कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! राधा आदि गोपियोंका दुर्वासासे संवाद, दुर्वासाके द्वारा श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन एक समयकी बात है, सदा श्रीकृष्ण-मिलनकी ही अभिलाषा रखनेवाली व्रजकी गोपसुन्दरियाँ उनके साथ रात्रि व्यतीत करके प्रातःकाल उन सर्वेश्वर गोपालसे बोलीं तथा वे श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण भी उनसे बोले ॥ १ ॥ उनमें इस प्रकार बातचीत हुई—'प्यारे श्यामसुन्दर ! तुम हमे बताओ, हमे अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये किस ब्राह्मण- को इस समय भोजन देना चाहिये ?' गोपियोंका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्णने उत्तर दिया—'महर्षि दुर्वासाको भोजन देना उचित है' ॥ २ ॥ गोपियोंने पूछा—'प्यारे ! जहाँ जानेसे हमारा कल्याण होगा, वह मुनिवर दुर्वासाका आश्रम तो उस पार है । यमुनाका अगाध जल पार किये बिना हम वहाँ कैसे जायेंगी ?' ॥ ३ ॥ भगवान् बोले—तुमलोग यमुनाजीके तटपर जाकर कहना—'श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध हमारे श्यामसुन्दर पूर्ण ब्रह्मचारी हैं।' यों कहनेपर यमुनाजी तुम्हें पार जानेके लिये मार्ग दे देंगी । वह हूँ, जिससे सबकी उन्नति होती है । मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करनेसे अथाहकी भी थाह मिल जाती है। मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके अपवित्र भी पवित्र हो जाता है । मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके व्रतहीन भी व्रतधारी हो जाता है । मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके निष्काम आत्माराम भी सकाम (परम प्रेमी) हो जाता है। तथा मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके वेद-ज्ञानसे रहित पुरुष भी वेदज्ञ हो जाता है ॥ ४ ॥ कहते हैं, भगवान्का यह कथन सुनकर गोपसुन्दरियाँ महादेवजीके अगंभूत दुर्वासाका स्मरण करके—उन्हींको लक्ष्य करके वहाँसे चलीं, और श्रीकृष्णके वचनको दुहराकर सूर्यकन्या यमुनाके पार हो मुनिके परम पवित्र आश्रम- पर जा पहुँचीं । फिर उन सर्वश्रेष्ठ मुनिको, जो रुद्रके ही अंश थे, प्रणाम करके उन ब्राह्मणदेवताको दूध और घीके बने हुए मीठे और प्रिय पदार्थ देकर गोपाङ्गनाओं- ने सन्तुष्ट किया । प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासाने भोजन करके उच्छिष्ट अन्नका यथास्थान त्याग करके गोपियोंको यथेष्ट आशीर्वाद दे घर लौट जानेके लिये आज्ञा दी । तब गोप- सुन्दरियोंने पूछा—'हम सूर्यकन्या यमुनाको कैसे पार करके जायेंगी ?' ॥ ५-७ ॥ तब वे सुप्रसिद्ध मुनि बोले—मैं केवल दूबका ही भोजन करनेवाला हूँ, इस रूपमें मेरा स्मरण करनेसे यमुनाजी तुम्हें मार्ग दे देंगी ॥ ८ ॥ उन गोपसुन्दरियोंमें सुन्दर गुण और स्वभावकी दृष्टिसे सबसे श्रेष्ठ थीं गान्धर्वी—श्रीराधा । उन्होंने वहाँ आयी हुई उन सभी गोपियोंके साथ विचार करके मुनिवर दुर्वासासे इस प्रकार पूछा—'हमारे साथ नित्य विहार करनेवाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण कैसे ब्रह्मचारी हैं ? और अभी-अभी इतना पकवान