कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 630, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५८२ - श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् - [ खण्ड २
अनन्तर श्रुतिका यह आदेश (उपदेश) है—'जो न स्थूलको जानता है, न सूक्ष्मको जानता है और न दोनोंको ही जानता है, जो न तो जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है और न प्रज्ञानका ही घनीभूत रूप है जिसे देखा नहीं जा सकता, व्यवहारमे नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण-चिह्न अथवा आकार भी नहीं है; जो चिन्तन करनेमे नही आ सकता जिसे किसी विशिष्ट रूपसे बताया नहीं जा सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति (अनुभूति) ही जिसका सार अथवा स्वरूप है एवं जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है—ऐसा सर्वथा कल्याणमय, परम शान्त अद्वितीय तत्त्व ही उन पूर्णब्रह्म परमात्मा नृसिंहदेवका चतुर्थ पाद है—यों ज्ञानी महात्मा मानते हैं।' इस प्रकार चार पादोंमे जिनका वर्णन किया गया है, वे भगवान् नृसिंहदेव ही सबके आत्मा हैं, वे ही जाननेयोग्य हैं। वे कारणात्मा ईश्वर (अथवा त्रिभुवनका ग्रासन करनेवाले इन्द्र आदि) को भी अपना ग्रास बना लेते—अपनेमे लीन कर लेते हैं। वे तुरीयके भी तुरीय हैं। (अतः परमात्माको ही जानने और पानेका प्रयत्न करना चाहिये) ॥ १॥
द्वितीय खण्ड
परमात्माके चार पादोंकी ओंकारकी मात्राओंके साथ एकता, मन्त्रराज आनुष्टुभके
द्वारा तुरीय परमात्माका ज्ञान
निश्चय ही उन 'तुरीय नामसे प्रसिद्ध इन चार पादोंवाले
परमात्माको ओङ्कारकी मात्राओ तथा समस्त ॐकारके साथ
एकीकृत करे। अर्थात् ॐकारको परमात्मा तथा उसकी चार
मात्राओंको परमात्माके चार पाद मानकर उसी रूपमे उनकी
भावना करे। वे परमात्मा जाग्रत्कालमे स्वप्न और सुषुप्तिसे
रहित हैं, स्वप्नकालमे जाग्रत् और सुषुप्तिसे रहित हैं, सुषुप्तिमे
जाग्रत् तथा स्वप्नसे रहित हैं, और तुरीयावस्थामें जाग्रत्, स्वप्न
एव सुषुप्ति—तीनोंसे रहित हैं। प्रत्येक अवस्थामें पृथक् पृथक्
रहते हुए भी वे सभी अवस्थाओंसे संयुक्त हैं। कहीं भी उनका
व्यभिचार (अभाव) नहीं है। इस प्रकार वे नित्य, अनन्त,
सत्यस्वरूप तथा एकरस हैं। नेत्रके द्रष्टा हैं, श्रोत्र-इन्द्रियके
द्रष्टा हैं। ये दोनों भी उपलक्षणमात्र हैं, वे घ्राणेन्द्रिय, रसना
और त्वचाके भी द्रष्टा हैं। वाक् आदि कर्मेन्द्रियोंके द्रष्टा,
मनके द्रष्टा, बुद्धिके द्रष्टा, प्राणके द्रष्टा, तम अर्थात् अहङ्कारके
द्रष्टा हैं, कहाँतक गिनायें, वे सबके द्रष्टा हैं। इसीलिये वे
सबसे भिन्न और सबसे विलक्षण हैं। द्रष्टा दृश्यसे भिन्न होता
ही है। 'द्रष्टा' कहनेसे कोई यह न समझ ले कि वे राग
अथवा द्वेषपूर्वक इन सबको देखते हैं, नहीं-नहीं, वे साक्षी
हैं—पक्षपातरहित हैं। वे नेत्रके साक्षी हैं, श्रवणेन्द्रियके साक्षी
हैं, घ्राणेन्द्रिय, रसना और त्वचाके भी साक्षी हैं। वाक् आदि
कर्मेन्द्रियोंके साक्षी, मनके साक्षी, बुद्धिके साक्षी, प्राणके साक्षी
हैं, तमके साक्षी—नहीं-नहीं, सबके साक्षी हैं। इसीलिये वे
निर्विकार हैं, महाचैतन्यस्वरूप—आत्माके भी आत्मा हैं।
इन पुत्र-वित्तादि तथा नेत्र-श्रोत्रादि सबसे बढ़कर प्रियतम है
और इस प्रकार आनन्दके घनीभूत विग्रह हैं। इस समस्त
प्रपञ्चके पूर्वसे ही वे भलीभाँति प्रकाशित हो रहे हैं। अतः
एकरस ही है। जरा आदि अवस्थाएँ अथवा विकार उनका
स्पर्श भी नहीं कर सकते। और तो और, मृत्यु भी उनसे
दूर रहती है। वे अमृत एवं अभय ब्रह्म ही है। फिर भी
अपनी मायाशक्तिसे चार पादवाले बने हुए हैं।
जाग्रत्-अवस्था तथा उनके द्वारा उपलक्षित यह स्थूल
जगत् जिनका स्थान (शरीर) है, जिनके स्थूल, सूक्ष्म, कारण
और साक्षी—ये चार स्वरूप हैं, वे विश्वरूप वैश्वानर पूर्ण-
तम परमात्माके प्रथम पाद है। और वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती
एवं परा, अथवा बीज, बिन्दु, नाद और शक्ति—इन
चार रूपोंवाला अकार ॐकारकी पहली मात्रा है। यह अकार
ही वैश्वानर है। क्योंकि यह अकार भी स्थूल (वैखरी),
सूक्ष्म (मध्यमा), बीज (पश्यन्ती) और साक्षी (परा)—
इन चार स्वरूपोंसे परिलक्षित होनेके कारण वैश्वानरकी भाँति
चार रूपवाला ही है। इसके सिवा आप्ति (व्याप्ति) रूप
गुणके होनेसे भी दोनोंमें समानता है—वैश्वानर जाग्रत्कालीन
समस्त जगत्में व्यापक है तथा अकार भी वाणीमात्रमें व्यापक
है। (श्रुति भी कहती है, 'अकारो वै सर्वा वाक्'—निस्सन्देह
अकार सम्पूर्ण वाणी है।) यही नहीं, बोलते समय सबसे पहले
अकारका ही उच्चारण प्राप्त होता है—हृदयदेशसे ऊपरको
उठी हुई वायु कण्ठमें पहले ध्वनित होती है, अतः प्रथम
कण्ठस्थानीय अकारकी ही ध्वनि निकलती है। उधर सृष्टिकालमें
सर्वप्रथम विराट्स्वरूप वैश्वानरकी ही उपलब्धि होती है, अतः