कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 605, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 605
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५६१ [ स्तम्भ १ ] ब्रह्माजीने इच्छानुसार प्रश्न पूछनेका ही वरदान माँगा और भगवान् नारायणने वैसा वर उन्हें दे दिया ॥ २७ ॥ तदनन्तर उन विश्वविख्यात ब्रह्माजीने पूछा—'भगवन् ! समस्त अवतारोंमें कौन सा अवतार सबसे श्रेष्ठ है, जिससे सब लोक सन्तुष्ट हों, सम्पूर्ण देवता भी सन्तुष्ट हों, जिसका स्मरण करके मनुष्य इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं ? तथा इस श्रेष्ठ अवतारकी परब्रह्मरूपता कैसे सिद्ध हो सकती है ?' ॥२८॥ यह प्रश्न सुनकर उन प्रसिद्ध भगवान् नारायणने उन ब्रह्माजीसे कहा—'वत्स ! जैसे मेरु शिखरपर ( यमातिरिक्त सात लोकपालोंकी ) सात पुरियाँ हैं, जिन्हें सकामभावसे पुण्य करनेवाले पुरुष प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार इस भूगोल चक्रमें भी सात पुरियाँ हैं, जो निष्काम तथा सकाम—सभी प्रकारके लोगोंद्वारा सेवन करनेयोग्य हैं । ( सकाम भाववाले पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेके कारण वे 'सकाम्या' हैं, और निष्काम पुरुषोंको मोक्ष देनेवाली होनेके कारण 'निष्काम्या' हैं ।) उन सबके मध्यमे साक्षात् परब्रह्मरूप गोपालकी पुरी मथुरा है, अतः वह सम्पूर्ण देवताओं तथा समस्त भूतोंके लिये भी सकाम्या ( कामना पूर्ण करनेवाली ) और निष्काम्या ( मोक्षदायिनी ) है ॥ २९ ॥ निश्चय ही जिस प्रकार सरोवरमें कमल होता है, उसी प्रकार भूतलपर यह पुरी स्थित है । ( कमलकी कर्णिकाके स्थानपर तो यह पुरी है और दलोंके स्थानपर मधुवन आदि वन हैं ।) अवश्य ही मथुरापुरी भगवान् गोपालके चक्रद्वारा सुरक्षित है, इसलिये वह गोपाल पुरीके नामसे प्रसिद्ध है । विशाल बृहद्वन ( महावन ), मधुदैत्यके नामपर प्रसिद्ध मधुवन, ताड़के वृक्षोंसे सुशोभित तालवन, कमनीय श्रीकृष्णकी विहारस्थली काम्यवन ( कामवन ), कृष्ण प्रिया बहुलाके नामसे प्रसिद्ध बहुलावन, कुमुद-वृक्षोंसे उपलक्षित कुमुदवन, खदिर- वृक्षोंकी अधिकताके कारण प्रसिद्ध खदिरवन, जहाँ बलभद्रजी विचरते है—वह भद्रवन, 'भाण्डीर' नामक वटसे उपलक्षित भाण्डीरवन, लक्ष्मीका निवासभूत श्रीवन, लोहगन्धकी तपस्याका स्थान लोहवन, वृन्दादेवीसे सनाथ हुआ वृन्दावन—इन ( कमलदलोंके समान सुशोभित ) बारह वनोंसे वह मथुरापुरी घिरी हुई है । उस मथुरामण्डलके अन्तर्गत उपर्युक्त वनोंमें ही देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और किन्नर ( श्रीकृष्ण- प्रेमसे उन्मत्त हो ) गाते और नृत्य करते हैं । उन बारह [ पाद-टिप्पणी ] १. वे सात पुरियाँ हैं--अयोध्या, मथुरा, माया ( हरिद्वार ), काशी, काञ्ची, अवन्ती ( उज्जयिनी ) तथा द्वारकापुरी । उ० अ० ७१— [ स्तम्भ २ ] वनोंमें बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, सप्त ऋषि, ब्रह्मा, नारद, पाँच गणेश एव वीरेश्वर, रुद्रेश्वर, अम्बिकेश्वर, गणेश्वर, नीलकण्ठ, विश्वेश्वर, गोपलेश्वर तथा भद्रेश्वर आदि चौबीस शिवलिङ्गोंका निवास है । दो प्रमुख वन हैं— कृष्णवन और भद्रवन । इनके बीचमें ही पूर्वोक्त बारह वन हैं, जो परम पवित्र एव पुण्यमय है । उन्हींमें देवता रहते हैं । वहीं सिद्धगण तपस्या करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं । वहीं वलरामजीकी रमणीय राममूर्ति, प्रद्युम्न की प्रद्युम्नमूर्ति, अनिरुद्ध- की अनिरुद्धमूर्ति तथा श्रीकृष्णकी श्रीकृष्णमूर्ति विराजती है । इस प्रकार मथुरामण्डलके बारह वनोंमें भगवान्के बारह अर्चा विग्रह विराजमान हैं । इनमेंसे प्रथम मूर्तिका पूजन रुद्रगण करते हैं । दूसरी मूर्तिका पूजन स्वय ब्रह्माजी करते हैं । तीसरीकी पूजा ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि मुनि करते हैं । चौथे विग्रहकी आराधना मरुद्गण करते हैं । पाँचवें स्वरूपकी अर्चना विनायकगण करते हैं । छठे विग्रहकी पूजा वसुगण करते हैं । सातवेंकी आराधना ऋषि करते हैं । आठवी मूर्तिकी पूजा गन्धर्व करते हैं । नवें विग्रहका पूजन अप्सराएँ करती हैं । दसमी मूर्ति आकाशमें गुप्तरूपसे स्थित है । ग्यारहवीं अन्तरिक्षमें स्थित है और बारहवीं भूगर्भमें विराजती है । अर्चा-विग्रहोंका जो लोग पूजन करते हैं, वे मृत्युसे तर जाते हैं, मोक्ष पा लेते हैं, गर्भवास, जन्म, जरावस्था, मृत्यु तथा आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापके दुःखको लाँघ जाते है ॥ ३०-३८ ॥ इस विषयमे श्लोक भी है, जिनका भाव इस प्रकार है— जो ब्रह्मा आदि देवताओंसे सदा सेवित है, भगवान्के शङ्ख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग-धनुष निरन्तर जिसकी रक्षामें रहते हैं, जो बलभद्रजीके मुसल आदि शस्त्रोंसे भी सदा सुरक्षित है, उस परम रमणीय मथुरापुरीमें पहुँचकर ( भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे) । यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने अन्य तीन विग्रह— बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके साथ एव अपनी अन्तरङ्गा शक्ति श्रीरुक्मिणीजीके साथ सदा समाहित ( भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सतत सावधान ) रहते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण एकमात्र पूर्ण परमात्मा हैं, तो भी वे प्रणवकी मात्राओंके भेदसे चार नामोंसे प्रसिद्ध होते हैं । ( ॐकारकी चार मात्राएँ हैं—अ, उ, म् तथा अर्धमात्रा ।) इनमें अकारात्मक विश्वरूप तो बलरामजी है, उकारात्मक तैजसरूप प्रद्युम्न हैं, मकारात्मक प्राज्ञरूप अनिरुद्धजी हैं तथा अर्ध- मात्रात्मक तुरीयरूप भगवान् वासुदेव हैं ॥ ३९-४० ॥