भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 832 में से

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पृष्ठ 601

उपनिषद् ५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५५७


[वाम स्तम्भ]

बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे । रमामानसहंसाय गोविन्दाय नमो नम ॥ ९ ॥ कंसवंशविनाशाय केशिचाणूरघातिने । वृषभध्वजवन्द्याय पार्थसारथये नम ॥ १० ॥ वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डलधारिणे ॥ ११ ॥ वल्लवीनयनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नमः ॥ १२ ॥ नम पापप्रणाशाय गोवर्द्धनधराय च । पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्तासुहारिणे ॥ १३ ॥ निष्कलाय विमोहाय शुद्धयाशुद्धवैरिणे । अद्वितीयाय महते श्रीकृष्णाय नमो नम ॥ १४ ॥ प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर । आधिव्याधिभुजङ्गेन दष्टं मामुद्धर प्रभो ॥ १५ ॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर । संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥ १६ ॥ केशव क्लेशहरण नारायण जनार्दन । गोविन्द परमानन्द मा समुद्धर माधव ॥ १७ ॥

'सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो विश्वके पालन और सहारेके एकमात्र कारण हैं तथा जो स्वयं ही विश्वरूप और इस विश्वके अधीश्वर हैं, उन भगवान् गोविन्दको बारंबार नमस्कार है। जो विज्ञानस्वरूप और परमानन्दमयविग्रह हैं तथा जो जीवमात्रको अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले हैं, गोपसुन्दरियोंके प्राणनाथ उन भगवान् गोविन्दको प्रणाम है, प्रणाम है। जो नेत्रोंमें कमलकी शोभा धारण करते और कण्ठमें कमलपुष्पोंकी माला पहनते हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है तथा जो कमला—लक्ष्मी, लक्ष्मीरूपा गोपाङ्गनाओं-के तथा श्रीराधाके प्राणेश्वर हैं, उन भगवान् श्यामसुन्दरको नमस्कार है, नमस्कार है। मस्तकपर मोरपखका मुकुट धारण करके जो परम सुन्दर दिखायी देते हैं, जिनमें सबका मन रमण करता है, जिनकी बुद्धि एव स्मरणशक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती, तथा जो लक्ष्मी, गोपसुन्दरीगण तथा श्रीराधाके मानसमें विहार करनेवाले राजहंस हैं, उन भगवान् गोविन्दको बारंबार प्रणाम है। जो कंसके वंशका विध्वंस करनेवाले तथा केशी और चाणूरके विनाशक हैं, भगवान् शङ्करके भी जो वन्दनीय हैं, उन पार्थ-सारथि भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । अधरोंपर बाँसुरी रखकर उसे बजाते


[दक्षिण स्तम्भ]

रहना जिनका स्वाभाविक गुण है, जो गौओंके पालक तथा कालियनागका मान-मर्दन करनेवाले हैं, कालिन्दीके रमणीय तटपर कालियह्रदमें नागके फणोंपर चञ्चलगतिसे जिनकी अविराम लास्य-लीला हो रही है, अतएव जिनके कानोंमें धारण किये हुए कुण्डल हिलते हुए झलमला रहे हैं, सहस्रों गोपसुन्दरियोंके निर्निमेष नेत्र जिनके श्रीअङ्गोंमें प्रतिबिम्बित होकर विकसित कमल पुष्पोंकी मालासदृश शोभा पा रहे हैं तथा जो नृत्यमें संलग्न होकर अतिशय शोभायमान दिखायी देते हैं, उन शरणागत जनोंके प्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम है, प्रणाम है। जो पाप और पापात्मा असुरोंके विनाशक हैं, ब्रजवासियोंकी रक्षाके लिये हाथपर गोवर्धन धारण करते हैं, पूतनाके प्राणान्तकारक तथा तृणावर्त असुरके प्राण संहारक हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो कला (अवयव) से रहित हैं, जिनमें मोहका सर्वथा अभाव है, जो स्वरूपसे ही परम विशुद्ध हैं, अशुद्ध-(स्वभाव तथा आचरणवाले) असुरोंके शत्रु हैं, तथा जिनसे बढ़कर या जिनके समान भी दूसरा कोई नहीं है, उन सर्वमहान् परमात्मा श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार है। परमानन्दमय परमेश्वर ! मुझपर प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये ! प्रभो ! मुझे आधि (मानसिक व्यथा) और व्याधि (शारीरिक व्यथा) रूपी सर्पोंने डस लिया है, कृपया मेरा उद्धार कीजिये। हे कृष्ण ! हे रुक्मिणीवल्लभ ! हे गोपसुन्दरियोंका चित्त चुरानेवाले श्यामसुन्दर ! मैं संसार-समुद्रमें डूब रहा हूँ। जगद्गुरो ! मेरा उद्धार कीजिये। हे केशव ! क्लेशहारी नारायण ! जनार्दन ! परमानन्दमय गोविन्द ! माधव ! मेरा उद्धार कीजिये' ॥ ६-१७ ॥

'मुनिवरो ! जिस प्रकार मैं इन प्रसिद्ध स्तुतियोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करता हूँ, उसी प्रकार तुमलोग भी पाँच पदोंवाले पूर्वोक्त मन्त्रका जप और श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए उनकी आराधनामें लगे रहो। इसके द्वारा संसार-समुद्रसे तर जाओगे।' इस प्रकार ब्रह्माजीने उन सनकादि मुनियोंको उपदेश दिया ॥ १८ ॥

जो इस पूर्वोक्त पञ्चपद-मन्त्रका सदा जप करता है, वह अनायास ही भगवान्‌के उस अद्वितीय परमपदको प्राप्त हो जाता है। भगवान्‌का वह परमपद गतिशील नहीं—नित्य स्थिर है, फिर भी वह मनसे भी अधिक वेगवाला है।