भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 832 में से

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पृष्ठ 614

५६८ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् १

देवताओंका गण है ? कौन-सा छन्द है और कौन सा ऋषि है ? ॥ २ ॥

वे प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी बोले---निश्चय ही वह पुरुष जो श्रीबीज ( श्रीं ) से अभिपिक्त गायत्री मन्त्रके आठ अक्षरवाले चरणको इस मन्त्रराजरूप सामका अङ्ग जानता है, वह श्री ( शोभा एव सम्पत्ति ) से सुशोभित होता है। सम्पूर्ण वेद प्रणवादि हैं, उनके आदिमे प्रणव---ॐकारका ही उच्चारण किया जाता है। उस प्रणवको जो इस सामका अङ्ग समझता है, वह तीनों लोकोंपर विजय पा लेता है। चौबीस अक्षरों- वाला महालक्ष्मी-मन्त्र यजुःस्वरूप है, उसे जो सामका अङ्ग जानता है, वह आयु, यश, कीर्ति, ज्ञान और ऐश्वर्यसे सम्पन्न होता है । इसलिये अङ्गोंसहित इस सामको जाने । जो अङ्गोंसहित सामको जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है । गायत्री, प्रणव तथा यजुःस्वरूप महालक्ष्मी मन्त्रका उपदेश ज्ञानीजन स्त्री और शूद्रों को नहीं देना चाहते । बत्तीस अक्षरोंवाले सामको जाने, जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। गायत्री, प्रणव और यजुर्वेदमय महालक्ष्मी मन्त्रको यदि स्त्री और शूद्र जान लें तो वे मरनेपर अधोगति को प्राप्त होते हैं---नरक और नीची योनियोमे गिरते हैं । इसलिये सदा ही सावधान रहकर उनको इन मन्त्रोंका उपदेश न दे। यदि कोई उन्हें उपदेश देता है, तो वह आचार्य भी उन्हींके साथ मरनेपर अधोगतिको प्राप्त होता है---नरकादिमे पड़ता है ॥ ३ ॥

प्रजापतिने फिर कहा---निश्चय ही अग्नि, सारे वेद, यह सम्पूर्ण जगत्, समस्त प्राणी, प्राण, इन्द्रिय, पशु, अन्न, अमृत, सम्राट्, स्वराट् और विराट्---इन सबको इस मन्त्र- राजरूप सामका प्रथम चरण जाने । ये ऋक्, यजुः, साम और अथर्वरूप सूर्य तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित रहनेवाले हिरण्मय पुरुष---इनको सामका द्वितीय पाद जाने । जो समस्त ओषधियों ( अन्नों और फलों ) के स्वामी तारापति चन्द्रमा हैं, उनको सामका तृतीय चरण जाने । वे ब्रह्मा, वे शिव, वे विष्णु, वे इन्द्र, वे अग्नि, वे अविनाशी परमात्मा स्वराट्--- इन सबको उस सामका चतुर्थ चरण समझे । जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ।

'उग्रम्' यह पद मन्त्रराज अनुष्टुप्‌के प्रथम चरणका आदि अग है । 'ज्वल' यह उसके द्वितीय चरणका आदि अग है । 'नृसिं' यह अश तृतीय चरणका आदि भाग है तथा 'मृत्यु' पद चतुर्थ चरणका आदि भाग है। इन सबको साम- स्वरूप समझे । जो यों समझता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है । इसलिये इस सामको जहाँ-तहाँ---सबको न बताये । यदि यह मन्त्र किसीको देनेकी इच्छा हो तो सेवापरायण एव सुननेके लिये उत्सुक पुत्रको दे, अथवा दूसरे किसी शिष्यको भी दिया जा सकता है ॥ ४ ॥

वे सुप्रसिद्ध प्रजापति फिर बोले---भगवान्‌का जो क्षीरसागरमे शयन करनेवाला नृसिंह-विग्रह है, वह योगियोंके लिये भी ध्यान करनेयोग्य परमपद है। उसे सामस्वरूप समझे। यों समझनेवाला अमृतत्वको प्राप्त होता है । 'वीरं' इस पद- को मन्त्रराज अनुष्टुप्‌के प्रथम चरणके पूर्वार्धका अन्तिम अश जाने । 'तं स' इस अगको द्वितीय चरणके पूर्वार्धका अन्तिम भाग समझे । 'ह भी' इस अगको तृतीय चरणके पूर्वार्धका अन्तिम भाग माने और 'मृत्युम्'पदको चतुर्थ चरणके पूर्वार्ध- का अन्तिम भाग समझे तथा इन सबको साम जाने । जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। इसलिये इस सामको जो जिस किसी भी आचार्यके मुखसे इस प्रकार जानता है, वह उसी शरीरमे रहते हुए ससारसे मुक्त हो जाता है, दूसरोंको भी मुक्त करता है तथा यदि वह ससारमे आसक्त रहा हो तो इस सामके ज्ञानसे मुमुक्षु बन जाता है। इस मन्त्ररूप सामका जप करनेमे वह उसी शरीरसे आराध्य देवता ( भगवान् नृसिंह ) का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है। अतः कलियुगमे यही मोक्षका द्वार है । दूसरोंको मोक्षकी प्राप्ति सहजमे नहीं होती । इसलिये इस सामको अङ्गोंसहित जाने । जो जानता है, वह अमृतत्व- को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥

भगवान् नृसिंहको ऋत और सत्य समझे । वे सर्वव्यापी परमात्मा एव अन्तर्यामी पुरुष हे। वे मनुष्य और सिंहकी सम्मिलित आकृति धारण करनेसे कृष्ण और पिङ्गल वर्णके दिखायी देते हैं। वे ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न ) हैं। उनके नेत्र बड़े विकराल एव भयङ्कर हं। तथापि वे शङ्कर हैं, सबका कल्याण करनेवाले है। कण्ठप्रदेशमे नील एव उसके ऊर्ध्वभागमें तेजोमय लोहित वर्ण होनेसे वे ही 'नीललोहित' नाम धारण करते हैं । ये सर्वदेवमय भगवान् नृसिह ही दूसरे रूपमें गिरिराजकन्या उमाके स्वामी, पशुपति, पिनाकधारी एव अपार तेजस्वी महेश्वर हैं। ये ही सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर और समस्त भूतोंके अधिपति है। जो ब्रह्म ( वेद ) के अधिपति हैं, ब्रह्माजीके भी स्वामी है तथा जो यजुर्वेदके वाच्यार्थ हैं, उन भगवान् नृसिंहको साम जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। 'महा' शब्द मन्त्रराज