कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ * गोपालपूर्वतपनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ५ ध्यान मेरी ओर आकृष्ट हुआ, फिर वे दया करके गोपवेष-धारी श्यामसुन्दर पुरुषोत्तमके रूपमे मेरे सामने प्रकट हुए। तब मैने भक्तिपूर्वक उनके चरणोमे प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने दयार्द्र-हृदयसे मुझपर अनुग्रह करके सृष्टि-रचनाके लिये अपने स्वरूपभूत अष्टादशाक्षर मन्त्रका मुझे उपदेश दिया और तत्काल अन्तर्धान हो गये । फिर जब मेरे हृदयमे सृष्टिकी इच्छा हुई, तब अष्टादशाक्षर मन्त्रके उन सभी अक्षरोमे भावी जगत्के स्वरूपका दर्शन कराते हुए वे पुनः मेरे सम्मुख प्रकट हो गये। तब मैने इस मन्त्रमे जो 'क' अक्षर है, उससे जलकी, 'ल्' अक्षरसे पृथ्वीकी, 'ई' से अग्नि तत्त्वकी, अनुस्वारसे चन्द्रमाकी तथा इन सबके समुदाय-रूप 'क्लीं' से सूर्यकी रचना की। मन्त्रके द्वितीय पद 'कृष्णाय' से आकाशकी और आकाशमे वायुकी सृष्टि की। उसके बादवाले 'गोविन्दाय' पदमे कामधेनु गो तथा वेदादि विद्याओको प्रकट किया। उसके पश्चात् जो 'गोपीजनवल्लभाय' पद है, उससे स्त्री पुरुष आदिकी रचना की तथा सबसे अन्तमे जो 'स्वाहा' पद है, उसमे इस समस्त जड़-चेतनमय, चराचर जगत्को उत्पन्न किया ॥ १-२ ॥
चतुर्थ उपनिषद्
गोपाल-मन्त्रके जपकी महिमा, उससे गोलोक-धामकी प्राप्ति
इन भगवान् श्रीकृष्णके ही पूजन तथा उनके ॐकारसे सम्पुटित अष्टादशाक्षर मन्त्रके ही जपमे पूर्वकालमे राजर्षि चन्द्रध्वज मोहरहित होकर आत्मज्ञान प्राप्त करके असङ्ग हो गये ॥ १ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके उस परमधाम गोलोकको ज्ञानी एवं प्रेमी भक्तजन सदा देखते है। आकाशमे सूर्यकी भाँति वह परम व्योममें सब ओर व्याप्त तथा प्रकाशमान है। उस परम धामकी प्राप्ति पूर्वोक्त अष्टादशाक्षरमन्त्रके जपसे ही होती है, इसलिये इसका नित्य जप करे ॥ २-३ ॥
पञ्चम उपनिषद्
श्रीकृष्णका स्वरूप एवं उनका स्तवन
उक्त मन्त्रके विषयमें कुछ मुनिगण यों कहत ह—'जिसके प्रथम पद (क्लीं) से पृथ्वी, द्वितीय पद (कृष्णाय) से जल, तृतीय पद (गोविन्दाय) से तेज, चतुर्थ पद (गोपीजनवल्लभाय) से वायु तथा अन्तिम पाँचवें पद (स्वाहा) से आकाशकी उत्पत्ति हुई है, वह वैष्णव पञ्चमहाव्याहृतियो-वाला अष्टादशाक्षरमन्त्र श्रीकृष्णके स्वरूपको प्रकाशित करनेवाला है। उसका मोक्ष प्राप्तिके लिये सदा ही जप करते रहना चाहिये' ॥ १ ॥ इस विषयमे यह गाथा प्रसिद्ध है— जिस मन्त्रके प्रथम पदसे पृथ्वी प्रकट हुई, द्वितीय पदसे जलका प्रादुर्भाव हुआ, तृतीय पदसे तेजस्तत्त्वका प्राकट्य हुआ, चतुर्थ पदसे अग्नितत्त्व आविर्भूत हुआ तथा पञ्चम पदसे आकाशकी उत्पत्ति हुई, एकमात्र उसी अष्टादशाक्षर मन्त्रका निरन्तर अभ्यास (जप) करे। उसीके जपसे राजर्षि चन्द्रध्वज भगवान् श्रीकृष्णके अविनाशी परमधाम गोलोकको प्राप्त हो गये ॥ २-३ ॥ अत वह जो परम विशुद्ध, विमल, शोकरहित, लोभ आदिसे शून्य, सब प्रकारकी आसक्ति एव वासनासे वर्जित गोलोकधाम है, वह उक्त पाँच पदोंवाले मन्त्रसे अभिन्न है; तथा वह मन्त्र साक्षात् वासुदेवस्वरूप ही है, जिस वासुदेवसे भिन्न दूसरा कुछ भी नहीं है। वे एकमात्र भगवान् गोविन्द पञ्चपद मन्त्रस्वरूप है। उनका श्रीविग्रह सच्चिदानन्दमय है। वे वृन्दावनमे कल्पवृक्षके नीचे रत्नमय सिंहासनपर सदा विराजमान रहते हैं। मै मरुद्गणोंके साथ रहकर (इन) उत्तम स्तुतियोंद्वारा उन भगवान्को सतुष्ट करता हूँ ॥ ४-५ ॥ ॐ नमो विश्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे। विश्वेश्वराय विश्वाय गोविन्दाय नमो नम ॥ ६॥ नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे। कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ ७ ॥ नम कमलनेत्राय नम कमलमालिने । नम कमलनाभाय कमलापतये नम ॥ ८ ॥