भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 627

उपनिषद् ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७९

नित्य जप करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञद्वारा यजन कर लेना है, वह उक्थ्य यागद्वारा यजन कर लेता है, वह 'षोडशी' से यजन कर लेता है, वह वाजपेयद्वारा यजन कर लेता है । वह अतिरात्रद्वारा यजन कर लेता है । वह आप्तोर्यामद्वारा यजन कर लेना है। वह अश्वमेघद्वारा यजन कर लेता है। वह सम्पूर्ण क्रतुओंकेद्वारा यजन कर लेता है। वह सम्पूर्ण क्रतुओंकेद्वारा यजन कर लेता है ॥ ८ ॥

जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह मानो ऋग्वेदका स्वाध्याय करता है। वह यजुर्वेदका स्वाध्याय करता है। वह सामवेदका स्वाध्याय करता है। वह अथर्ववेदका स्वाध्याय करता है। वह उसीके आङ्गिरस भागका स्वाध्याय करता है। वह शाखाओंका स्वाध्याय करता है। वह पुराणोंका स्वाध्याय करता है। वह कल्पों (यज्ञविधिको बतलानेवाले शास्त्रों) का स्वाध्याय करता है। वह गाथाओंका अध्ययन करता है। वह नाराशंसी नामक आख्यानोंका अध्ययन करता है। वह प्रणवका अध्ययन करता है। जो प्रणवका अध्ययन करता है, वह सबका अध्ययन करता है। वह सबका अध्ययन करता है ॥ ९ ॥

जिनका उपनयन-संस्कार नहीं हुआ है, ऐसे जो सौ बालक हैं, वे एक उपनयन-संस्कारसम्पन्न ब्रह्मचारीके तुल्य हैं। जो सौ ब्रह्मचारी हैं, वे एक श्रोत्रिय (वेदपाठी) गृहस्थके तुल्य हैं। जो सौ गृहस्थ हैं, वे एक वानप्रस्थके तुल्य हैं, जो सौ वानप्रस्थ हैं, वे एक सन्यासीके तुल्य हैं। जो सौ सन्यासी हैं, वे एक रुद्र-जापक (रुद्र-मन्त्र अथवा रुद्राष्टाध्यायीका पाठ करनेवाले साधक) के तुल्य हैं। जो सौ रुद्र-जापक हैं, वे एक अथर्वाङ्गिरस् एव अथर्वशिखा नामक उपनिषद्का स्वाध्याय करनेवालेके तुल्य हैं तथा जो सौ अथर्ववेदीय उपनिषदोंके स्वाध्यायकर्ता हैं, वे मन्त्रराज नारसिंहका जप करनेवाले एक साधकके तुल्य हैं। मन्त्रराज-का जप करनेवाले उपासकको वह परम धाम निश्चय ही प्राप्त होता है, जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहती, जहाँ चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होता, जहाँ तारे नहीं चमकते, जहाँ आग नहीं जलाती, जहाँ मृत्यु नहीं प्रवेश कर पाती, जहाँ दुःखका कोई प्रभाव नहीं होता, जो सदा आनन्दमय, परमानन्दपूर्ण, शान्त, शाश्वत, सदा कल्याणमय, ब्रह्मादि देवताओंकेद्वारा वन्दनीय तथा योगियोंका भी परम ध्येयरूप परमपद है और जहाँ जाकर योगी (परमात्मामें लगे हुए पुरुष) इस संसारमें नहीं लौटते।

इसके सम्बन्धमें ऐसी ही बात ऋग्वेदकी ऋचाद्वारा भी बतायी गयी है—

‘जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परमव्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परमधामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामे सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परम पद कहते हैं।' वह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है। वह यह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है। जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है। यह महा-उपनिषद् है ॥ १० ॥

॥ अथर्ववेदीय नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!