके उनसे उसका गान करवाते हैं, समस्त जीवोंकी बुद्धिको प्रकाश (ज्ञान) देनेवाले उन भगवान्‌की शरणमें मुमुक्षु पुरुष अवश्य जाय। जो साधक भगवान् गोविन्दके उस पाँच पदवाले सुप्रसिद्ध अष्टादशाक्षर मन्त्रको ॐकारसे सम्पुटित करके जपते हैं, उन्हींको वे भगवान् शीघ्र अपने स्वरूपका साक्षात्कार कराते हैं, अतः संसार-बन्धनसे छूटनेकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य नित्य शान्तिकी प्राप्तिके लिये अवश्य ही उक्त मन्त्रका जप करे' ॥ ८-१२ ॥ 'इस पाँच पदवाले मन्त्रसे ही और भी दशाक्षर आदि मन्त्र उत्पन्न हुए हैं, जो मनुष्योंके लिये कल्याणकारी हैं। उन दशाक्षर आदि मन्त्रोंको भी ऐश्वर्यकी इच्छावाले इन्द्र आदि देवता न्यास, ध्यान आदि यथावत् विधिके साथ जपते रहते हैं ॥ १३ ॥

तृतीय उपनिषद् अष्टादशाक्षरका अर्थ 'यदि ऐसी बात है तो इन भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप- भूत मन्त्रका अर्थ (अभिप्राय और प्रयोजन) क्या है? यह आप अपनी वाणीद्वारा समझाइये।' इस प्रकार उन सनकादि मुनियोंने पूछा। तब सब लोकोंमें विख्यात ब्रह्माजीने उनके उस प्रश्नके उत्तरमें इस प्रकार कहा-'मुनिवरो! सुनो, मुझ ब्रह्माकी जो दोपरार्धकी आयु होती है, उसे व्यतीत करता हुआ मै पूर्वकालमें भगवान्‌का निरन्तर ध्यान और स्तवन करता रहा। इस प्रकार जब एक परार्ध बीत गया, तब भगवान्‌का

षष्ठ आवरण-पूर्वमें 'इन्द्रनिधये नम', अग्निकोणमें 'नीलनिधये नम', दक्षिणमें 'स्कन्दाय नम', नैर्ऋत्यकोणमें 'मकराय नम', पश्चिममें 'आनन्दाय नम', वायव्यकोणमें 'कच्छपाय नम', उत्तरमें 'शङ्खाय नम' तथा ईशानकोणमें 'पद्मनिधये नम'-इस प्रकार पूजन करे। सप्तम आवरण-पूर्वमें पीतवर्ण इन्द्र, अग्निकोणमें रक्तवर्ण अग्नि, दक्षिणमें नीलोत्पलवर्ण यम, नैर्ऋत्यकोणमें कृष्ण- वर्ण राक्षसाधिपति निर्ऋति, पश्चिममें शुक्लवर्ण वरुण, वायव्यमें धूम्रवर्ण वायु, उत्तरमें नीलवर्ण कुवेर तथा ईशानकोणमें श्वेतवर्ण ईशानका नाम-मन्त्रद्वारा ही पूजन करे। अष्टम आवरण-पूर्व और ईशानके मध्यमें गोरोचनवर्ण ब्रह्मा, नैर्ऋत्यकोण और पश्चिमके मध्यमें शुक्लवर्ण शेषनाग, पूर्व दलमें पीतवर्ण वज्र, अग्निकोणवाले दलमें शुक्लवर्णा शक्ति, दक्षिण दलमें नीलवर्ण दण्ड, नैर्ऋत्य दलमें श्वेतवर्ण खड्ग, पश्चिम दलमें विद्युद्वर्ण पाश, वायव्य दलमें रक्तवर्ण ध्वज, उत्तर दलमें नीलवर्णा गदा तथा ईशान दलमें शुक्लवर्ण त्रिशूलकी नाम-मन्त्रद्वारा ही पूजा करे।

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