कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 612, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५६६ * गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् * वरुणको नमस्कार है । मरुत्को नमस्कार है । कुबेरको तापनीय स्तुति प्रदान करके तथा सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टिका नमस्कार है। महादेवजीको नमस्कार है। ब्रह्माको नमस्कार सामर्थ्य देकर वहींपे अन्तर्धान हो गये ॥ ९९ ॥ है और सम्पूर्ण देवताओंको नमस्कार है ॥ ९८ ॥ राधिके ! मैंने ब्रह्मासे, ब्रह्मपुत्र सनकादि मुनियोंसे तथा दुर्वासाजी कहते हैं—इस प्रकार वे भगवान् नारायण श्रीनारदजीसे भी जैसे सुना था, वैसे ही यहाँ वर्णन किया अपने ही स्वरूपभूत ब्रह्माको यह परम पवित्र गोपालोत्तर- है। अब तुम अपने घरकी ओर जाओ ॥१००॥ ॥ अथर्ववेदीय गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणु॒याम॑ देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॒र्यज॑त्राः । स्थि॒रैरङ्गैᳵस्तुष्टु॒वाग्ँस॑स्त॒नूभि॒र्व्यशे॑म दे॒वहि॑तं॒ यदायुः॑ ॥ स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्ताक्ष्र्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! परम पद यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुर्वाति यत्र न चन्द्रमा भाति यत्र न नक्षत्राणि भान्ति यत्र नाग्निर्दहति यत्र न मृत्युः प्रविशति यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति सदानन्दं परमानन्दं शान्तं शाश्वतं सदाशिवं ब्रह्मादिवन्दितं योगिध्येयं परं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिनः ॥ ( बृहज्जाबाल० ८ । ६ ) जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहता, जहाँ चन्द्रमा प्रकाशित नहीं होता, जहाँ तारे प्रकाशित नहीं होते, जहाँ अग्नि नहीं जलता, जहाँ मृत्यु प्रवेश नहीं करती, जहाँ दुःख प्रवेश नहीं करते, जो सदानन्द, परमानन्द, शान्त, शाश्वत, सदाशिव ( नित्य कल्याणमय ) और ब्रह्मादि देवताओंके द्वारा वन्दित है, वही योगियोंका ध्येय परमपद है, जिसको प्राप्त करके योगी लौटते नहीं ।