कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५८७ अमृतमय, चतुरात्मा, सर्वमय एवं चतुरौंत्मा होकर महान् चतुःसप्तात्मा, चतुरात्मा तथा मूलाधारस्थित अग्नि-मण्डलमें पीठके ऊपर परिवरिसहित इस प्रणवरूप परमात्माका, जो अग्निरूप हैं, सम्यक् प्रकारसे चिन्तन करे। देह भगवान्का सपरिकर पीठ अर्थात् आसन तथा मूर्ति है—इस प्रकारकी भावना करनेके लिय 'आधार' शब्दके द्वारा परिकरसहित पीठन्यासकी तथा 'अमृतमय' कहकर मूर्तिन्यासका सूचना दी गयी है। सच्चिदानन्द-पूर्णत्वरूपिणी जो इच्छा, ज्ञान, क्रिया, स्वातन्त्र्य एवं मनू-स्वरूपिणी भगवान्की पराशक्ति है, वही मूर्ति है। इस अमृतमयी मूर्तिकी भावनामे परिपूर्ण होना हा 'अमृतमय' होना है। पीठ आदिकी कल्पनाका प्रकार यों बताया गया है—'ॐ चतुरशीतिकोटिप्राणिनात्यात्मने ब्रह्मवनाय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए केश, रोम आदिको एक 'वन' के रूपमें भावनाद्वारा देखे। 'ॐ पञ्चभूतानामशेषमन्त्रेभ्य प्राकारेभ्यो नम' इसमे व्यापक करते हुए पञ्चीकृत पञ्चभूत एवं नाम-रूपात्मक सात धातुओंको सात प्राकारों (परकोटों) के रूपम कल्पिन करे। 'ॐ नवच्छिद्रात्मम्यो नवद्वारेभ्यो नम' इसमे व्यापक करने हुए प्रत्येक प्राकार (घेरे) मे नौ-नौ गोपुरों (द्वारों) के रूपमें शरीरके नौ छिद्रोंको ही मान ले। इसी प्रकार स्थूलशरीरको स्थान मानकर सूक्ष्मशरीरको महाराजराजेश्वर आत्माका परिचारक माने। फिर निम्नाङ्कितरूपमे 'प्रवित्र' को राजराजेश्वरद्वार, सकाम- निष्काम वृत्तियोंको द्वारदेवता, काम-वैराग्यको द्वारपाल, श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियोंको राज-परिचारक, मनको गजदूत आदिके रूपमें मानकर 'ॐ संविद्रूपेभ्यो राजराजेश्वरद्वारेभ्यो नम', 'सकामाकामवृत्तिभ्यो द्वारदेवताभ्यो नम', 'कामवैराग्याभ्या द्वारपालाभ्यां नम', 'दिगन्थाद्यात्मक- श्रोत्रादीन्द्रियरूपेभ्यो राजपरिचारकेभ्यो नम', 'यन्त्रात्मकाय मनसे राजदूतय नम', 'ब्रह्मरूपिण्यै सर्वकार्यनिश्चयकर्यै बुद्धयै नम', 'रुद्र- रूपाय सर्वकार्याभिमानकर्त्रेऽहङ्काराय नम', 'विष्णुरूपाय सर्वकार्यानुसन्धानकर्त्रे चित्ताय नम', 'सर्वेश्वररूपाय सर्वाधिकारिणे प्राणाय नम'— इस प्रकार न्यास, जप अथवा भावना करने सूक्ष्मशरीरको भगवान्का सेवाका उपकरण बनाकर 'गुणत्रयात्मने प्रासादाय नम' इस मन्त्रमे त्रिगुणमय प्रासाद (महल) की कल्पना करे। फिर विन्दुपर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'परमात्मनामनाय नम' इस मन्त्रमे उसका अपने हृदयके भीतर न्यास करे। साथ ही यह भावना करे कि यह भगवान्के विराजनेके लिये सुन्दर आसन है। तत्पश्चात् पहले बनाये हुए किञ्चिदवशिष्ट संत्त्वरूप कारण-शरीरको गुणोंकी साम्यावस्थारूप पीठके रूपमें कल्पित करे। फिर शक्तिपर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'परमात्ममूर्तये