भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 613, कुल 832 में से

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पृष्ठ 613

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ नृसिंहपू र्पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम उपनिषद् नरसिंह-मन्त्रराजकी महिमा तथा उसके अङ्गोंका वर्णन

कहते हैं, पूर्वकालमें यह सब कुछ जल ही था। सर्वत्र सलिलराशि ही भरी हुई थी। उस जलमें वे प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी कमलपत्रपर प्रकट हुए। उनके मनमे यह कामना हुई कि मैं इस जगत्की रचना करूँ। लोकमें यह प्रसिद्ध है कि पुरुष मनसे जिसकी भावना करता है, उसीको वाणीद्वारा बोलता है और फिर उसीको क्रियाद्वारा सिद्ध करता है। इसी सम्बन्धमें एक ऋचा है, जिसका भाव इस प्रकार है— पूर्वकालमें सृष्टिके अवसरपर मनसे काम—सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा प्रकट हुई। सृष्टिके पूर्व जो जलमात्र विद्यमान था, वही सबका कारण है। अपने अन्तःकरणमे स्थित अन्तरात्मापर दृष्टि रखनेवाले ज्ञानीजन उस कामको सत्यरूप आत्माका बन्धन मानते हैं। उन्होंने अपनी बुद्धिसे यह निश्चित किया कि असत् (प्रकृति) के कार्यभूत मनमे ही कामका उदय होता है। जो इस बातको जानता है, वह जिस वस्तुकी कामना करता है, वह उसे प्राप्त हो जाती है। उन प्रसिद्ध प्रजापतिने तपस्या आरम्भ की। उन्होंने तपस्या करके इस नारसिंह-मन्त्रराजका, जो अनुष्टुप् छन्दमें आबद्ध है, साक्षात्कार किया। निश्चय ही उस मन्त्रराजके प्रभावसे, उन्होंने जो कुछ यह प्रत्यक्ष उपलब्ध हो रहा है, उस सम्पूर्ण जगत्की रचना की। इसलिये यह जो कुछ भी जगत्रूपसे दृष्टिगोचर हो रहा है, इसे मन्त्रराज-आनुष्टुभमय ही कहते हैं। इस अनुष्टुप्-मन्त्रसे ही ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हँ, उत्पन्न होनेपर वे अनुष्टुप्-मन्त्रसे ही जीवित रहते है और मृत्युके समय इस लोकसे प्रयाण करनेपर वे अनुष्टुप्-मन्त्रमें ही सब ओरसे प्रवेश कर जाते हैं। मन्त्रराजकी यह अनुष्टुप्- वृत्ति समस्त सृष्टिकी आदिभूता एव प्रधान कारण है। निश्चय ही वाणीमात्र अनुष्टुप् है, क्योंकि वाणीसे ही प्राणी मृत्यु- को प्राप्त होते हैं और वाणीसे ही उत्पन्न होते हैं। यह जो अनुष्टुप् छन्द है, वह निश्चय ही सब छन्दोंमें श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ समुद्र, पर्वत और सातों द्वीपोंसहित जो यह पृथ्वी है, इसे मन्त्रराजरूप सामका प्रथम चरण जाने। यक्ष, गन्धर्व तथा अप्सराओंसे सेवित जो अन्तरिक्ष लोक है, उसे सामका द्वितीय चरण जाने। वसु, रुद्र और आदित्य आदि सम्पूर्ण देवताओं- से सेवित जो द्युलोक है, उसे सामका तृतीय चरण जाने। तथा जो निरञ्जन—मायारूप मलसे रहित, विशुद्ध परम व्योममय ब्रह्मस्वरूप है, उसे सामका चतुर्थ चरण जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। ऋक्, यजुः, साम और अथर्व—ये अङ्गो और शाखाओंसहित चार वेद उपर्युक्त मन्त्रराजके चार पाद हैं। उस मन्त्रराजका ध्यान क्या है? देवता कौन-सा है? कौन-कौन-से अङ्ग है ? कौन-सा