कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 629, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 629
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५८१ [ बायाँ स्तम्भ ] धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ जिनके स्वरूप हैं अथवा स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है तथा जो विश्व-शरीरमें स्थित नर होनेके कारण 'वैश्वानर' कहलाते हैं, वे सर्वरूप वैश्वानर ही पूर्णतम परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके प्रथम पाद हैं। (चार व्यूहोंमें इन्हींको बलभद्ररूप माना गया है।) स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत् ही जिनका स्थान (शरीर) है, जिनका ज्ञान बाह्य जगत्की अपेक्षा आन्तरिक अर्थात् सूक्ष्म जगत्मे व्याप्त है, जो पूर्वोक्त सात अङ्गों और उन्नीस मुखोंवाले तथा सूक्ष्म जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव और पालन करनेवाले हैं, वे पूर्ववत् चार स्वरूपोंवाले तैजस (प्रकाशके स्वामी) सूत्रात्मा—हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके द्वितीय पाद हैं। (चार व्यूहोंमें इन्हींको प्रद्युम्न कहा गया है।) जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति- अवस्था है। ऐसी सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्की प्रलयावस्था (जब कि सम्पूर्ण विश्व अपने कारणमें विलीन हो जाता है) जिनका स्थान (शरीर) है, अर्थात् समष्टि कारण-तत्त्वमें जिनकी स्थिति है, जो एकरूपमे ही स्थित हैं—जिनकी अभी नाना रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं हुई है; घनीभूत विज्ञान ही जिनका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय ही हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिनका मुख है, ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है * तथा जो एकमात्र अपने स्वरूपभूत आनन्दके ही उपभोक्ता हैं, जिनके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं, वे प्राज्ञ नामसे प्रसिद्ध ईश्वर ही पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके तृतीय पाद हैं। (चार व्यूहोंमें ये ही 'अनिरुद्ध' नामसे प्रसिद्ध है।) इस प्रकार तीनों पादोंके रूपमें वर्णित ये परमात्मा सबके ईश्वर हैं। ये सर्वज्ञ हैं। ये अन्तर्यामी ह। ये सम्पूर्ण विश्वके कारण हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान भी ये ही हैं। जाग्रत् आदि तीनों ही अवस्थाओंमे लक्षित होनेवाला यह जगत् भी वास्तवमे सुषुप्तरूप ही है, क्योंकि इनसे मोहित हुए मनुष्योंको कभी किसी भी वस्तुका तात्त्विक ज्ञान नहीं
- 'ओत' आदिका स्वरूप आगे बताया जायगा। [ दायाँ स्तम्भ ] होता। इसी प्रकार यह त्रिविध जगत् स्वप्नवत् भी है; क्योंकि यहाँ वस्तुका प्रायः विपरीत ही ज्ञान होता है। इतना ही नहीं, कुछ-का-कुछ प्रतीत होनेके कारण यहाँ सब कुछ मायामात्र ही है। परमात्मा इससे विलक्षण हैं, क्योंकि ये परमात्मा एकमात्र चिन्मय रसरूप हैं। उक्त तीनों पादोंके अतिरिक्त जो चौथा पाद है, वह ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार भेदोंके कारण चार रूपवाला है। उपर्युक्त चारों पाद तुरीय ही कहलाते हैं; क्योंकि प्रत्येक रूपका तुरीयमे ही पर्यवसान (लय) होता है। इस तुरीय पादमें भी जो ओत, अनुज्ञातृ और अनुज्ञारूप तीन भेद हैं, इन तीनोंको भी पूर्ववत् सुषुप्ति एव स्वप्नके समान तथा मायामात्र ही समझना चाहिये, क्योंकि पारमार्थिक तुरीयरूप जो निर्विकल्प एव निर्विशेष परमात्मा हैं, वे एकमात्र चिन्मय रसरूप ही हैं*।
- इस प्रसङ्गका सारांश यों समझना चाहिये—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-कालमें अनुभव किया जानेवाला जो कुछ भी प्राकृत प्रपञ्च या सुख है, वह सब कार्य है और तुरीय उसका कारण है। कारणमें ही कार्यकी कल्पना होती है, अतः कारण ही सत्य है। कारणके भी साक्षी हैं सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा। वे कहीं सत्- रूपसे, कहीं चित्-रूपसे, कहीं आनन्दरूपसे और कहीं सत् आदि समस्त रूपोंसे कारणमें व्याप्त हैं। इस प्रकार कारणमें परमात्माकी व्यापकताका चिन्तन करना ओतयोग कहलाता है। व्याप्त वस्तु- की सत्ता व्यापकके ही अधीन होती है, इस न्यायसे परमात्माके द्वारा व्याप्त कारण-तत्त्वकी स्वतः कोई सत्ता आदि नहीं है। वह परमात्माके अधीन सत्ताका ही प्रकाशक होनेके कारण परमात्मामें ही आरोपित या कल्पित है। इस प्रकारके चिन्तनका नाम अनुज्ञातृ- योग है। अध्यस्त, आरोपित या कल्पित वस्तु अपने अधिष्ठानसे पृथक् अस्तित्व नहीं रखती, वह अधिष्ठानस्वरूप ही समझी जाती है। अतः परमात्मामें आरोपित कारण-तत्त्व भी उनसे पृथक् नहीं, परमात्मरूप ही हैं। इस प्रकारका चिन्तन अनुज्ञायोग कहा गया है। ये तीनों योग कारण-ज्ञानकी अपेक्षा रखते हैं, अतः कारणमें ही इनका अन्तर्भाव है। इसीलिये इनके पृथक् अस्तित्वको सुषुप्त, स्वप्न एव मायामात्र बताया गया है। इन योगोंद्वारा कारणका लय या सहार होता है। लयके आधार हैं तुरीय परमात्मा, अतः इन सबको तुरीयपादरूप बताना उचित ही है। परमात्मा ही 'अविकल्प' नामसे निर्दिष्ट पारमार्थिक तुरीय हैं। 'अथातआदेश ' आदिके द्वारा श्रुति उन्हींके स्वरूपकी ओर संकेत करती है।