नम.' इस मन्त्रके द्वारा हृदयमे लेकर मस्तकपर्यन्त व्यापक न्यास करते हुए पूर्वोक्त मच्चिदानन्दरूप, अन्तर्मुख सामान्य- शरीरमय ब्रह्मको ही भगवान्की मूर्तिके रूपमें चिन्तन करे। वह मूर्ति ज्ञानपराशक्तिरूपा है। उसके चार हाथ हैं—जो शङ्ख, चक्र, गदा और ज्ञानकी मुद्रामे शोभा पा रहे हैं। सब प्रकारके अलङ्कार उसका शोभा बढा रहे हैं। वह मूर्ति आत्मानन्दानुभवके समुद्रमें गोते लगा रहा है। १ अ, उ, म् तथा ॐ—ये क्रमशः स्थूल देह, सूक्ष्मदेह, कारणदेह तथा सामान्य देह हैं, इन चारोंका जो आत्मरूपसे चिन्तन करता है, वही चतुरात्मा है। २ 'सर्वमय' के 'सर्व' शब्दसे सर्वात्मक विराट् आदि चारों पादोंका प्रतिपादन होना है, इन सर्वात्मक पादोंका न्यास करनेसे साधक सर्वमय होता है। न्यासका क्रम इन प्रकार है—'ऐश्वर्यशक्त्यात्मने द्युलोकाय नम' इससे दाहिने हाथका अँगुलियोंद्वारा मस्तकका स्पर्श करे। इसी प्रकार 'ज्ञानशक्त्यात्मने सूर्याय नम' इससे नेत्रका, 'महारशक्त्यात्मनेऽग्नये नम' इससे मुखका, 'क्रियाशक्त्यात्मने वायवे नम' इसमे नासिकाका, 'सर्वाश्रयवृत्तत्यात्मने आकाशाय नम' इसमे हृदयका, 'इच्छाशक्त्यात्मने प्रजापतये नम' इससे गुह्यप्रदेश (उपस्थ एव गुदा)- कान्तथा 'सवाधारशक्त्यात्मने पृथिव्यै नम' इसमे चरणोंका स्पर्श करे। यह महाङ्गन्यास है। पादन्यासका ध्यान और मन्त्र आगे बतायेंगे। इसके बाद उन्नीस मुखोंमें भी न्यास किया जाता है। पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार—ये उन्नीस मुख हैं। प्राण-न्यासके मन्त्र इस प्रकार हैं—'प्रणयनशक्त्यात्मने प्राणाय नम', 'अपनयनशक्त्यात्मने अपानाय नम', 'व्यानयनशक्त्यात्मने व्यानाय नम', 'उन्नयनशक्त्यात्मने उदानाय नम' तथा 'समनयनशक्त्यात्मने समानाय नम'। इन्द्रियादिन्यासके मन्त्र इस प्रकार हैं—'अनुसन्धान- शक्त्यात्मने नम', 'निश्चयशक्त्यात्मने नम', 'अहङ्कारशक्त्यात्मने नम', 'सङ्कल्पशक्त्यात्मने नम', 'श्रवणशक्त्यात्मने नम', 'स्पर्शनशक्त्यात्मने नम', 'दर्शनशक्त्यात्मने नम', 'रसनशक्त्यात्मने नम', 'घ्राणशक्त्यात्मने नम', 'वचनशक्त्यात्मने नम', 'आदानशक्त्यात्मने नम', 'गमनशक्त्यात्मने नम', विसर्गशक्त्यात्मने नम', 'आनन्दशक्त्यात्मने नम'। इन मन्त्रोंद्वारा क्रमश चित्त, बुद्धि, अहङ्कार, मन, श्रवण, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका, वाक्, हाथ, पैर, लिङ्ग और गुदा आदिमें उन-उनकी शक्तियोंके रूपम भगवान्का हा निवास है—ऐसी भावना करे। इसके बाद निम्नाङ्कित पाँच मन्त्रोंको पढ़ते हुए व्यापकन्यासपूर्वक चार पादोंका ध्यान करे— ॐ उग्र वीर महाविष्णु जागरितव्यानाय स्थूलप्रज्ञाय सप्ताङ्गायैकोनविंशतिमुखाय स्थूलभुजे चतुरात्मन विश्वाय वैश्वानराय पृथिव्युग्वेद- ब्रह्मधनुगायत्रागार्हपत्याकारात्मने स्थूलसूक्ष्मदीप्तसाक्षात्मने प्रथमपादाय नम ॥ १ ॥