भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 832 में से

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पृष्ठ 609

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* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [Page 563: ५६३] [बायाँ स्तम्भ] का अन्तर्यामी आत्मा है, अतः उनको अपनेसे अभिन्न मान कर ऐसी भावना करनी चाहिये कि) 'मैं अक्षर हूँ—मैं साक्षात् अविनाशी परमात्मा हूँ, उन परमात्माका वाचक जो प्रणव ( ॐ ) अक्षर है, वह भी मैं हूँ। इसी प्रकार मैं अमर हूँ, निर्भय हूँ और अमृत हूँ। वह जो भयशून्य ब्रह्म है, निःसंदेह वह मैं हूँ। मैं मुक्त हूँ और अक्षर भी मैं हूँ।' (तात्पर्य यह कि जैसे एक ही ब्रह्म महत्तत्त्वादि रूपों- में प्रकट और अनन्त नाम रूपवाले जगत्‌के आकारमे प्रादुर्भूत हो गया, उसी प्रकार एक ही तत्त्व चतुर्व्यूहरूपमें प्रकट हुआ है और एक ही अक्षरसे अनेक अक्षरोंका भी आविर्भाव हुआ है।) नित्य सत्ता जिसका स्वरूप है, सम्पूर्ण विश्व जिसका ही आकार है तथा जो प्रकाशस्वरूप एव सर्वत्र व्यापक है, वह एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म अपनी लीलासे चार व्यूहोंके रूपोंमे प्रकाशित हो रहा है ॥ ५४ ॥ रोहिणीनन्दन बलरामजी प्रणवके 'अ' अक्षरके द्वारा प्रति- पादित होते हैं। ये जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी होनेके कारण 'विश्व' कहे गये हैं। स्वप्नावस्थाके अभिमानी प्रद्युम्नजी 'तैजस' कहलाते हैं। प्रणवके 'उ' अक्षरसे इनका ही बोध होता है। अनिरुद्धजी सुषुप्तिके अभिमानी 'प्राज्ञ' कहे गये हैं। प्रणवके 'म्' अक्षरसे इनका ही प्रतिपादन होता है। जहाँ यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, वे श्रीकृष्ण तुरीय तत्त्व हैं। इन्हें अर्धमात्रात्मक नादरूप या प्रणवका सम्पूर्ण स्वरूप बताया गया है। पूर्वोक्त विश्व, तैजस आदि इन्हींमें अन्तर्हित हैं ॥ ५५-५६ ॥ समस्त जगत्‌की रचना करनेवाली मूलप्रकृतिरूपा देवी रुक्मिणी श्रीकृष्णकी अन्तरङ्गा शक्ति हैं, अतएव श्रीकृष्ण- स्वरूपा हैं। गोपियोंके रूपमें प्रकट होनेवाली जो श्रुतियाँ हैं, उनकी अपेक्षा प्रणवके साथ ब्रह्मका अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध है, श्रुतियाँ और श्रुतिरूपा गोपियाँ दूरसे श्रीकृष्णका आराधन करती हैं, और प्रणव एव रुक्मिणी आदि शक्तियाँ ब्रह्मके साथ अभिन्नता रखती हैं। अतः ब्रह्मका साक्षात् वाचक प्रणव जिस प्रकार ब्रह्मकी प्रकृति है, उसी प्रकार रुक्मिणीको भी ब्रह्मसे साक्षात् सम्बन्ध रखनेके कारण ब्रह्मवादीजन प्रकृति ही बताते हैं। इसलिये सम्पूर्ण विश्वके आधारभूत भगवान् गोपाल ही ॐकाररूपमें प्रतिष्ठित हैं। ब्रह्मवादीजन 'क्लीम्' तथा ॐकारका एक ही अर्थमें पाठ करते हैं। (अतः कृष्णके बीजभूत 'क्लीम्' तथा 'ॐ'में अर्थतः कोई अन्तर [दायाँ स्तम्भ] नहीं है।) विशेषतः मथुरापुरीमें जो चतुर्भुजरूपमें मेरा ध्यान करता है, वह मोक्ष-सुखका अनुभव करता है ॥ ५७–५९ ॥ ध्यानका स्वरूप यों है—भक्तका अष्टदल हृदय-कमल प्रसन्नतासे विकसित है, उसमें भगवान् विराज रहे हैं। उनके दोनों चरण शङ्ख, ध्वजा और छत्रादिके चिह्नोंसे सुशोभित हैं। हृदयमें श्रीवत्स-चिह्न शोभा पा रहा है। वहीं कौस्तुभमणि अपनी अद्भुत प्रभासे प्रकाशित हो रही है। भगवान्‌के चार हाथ हैं। उनमें शङ्ख, चक्र, शार्ङ्गधनुष, पद्म और गदा—ये सुशोभित हैं। बाँहोंमें भुजबद शोभा दे रहा है। कण्ठ- में धारण की हुई वनमाला भगवान्‌की स्वाभाविक शोभाको और भी बढा रही है। मस्तकपर किरीट चमचमा रहा है और कलाइयोंमें चमकीले कङ्कण शोभा पा रहे हैं। दोनो कानोंमें मकराकृति कुण्डल झलमला रहे हैं। सुवर्णमय पीताम्बरसे सुशोभित श्यामसुन्दर श्रीविग्रह है। भगवान् इस मुद्रासे स्थित हैं, मानो अपने भक्तजनोंको अभय प्रदान कर रहे हैं। इस प्रकार प्रतिदिन मेरे चतुर्भुजरूपका मन ही मन चिन्तन करे। अथवा मुरली तथा सींग धारण करनेवाले मेरे द्विभुज रूप (श्रीकृष्ण-विग्रह) का ध्यान करे* ॥ ६०–६३ ॥ जिस ब्रह्मज्ञानसे सम्पूर्ण जगत् मथ डाला जाता है, उसके सार (विषय) परब्रह्म—लीला-पुरुषोत्तम जिस पुरीमें विराजमान रहते हों, उसे मथुरा कहते हैं। वहाँ आठ दिक्पालारूपी दलों- से विभूषित मेरा यह भूमिरूपी कमल जगत्‌के रूपमें प्रकाशित हो रहा है। यह कमल संसार-समुद्रसे ही प्रकट हुआ है तथा जिनका अन्तःकरण राग द्वेष आदिसे शून्य—पूर्णतः सम है, वे ही हंस या भ्रमररूपसे उस कमलका सेवन करते हैं। चन्द्रमा और सूर्यकी दिव्य किरणें पताकाएँ हैं और सुवर्ण- मय पर्वत मेरु मेरा ध्वज है। ब्रह्मलोक मेरा छत्र और नीचे- ऊपरके क्रमसे स्थित सात पाताल लोक मेरे चरण हैं। लक्ष्मी- का निवासभूत जो श्रीवत्स है, वह मेरा स्वरूप ही है। वह [पाद-टिप्पणी / श्लोक] * श्रीवत्सताञ्छन हृत्स्थ कौस्तुभ प्रभया युतम् । – चतुर्भुज शङ्खचक्रशार्ङ्गपद्मगदान्वितम् ॥ – सुकेयूरान्वित बाहु कण्ठ मालासुशोभितम् । द्युमत्किरीट वलय स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥ हिरण्मय सौम्यतनु स्वभक्तायाभयप्रदम् । ध्यायेन्मनसि मा नित्य वेणुशृङ्गधर तु वा ॥