कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद् २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५६९ अनुष्टुप्के प्रथम चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है। 'र्वतो' शब्द द्वितीय चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है। 'पण' शब्द तृतीय चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है तथा 'नमा' शब्द चतुर्थ चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है। इन सबको साम जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। अतः यह साम सच्चिदानन्दमय परब्रह्मस्वरूप है। उसे इस रूपमे जाननेवाला यहाँ—इसी जीवनमे अमृतस्वरूप हो जाता है। इसलिये इस सामको अङ्गोंसहित जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है॥६॥ विश्वस्रष्टा प्रजापतिगणोंने इस साममय मन्त्रके प्रभावसे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है। उन्होंने विश्वकी रचना की है, इसलिये वे विश्वस्रष्टा हैं। यह विश्व उन्हींसे उत्पन्न होता है, इस रहस्यको जाननेवाले उपासक ब्रह्माजीके लोकको तथा उनके सायुज्यको प्राप्त होते हैं—उन्हींमे लीन हो जाते है, इसलिये अङ्गोंसहित इस सामको जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। 'विष्णुं' पद पूर्वोक्त आनुष्टुभ नारसिंह मन्त्रराजके प्रथम चरणका अन्तिम पद है। 'मुखम्' द्वितीय पादका अन्तिम पद है। 'भद्रं' तृतीय चरणका अन्तिम पद है। 'म्यहम्' चतुर्थ पादका अन्तिम पद है। यह सब साम है—इस प्रकार जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। वे जो प्रसिद्ध प्रजापति हैं, उन्होंने ही यह सब कुछ (जो पहले बतायी हुई उपासना आदिका तत्त्व है) जाना। सबके 'आत्मा' रूप ब्रह्ममें ही जिसकी स्थिति है, ऐसे इस आनुष्टुभ मन्त्रको जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। उपासना करनेवाले स्त्री-पुरुषोंमें जो भी निश्चितरूपसे यहाँ उत्कृष्ट स्थितिमें रहनेकी इच्छा करते हैं, उन्हें भगवान् नृसिंह सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। वह जहाँ-कहीं भी प्राण त्याग करता है, अन्तकालमें भगवान् नृसिंह वहीं उसे परब्रह्ममय तारक-मन्त्रका उपदेश करते हैं, जिससे वह अमृत- स्वरूप होकर अमृतत्व (मोक्ष)को प्राप्त होता है। इसलिये साममध्यवर्ती तारकमन्त्र (एव सामोपासनाके अङ्गभूत प्रणव)- का जप करना चाहिये। अत (मन्त्रद्रष्टा ऋषि होनेके कारण) सामके अङ्गभूत प्रजापति ही यह तारक मन्त्र है। इसलिये साम- के अङ्गभूत प्रजापति ही यह तारक-मन्त्र हूं—इस प्रकार जो जानता है, वही यथार्थ उपासक है। यह महोपनिषद् है (जिसके द्वारा महान् परमेश्वरके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो, उसीका नाम महोपनिषद् है)। जो इस महोपनिषद्को जानता है—इसमें बताये अनुसार उपासना करता है, वह मानो सारा पुरश्चरण पूरा करके महाविष्णुरूप हो जाता है, महाविष्णु- रूप हो जाता है॥७॥ -o0o0o- द्वितीय उपनिषद् मन्त्रराजकी शरण लेनेका फल, उसके अङ्गोंका विशद वर्णन, न्यासकी विधि तथा मन्त्रके प्रत्येक पदकी व्याख्या कहते हैं, एक बार सब देवताओंको मृत्यु, पाप और संसारसे बड़ा भय हुआ। वे भागकर प्रजापति ब्रह्माजीकी शरणमें गये। प्रजापतिने उनको भगवान् नृसिंहके इस मन्त्र- राज आनुष्टुभका उपदेश दिया। इस मन्त्रके प्रभावसे उन सब देवताओंने मृत्युको जीत लिया। वे सब पापसे तर गये तथा इस संसारसे भी पार हो गये। इसलिये जो मृत्यु, पाप तथा संसारसे भी डरता हो, उसे भगवान् नृसिंहके इस मन्त्र- राज आनुष्टुभकी शरण लेनी चाहिये। जो इसकी शरण लेता है, वह मृत्युको पार कर जाता है। वह पापसे तर जाता है तथा वह संसारसे भी पार हो जाता है।१ १ मन्त्रराज यह है— ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥ उ० अ० ७२– पूर्वोक्त सुप्रसिद्ध मन्त्रराजका अङ्गभूत जो प्रणव है, उस प्रणवकी पहली मात्रा अकार है, उसका पृथ्वी लोक है, ऋचाओंसे उपलक्षित ऋग्वेद ही वेद है, ब्रह्मा देवता हैं, वसु- नामक देवताओंका गण है, गायत्री छन्द है तथा गार्हपत्य अग्नि है। यह सब प्रणवकी पहली मात्राके अन्तर्गत है और वह पहली मात्रा ही मन्त्ररूप सामका प्रथम पाद है। उक्त प्रणवकी दूसरी मात्रा उकार है, इसीके अन्तर्गत अन्तरिक्ष लोक, यजुर्मन्त्रों- से उपलक्षित यजुर्वेद, विष्णु देवता, रुद्र नामक देवताओंका गण, त्रिष्टुप् छन्द और दक्षिणात्मक अग्नि है। यह दूसरी मात्रा ही साम अर्थात् मन्त्रका द्वितीय पाद है। तीसरी मात्रा मकार है, इसीके अन्तर्गत द्युलोकनामक लोक, सामोपलक्षित सामवेद वेद, रुद्र देवता, आदित्यनामक देवताओंका गण, जगती छन्द तथा