भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 832 में से

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पृष्ठ 616

५७० * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ आहवनीय अग्नि है। वह तीसरी मात्रा ही इस सामका तीसरा चरण है। प्रणवके उच्चारणकी समाप्ति होनेपर उसकी चौथी मात्राके रूपमें जो नादात्मक अर्धमात्रा सुनायी देती है, उसीके अन्तर्गत सोमलोक नामक लोक, ॐकार वाच्य परब्रह्म देवता, अथर्व-मन्त्रोंसहित अथर्ववेद ही वेद, संवर्तकनामक अग्नि, मरुन्नामक देवताओंका गण तथा विराट् छन्द है। इस चतुर्थ मात्राविशिष्ट ॐकारके एक ही ऋषि हैं—ब्रह्माजी। यह चौथी मात्रा तुरीया ब्रह्म-स्वरूपा होनेके कारण परम प्रकाशमयी है। यही सामका चतुर्थ पाद है* ॥ १ ॥ अनुष्टुप्-मन्त्रका प्रथम चरण आठ अक्षरोंका है। शेष तीन चरण भी आठ-आठ अक्षरोंके ही हैं। इस प्रकार कुल बत्तीस अक्षर होते हैं। निश्चय ही अनुष्टुप्-वृत्ति बत्तीस अक्षरोंकी होती है। अनुष्टुप्से ही इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। अनुष्टुप्के द्वारा ही सबका उपसहार होता है। उस अनुष्टुप्-मन्त्रके पाँच अङ्ग हैं। इसके चार चरण ही चार अङ्ग हैं तथा प्रणवको साथ लेकर सम्पूर्ण मन्त्र पाँचवाँ अङ्ग होता है। हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, अस्त्राय फट्—इनमें शरीरके पाँच अङ्गोंका उल्लेख है। ऊपर अनुष्टुप्-मन्त्रके भी पाँच अङ्ग बताये गये हैं, अतः मन्त्रके प्रथम अङ्गका हृदय- रूप प्रथम अङ्गसे संयोग कराना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे अङ्गका दूसरे मस्तकरूप अङ्गसे, तीसरे अङ्गका तीसरे शिखारूप अङ्गसे, चतुर्थ अङ्गका चौथे उभय बाहुमूलरूप अङ्गसे और पञ्चम अङ्गका पाँचवें मस्तकरूप अङ्गसे सम्बन्ध होता है।† निश्चय ही ये सम्पूर्ण लोक एक दूसरेसे सम्बद्ध हैं, इसलिये उक्त अङ्ग भी परस्पर सम्बद्ध होते हैं। ॐ यह अक्षर ही यह सम्पूर्ण जगत् है। इसलिये अनुष्टुप्- मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके दोनों ओर—पहले और पीछे ॐकारका सम्पुट लगाना चाहिये। ब्रह्मवादी महात्मा उक्त मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके न्यासका उपदेश करते हैं* ॥ २ ॥ निश्चय ही ‘उग्रम्’ इस पदको उस प्रसिद्ध अनुष्टुप्- मन्त्रका प्रथम स्थान जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। ‘वीरम्’ यह पद द्वितीय स्थान है। ‘महाविष्णुम्’ पद तृतीय स्थान है। ‘ज्वलन्तम्’ पद चतुर्थ स्थान है। ‘सर्वतोमुखम्’ पद पञ्चम स्थान है। ‘नृसिंहम्’ पद छठा स्थान है। ‘भीषणम्’ पद सातवाँ स्थान है। ‘भद्रम्’ पद आठवाँ स्थान है। ‘मृत्युमृत्युम्’ पद नवाँ स्थान है। ‘नमामि’ पद दसवाँ स्थान है। ‘अहम्’ पद ग्यारहवाँ स्थान है। इस प्रकार जानना चाहिये। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। निश्चय ही यह अनुष्टुप्‌वृत्ति ग्यारह पदोंकी है। इस अनुष्टुप्- मन्त्रके द्वारा ही इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। तथा अनुष्टुप्के द्वारा ही सबका उपसहार होता है। इसलिये सब कुछ अनुष्टुप्-मन्त्रका ही विस्तार है—यों जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है॥ ३ ॥ कहते हैं, देवताओंने प्रजापतिसे पूछा—‘‘भगवान् नृसिंहके लिये ‘उग्रम्’ यह विशेषण क्यों दिया जाता है ? उन्हें उग्र क्यों कहा जाता है ?’’ तब वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले—‘‘क्योंकि भगवान् नृसिंह अपनी महिमासे सम्पूर्ण लोको, समस्त देवों, सभी आत्माओं तथा सभी भूतोंको ऊपर उठाये रखते हैं, निरन्तर उनकी सृष्टि करते हैं, नाना

  • इस प्रकरणका सारांश यह है कि प्रणवकी चार मात्राएँ हैं— अ उ म् और अर्धमात्रा । क्रमशः इनके चार लोक हैं— पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक और सोमलोक । चार ही वेद हैं—ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व । चार ही देवता हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा ॐकारवाच्य परब्रह्म । चार ही छन्द हैं—गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती तथा विराट् । चार ही अग्नियाँ हैं—गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय और संवर्तक । ये सब मिलकर प्रणवरूप हैं, इस विश्वरूप प्रणवमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित उपास्यदेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करनी चाहिये । † यहाँ अङ्गन्यासका विधान किया गया है। इसके अनुसार न्यासका क्रम इस प्रकार होगा—‘ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुम्’ हृदयाय नम—यों कहकर दाहिने हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे । फिर ‘ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्’ शिरसे स्वाहा— यों कहकर उक्त अङ्गुलियोंसे ही मस्तकका स्पर्श करे । तत्पश्चात् ‘नृसिंहं भीषणं भद्रं’ शिखायै वषट्—इसका उच्चारण करके पूर्ववत् शिखाका स्पर्श करे । तदनन्तर ‘मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्’ कवचाय हुम्—इसका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अङ्गुलियोंसे दायें कंधेका एक साथ ही स्पर्श करे । फिर प्रणवसहित पूरे मन्त्रके साथ ‘अस्त्राय फट्’ कहकर दाहिने हाथको मस्तकके ऊपर बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये ।
  • अनुष्टुप्-मन्त्रमें कुल बत्तीस अक्षर हैं, उनमेंसे प्रत्येक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके शिखासे लेकर पैरतकके बत्तीस अङ्गोंमें क्रमश न्यास करना चाहिये । यथा—‘ॐ उँ ॐ नम. शिखायाम्’, ‘ॐ ग्रँ ॐ नम दक्षिणानेत्रे’ इत्यादि ।