कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 634, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५८६ * श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ३ इस प्रकार व्यष्टि और समष्टिकी ( ओंकारकी एक-एक अपनेको नित्य शुद्ध-बुद्ध, अमृतस्वरूप मानकर अपनी मात्रा और अनुष्टुप्-मन्त्रके एक-एक पाद और परमात्माके बुद्धिकी वृत्तियोंका परमात्मामे हवन करके अर्थात् अपने एक-एक पादकी ) एकताका चिन्तन करके मात्राओ प्रति- अन्त'करणको परमात्मामें ही लगाकर बाहर-भीतरसे शुद्ध हो मात्राके रूपमे परिणत करे । अर्थात् अकार और विराट् पवित्र देशमे पवित्र आसनपर सुखपूर्वक बैठे और (न्यास, पुरुषको उकार और हिरण्यगर्भमे लीन करे और उकार शुद्धि, रक्षोघ्न-मन्त्रोंके पाठ, दिग्बन्धन, कवचपाठ, गणपति एव हिरण्यगर्भको मकार एव ईश्वरमे विलीन करे । फिर स्मरण एवं रक्षा आदिके द्वारा) सब प्रकारके विघ्नोंका निवारण उनको भी अर्धमात्रा एव तुरीयमे विलीन करके क्रमश. श्रोत, करके प्राणायामपूर्वक ध्यानमे इन परमात्माके तत्त्वका अनुभव अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्पका चिन्तन तथा पूर्व-पूर्वका करे । फिर परमात्मामे ही इस सम्पूर्ण प्रपञ्चकी स्थिति देखते उत्तरोत्तरमे लय करते हुए अन्तमे सबको अविकल्परूप हुए प्राणाग्निहोत्र और प्रपञ्च यागकी रीतिसे प्राण और प्रपञ्चसे परमेब्रह्ममे ही लीन कर दे और निर्विशेष परमेश्वरका चिन्तन अपना सम्बन्ध हटा ले और सर्वस्वरूप, आधारयुक्त- करते हुए उन्हींमे स्थित हो जाय । १ श्रीविद्यारण्य मुनिने इस प्रसङ्गकी टीकामें सक्षेपसे प्राणाग्निहोत्रकी रीति इस प्रकार कही है। 'ॐ हीं' इस बीज मन्त्रका उच्चारण करते हुए चिदानन्दस्वरूप आराध्यदेवका ध्यान करे और फिर 'क्ष' से उल्टे चलकर 'अ' तककी वर्णमालाका ( क्ष हं सं .....इत्यादि रूपमे ) उच्चारण करते हुए उन्हींके स्वरूपभूत सर्वजगतमय शरीरका ( जो स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षीरूपमे चार प्रकारका है ) चिन्तन करे और ऐसी भावना करे कि यह चतुर्विध शरीर सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मामे प्रकट हुआ है, अत यह सच्चिदानन्दमय ही है । फिर 'सोऽहम्', 'हस' इन मन्त्रोंके जलद्वारा जीवात्मा और परमात्माकी परस्पर एकताकी भावना करे। इस प्रकार एकात्म-चिन्तनरूप अग्निमें ही 'स्वाहा' का उच्चारण करके उक्त चारों शरीरोंका होम ( लय ) कर दे। २ प्रपञ्च-याग भी इसी प्रकार करना होता है। 'ॐ हीं' इन मन्त्रका उच्चारण करके सचिदानन्दस्वरूप परमात्माका चिन्तन करते हुए 'अ' से लेकर 'क्ष' तककी वर्णमालाको अनुलोम-क्रमसे (अ आं इत्यादि रूपमे ) उच्चारण करे । फिर समस्त प्रपञ्चको सच्चिदानन्दमय परमेश्वरसे उत्पन्न हुआ देखकर उसमे भी सच्चिदानन्दमय होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् 'हस, सोऽहम्' इस प्रकार प्राणाग्निहोत्रकी अपेक्षा उल्टे क्रमसे जप तथा साथ-ही-साथ परमात्मा और जीवकी एकताका चिन्तन करते हुए उस चिन्तनमय अग्निमें 'स्वाहा' का उच्चारण करके समस्त प्रपञ्च होम दे-विलीन कर दे। ३ यह 'युक्त' का अर्थ है । इसके द्वारा सकलीकरण नामक न्यासकी ओर सकेत किया गया है। पहले इस उत्तरतापनीयके प्रथम खण्डमे बताये अनुसार इम आत्माका (ॐ इस नामके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले ब्रह्मके साथ एकता करके तथा ब्रह्मकी आत्माके साथ ओंकारके वाच्यार्थरूपने एकता करके वह एकमात्र जरारहित, मृत्युरहित, अमृतस्वरूप, निर्भय, निश्चय तत्त्व ॐ है- इस प्रकार अनुभव करे । तत्पश्चात् उन परमात्मस्वरूप ओंकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण-इन तीन शरीरोवाले सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका आरोप करके अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य है, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म एव कारण-जगत्की कल्पना हुई है ऐसा विवेकद्वारा अनुभव करके यह निश्चय करे कि यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है, क्योकि तन्मय ( परमात्ममय ) होनेके कारण अवश्य यह तत्स्वरूप (परमात्मस्वरूप) ही है। और इस दृढ निश्चयके द्वारा इस जीवको ॐके वाच्यार्थभूत परमात्मामें विलीन कर डाले। इसके बाद चतुर्विध शरीरको सृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रकारसे सकलीकरण करे। 'ओम्' का उच्चारण अनेक प्रकारसे होता है-एक तो केवल मकारपर्यन्त उच्चारण होता है, दूसरा बिन्दु-पर्यन्त, तीसरा नाद-पर्यन्त और चौथा शक्ति-पर्यन्त होता है। फिर उच्चारण बद हो जानेपर उसकी 'शान्त' सज्ञा होती है । सकलीकरणकी क्रिया आरम्भ करते समय पहले 'ओम्' का उपर्युक्त रीतिसे शान्तपर्यन्त उच्चारण करके 'शान्त्यतीत- कलात्मने साक्षिणे नमः' इस मन्त्रसे व्यापक-न्यास करते हुए 'साक्षी' का चिन्तन करे। फिर शक्ति-पर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'शान्तिकलाशक्तिपरावाद्यात्मने सामान्यदेहाय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए लन्तर्मुख, सत्वस्वरूप, महाज्ञानरूप सामान्य देहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका नादपर्यन्त उच्चारण करके 'विद्याकलानादपश्यन्तीवागात्मने कारणदेहाय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए प्रलय सुषुप्ति एव ईक्षणावस्थाने स्थित किञ्चित् बहिर्मुख सत्त्वरूप कारणदेहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका बिन्दु-पर्यन्त उच्चारण करके 'प्रतिष्ठाकला- बिन्दुमध्यमावागात्मने सूक्ष्मदेहाय नम' इस मन्त्रने व्यापक करते हुए सूक्ष्मभूत, अन्त करण, प्राण तथा इन्द्रियोके सघानरूप सूक्ष्मशरीरका चिन्तन करे । फिर प्रणवका मकारपर्यन्त उच्चारण करके 'निवृत्तिकलाजीववैखरीवागात्मने स्थूलशरीराय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए पञ्चीकृत भूत एव उसके कार्यरूप स्थूलशरीरका चिन्तन ..... । ४ यहाँ 'आधार' शब्द पीठ तथा उसमे भी आधारभूत स्थान आदिका बोधक है । उपर्युक्त प्रकारसे उत्पन्न हुआ यह चतुर्विध