कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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- गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् *
अतः रजोगुणसे अर्थात् त्रिगुणमयी प्रकृतिसे परेजो भगवान् गोपाल हैं, 'वह मैं ही हूँ'—इस प्रकार निश्चय करके अपने आत्मा- मे गोपालकी भावना करे । जो यों करता है, वह मोक्ष-सुख का अनुभव करता है, ब्रह्मभावको प्राप्त होता है तथा ब्रह्मवेत्ता होता है। जो गोपों अर्थात् जीवोंको सृष्टिसे लेकर प्रलयतक सदा ही आत्मीय मानकर स्वीकार करते तथा सदा उनकी रक्षा एव पालनमे सलग्न रहते हैं, वे प्रणववाच्य भगवान् ही गोपाल हैं । 'वे तत्, सत्, परब्रह्म श्रीकृष्ण ही मेरे आत्मा हैं, नित्यानन्दरूप जो गोपाल हैं, वह मै हूँ। ॐ वे गोपाल- देव ही तीनों कालोसे अबाधित परम सत्य है । वह मैं हूँ' --इस प्रकार अपने को लेकर मनसे भगवान्के साथ एकता करे । अपनेको इस भावसे देखे-अपने विषयमें यह निश्चय करे कि 'मै गोपाल हूँ—वे ही गोपाल, जो अव्यक्त, अनन्त एव नित्य हैं' ॥ ४१-४४ ॥ भगवान् कहते हैं—ब्रह्मन् ! मथुरापुरीमे मेरा निवास सदा ही बना रहेगा । निश्चय ही मै वहाँ शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे विभूषित होकर रहूँगा । ब्रह्मन् ! मेरा स्वरूप चिन्मय है, सर्वोत्कृष्ट और स्वप्रकाशरूप है, इसमें प्राकृत रूपकी गन्ध भी नहीं है । इस प्रकार जो सदा मेरे स्वरूपका चिन्तन करता है, वह निश्चय ही मेरे परमधामको प्राप्त होता है । जो मुख्यतः मथुरामण्डलमे अथवा जम्बूद्वीपके किसी भी प्रदेशमें रहकर मेरी प्रतिमाका सामग्रियोंद्वारा पूजन करता है तथा मेरा भी ध्यानके द्वारा समाराधन करता है, वह इस भूमण्डलपर मुझे सर्वाधिक प्रियहै। ब्रह्मन् ! मथुरार्ये में श्रीकृष्ण- रूपसे ही सदा वास करता हूँ, अतः वहाँ तुम्हे उसी रूपमे मेरा पूजन करना चाहिये । अधिकारभेदसे विभिन्न युगोका अनुसरण करनेवाले उत्तम बुद्धिसम्पन्न भक्तजन चार रूपोंमें मेरी उपासना-मेरा पूजन करते हैं। वे पीछे प्रकट हुए प्रद्युम्न और अनिरुद्धके साथ गोपाल श्रीकृष्णकी और बलरामकी पूजा करते हैं (ये ही चार व्यूह हैं) । इसके सिवा देवी रुक्मिणीके साथ उनके परम प्रियतम भगवान् वासुदेवकी भी पूजा करते हैं। (युग क्रमसे सत्ययुगमें श्वेतवर्ण बलरामकी, त्रेतामे रक्तवर्ण प्रद्युम्नकी, द्वापरमें पीतवर्ण अनिरुद्धकी और कलिमें श्यामवर्ण श्रीकृष्णकी आराधना करते हैं) ॥ ४५-४९ ॥ विद्वान् पुरुष ऐसी भावना करे कि 'मै नित्य अजन्मा गोपाल हूँ, सनातन प्रद्युम्न हूँ, बलराम हूँ तथा अनिरुद्ध हूँ।' इस प्रकार अपने आत्मारूपसे भगवान्का चिन्तन करके उनकी पूजा करे। मैंने वेद, पाञ्चरात्र तथा अन्यान्य शास्त्रोमें जो विभागपूर्वक वर्णाश्रम-धर्मका उपदेश दिया है, उसके अनुसार निष्काम भावमे स्वधर्मका अनुष्ठान करते हुए उसके द्वारा मेरा पूजन करना चाहिये । भद्रवन एव कृष्णवनके निवासियोको वहाँ विराजमान मेरे स्वरूपकी आराधना करनी चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ जो (सकाम या निष्काम) धर्माचरणसे प्राप्त होनेवाली (स्वर्ग-अपवर्गंरूप) मद्गतिसे वञ्चित ह (अतएव मनुष्य- रूपमें जन्मे ह), कलिकालने जिन्हें अपना ग्रास बना लिया है तथा जो मथुरामे रहकर मेरे भजनमें सलग्न रहते हैं, उनकी वहाँ अवश्य स्थिति होती है। (वे वहाँ रहनेके अधिकारी हैं तथा वहाँ रहकर भजन करनेसे उन्हे निश्चय ही अभीष्ट- सिद्धि प्राप्त होती है ।) ब्रह्मन् ! जैसे तुम अपने सनक- सनन्दन आदि पुत्रोके साथ स्नेहयुक्त सम्बन्ध रखते हो, जैसे महादेवजी प्रमथगणोंके साथ स्नेह सम्बन्ध रखते हैं तथा जैसे लक्ष्मीके साथ मेरा प्रेमपूर्ण सम्बन्ध हे, उसी प्रकार मेरा भक्त भी मुझे परम प्रिय है ॥ ५२ ५३ ॥ तदनन्तर उन पद्मसम्भव ब्रह्माजीने पूछा-'भगवन् ! एक ही देव-आप परमेश्वर चार देवताओं (चतुर्व्यूहों) के रूपमे कैसे हो गये ? और उसी प्रकार जो एक अक्षरके रूपमे विख्यात ॐकार है, वह अनेक अक्षर-अकार, उकार, मकार तथा अर्धमात्रा आदिके रूपमे कैसे हो गया ?' यह प्रश्न सुनकर भगवान् नारायणने उन प्रसिद्ध ब्रह्माजीमे कहा- सृष्टिके पूर्व एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही सर्वत्र विराजमान था । सर्गकालमें उस ब्रह्मसे अव्यक्त (अव्याकृत मूल प्रकृति) का प्रादुर्भाव हुआ । (अक्षर-अविनाशी ब्रह्मसे उत्पन्न होनेके कारण) अव्यक्त (प्रकृति) भी अक्षर (ब्रह्म) ही है। उस अक्षर अर्थात् अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ । महत्तत्त्वसे (सात्त्विक, राजस और तामस भेदवाला त्रिविध) अहङ्कार उत्पन्न हुआ । उस (तामस) अहङ्कारसे शब्द आदि पाँच तन्मात्राएँ प्रकट हुईं और उनसे क्रमश. आकाश आदि पाँच महाभूतोंकी सृष्टि हुई । (इसी प्रकार राजस अहङ्कारसे इन्द्रियों तथा सात्विक अहङ्कारसे उनके अधिष्ठाता देवोंकी उत्पत्ति हुई ।) इस प्रकार शरीर- इन्द्रिय आदिके रूपमे स्थित उन महत्तत्त्व आदिसे तथा भूतोंसे वह अक्षर परमात्मा आवृत्त है । (इन प्राकृत आवरणोसे छिपे हुए अक्षर परमात्माको प्राय. ससारी मनुष्य देख नहीं पाते । वास्तवमे वह अक्षर परमात्मा सर्व-