कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजन करनेवाले महर्षि दुर्वासा किस प्रकार केवल दूर्वा ही खाते हैं ?' ॥ ९-१० ॥ श्रीराधाको ही प्रधान बनाकर और उन्हें ही आगे करके अन्य गोपाङ्गनाएँ उन्हींके पीछे चुपचाप खड़ी हो गयी थीं ॥ ११ ॥ दुर्वासाने कहा—सुनो, आकाश शब्द-गुणसे युक्त है, परंतु परमात्मा शब्द और आकाश दोनोंसे भिन्न हैं। फिर भी वे उक्त गुणवाले आकाशमे उसके अन्तर्यामी आत्मा होकर निवास करते हैं । वह शब्दवान् आकाश उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता, वही परमात्मस्वरूप आत्मा मै हूँ, फिर मैं भोजन करनेवाला कैसे हो सकता हूँ। वायु स्पर्श-गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा स्पर्श और वायु दोनोंसे भिन्न हैं, फिर भी वे वायुमें उसके अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं । वह स्पर्शवान् वायुतत्त्व उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता । वही विशुद्ध आत्मा मैं भी हूँ, अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ । यह तेज रूप-गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा रूप और तेज दोनोंसे भिन्न हैं। फिर भी वे अग्निमे उनके अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं । वह अग्नि उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता । वही विशुद्ध आत्मा मैं हूँ। अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ। जल रस-गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा रस और जल दोनोंसे भिन्न हैं। तथापि वे उस जलमे अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं। जल उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता । वही विशुद्ध आत्मा मैं भी हूँ, अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ । यह पृथिवी गन्ध गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा गन्ध एव पृथिवी दोनोंसे भिन्न है । तथापि वे भूमिमे उसके अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं । भूमि उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानती । वही विशुद्ध आत्मा मैं हूँ, अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ । यह मन ही उन आकाश आदिके विषयमें सङ्कल्प-विकल्प करता है, यही उन विषयोंको ग्रहण करता है । जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया है, वहाँ किस विषयका आश्रय लेकर यह मन सङ्कल्प विकल्प करे अथवा किस विषयकी ओर जाय ? इसलिये मैं वही विशुद्ध आत्मा हूँ, फिर कैसे भोक्ता हो सकता हूँ ॥१२-१८॥ ये श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, जो तुम्हारे प्रियतम हैं, व्यष्टि और समष्टिके स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरोंके कारण हैं । सदा साथ रहनेवाले दो पक्षियोंकी भाँति जीवात्मा और परमात्मा एक दूसरेके नित्य सहचर हैं । इनमें जो परमात्माका अंश- भूत इतर जीव है, वह तो भोक्ता होता है, और उससे भिन्न साक्षात् परमात्मा ( श्रीकृष्ण ) साक्षीमात्र होते हैं । वृक्षके समान धर्मवाले नाशवान् शरीरमें वे दोनों रहते हैं । इनमें एक भोक्ता है और दूसरा अभोक्ता । पहला ( जीवात्मा ) तो भोक्ता है और दूसरा स्वतन्त्र ईश्वर ही अभोक्ता है । यह अभोक्ता परमेश्वर ही श्रीकृष्ण हैं । जिनमें मोक्ष और बन्धन देनेवाली विद्या और अविद्याका अस्तित्व हम नहीं जानते, जो विद्या और अविद्या दोनोंसे विलक्षण हैं तथा जो विद्यामय हैं, वे श्रीकृष्ण विषयी कैसे हो सकते हैं ? ॥ १९-२१ ॥ जो कामना ( विषयासक्ति ) से नाना प्रकारके भोगोंकी अभिलाषा करता है, वही कामी होता है, परंतु जो निश्चय- पूर्वक कामनाके बिना ही केवल प्रेमी भक्तोंके प्रेमवश उनके द्वारा अर्पित भोगोंको ग्रहण करनेकी इच्छा करता है, वह अकामी होता है—उसे कामना और आसक्तिसे दूर माना जाता है । ये श्रीकृष्ण जन्म और जरा ( बुढ़ापा ) आदि शारीरिक धर्मोंसे रहित हैं। ये स्थिर हैं—नित्य हैं, इनका छेदन नहीं हो सकता । वे जो सूर्यमण्डलमें विराजमान हैं, जो गोपोंमें रहते हैं, जो गौओंकी रक्षा करते हैं, जो ग्वालोंके भीतर हैं, जो सम्पूर्ण देवताओंमें भी अन्तर्यामीरूपमे स्थित हैं, सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जिनकी महिमाका गान किया जाता है, जो समस्त चराचर भूतोंमे व्याप्त होकर स्थित हैं तथा जो भूतोंकी सृष्टि भी करते हैं, वे भगवान् ही तुम्हारे स्वामी हैं ॥२२-२३॥ यह सुनकर वे गान्धर्वी नामसे प्रसिद्ध श्रीराधाजी बोलीं—'महर्षे ! ऐसे अद्भुत, अचिन्त्य महिमावाले गोपाल श्रीकृष्ण हमलोगोंके यहाँ कैसे प्रकट हो गये ? तथा आपने उन श्रीकृष्णका तत्त्व कैसे जाना? उनकी प्राप्तिका साधनभूत मन्त्र कौन सा है ? उन भगवान्का निवास स्थान कहाँ है ? वे देवकीजीके गर्भसे किस प्रकार उत्पन्न हुए ? इनके बड़े भैया बलरामजी कौन हैं ? तथा कैसे इन गोपालकी पूजा होती है ? प्रकृतिसे परे जो ये साक्षात् परमात्मा गोपाल हैं, किस प्रकार इस भूमिपर अवतीर्ण हुए ? यह सब स्पष्टरूपमे बताइये' ॥ २४ ॥ तब उन प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासाने श्रीराधासे कहा— यह बात सबको विदित है कि सृष्टिके आदिमे एकमात्र भगवान् नारायण ही विराजमान थे, जिनमें ये सम्पूर्ण लोक ओतप्रोत हैं । उनके मानसिक सङ्कल्पसे नाभिमे जो कमल प्रकट हुआ था, उससे कमलयोनि ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई । भगवान् नारायणने ब्रह्माजीसे तपस्या करवाकर उन्हें वरदान दिया ॥ २५-२६ ॥