कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीनृिं'होत्तर पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड 'ॐ' नामसे परमात्म-तत्त्वका तथा उसके चार पादोंका वर्णन, चौथे पादके चार भेद
कहते हैं, एक बार देवताओंने प्रजापति ब्रह्माजीसे कहा—'भगवन् ! जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन प्रणव- रूप परमात्माके तत्त्वका हमसे स्पष्ट वर्णन कीजिये ।' इसपर ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया— 'ॐ' यह अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है । यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् उस परमात्मस्वरूप ॐकारकी ही उपव्याख्या—महिमाका विस्तार है । अतीत, वर्तमान और अनागत—इन तीनों कालोंमें होनेवाला यह सारा जगत् ॐ- कार ही है । तथा जो उपर्युक्त तीनों कालोंसे अतीत एवं जगत्से भिन्न कोई तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है । निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है । यह आत्मा भी ब्रह्म है । इस आत्माकी 'ओम्' इस नामसे अभिहित ब्रह्मके साथ एकता करके तथा ब्रह्मकी आत्माके साथ 'ॐ'कारके वाच्यार्थ- रूपसे एकता करके, वह एकमात्र (अद्वितीय), जरारहित, मृत्युरहित, अमृतस्वरूप, निर्भय, चिन्मय तत्त्व 'ओम्' है— इस प्रकार अनुभव करे । उस परमात्मस्वरूप ॐकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन शरीरोंवाले इस सम्पूर्ण दृश्य- प्रपञ्चका आरोप करके, अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य हैं, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म एव कारण-जगत्की कल्पना हुई है—विवेकद्वारा इस प्रकार अनुभव करके यह निश्चय करे कि यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है । तथा तन्मय (परमात्ममय) होनेके कारण अवश्य यह तत्स्वरूप (परमात्मारूप) ही है, इस दृढ निश्चयके द्वारा जगत्को 'ओम्' के वाच्यार्थभूत परमात्मामे विलीन कर डाले । साथ ही उस त्रिविध शरीरवाले आत्माका 'यह त्रिविध शरीररूप उपाधिसे युक्त परब्रह्म ही है' इस प्रकार चिन्तन करे । स्थूल (विराट् जगत्स्वरूप) एव स्थूल जगत्का भोक्ता, साथ ही-साथ सूक्ष्म (सूक्ष्म जगत्स्वरूप) एव सूक्ष्म जगत्का भोक्ता होनेके कारण तथा उसी प्रकार एकमात्र आनन्दस्वरूप एव आनन्दमात्रका उपभोक्ता और साथ ही इन सबसे विलक्षण होनेके कारण वह आत्मा (परमात्मा) चार पादोंवाला है । जाग्रत्-अवस्था तथा इसके द्वारा उपलक्षित यह सम्पूर्ण जगत् ही जिनका स्थान अर्थात् शरीर है, जो सम्पूर्ण विश्वमे व्याप्त हो रहे हैं; जिनका ज्ञान इस स्थूल (बाह्य) जगत्में सब ओर फैला हुआ है; भूः, भुवः, स्वः आदि सात लोक ही जिनके सात अङ्ग हैं; पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि करण ही जिनके मुख हैं, जो स्थूल जगत्के भोक्ता हैं,