कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 636, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५८८ * श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ३ सप्तात्मा चतुरात्मा अकाररूप ब्रह्माका नाभिमें चिन्तन सप्तात्मा चतुरात्मा मकाररूप रुद्रका भ्रूमध्यमे, सप्तात्मा करे;* सप्तात्मा चतुरात्मा उकाररूप विष्णुका हृदयमे, चतुरात्मा चतुःसप्तात्मा एव चतुरात्मा ॐकाररूप सर्वेश्वरका ॐ ज्वलन्त सर्वतोमुखं खप्नस्थानाय सूक्ष्मप्रज्ञाय सप्ताङ्गायैकोनविंशतिमुखाय सूक्ष्मभुजे चतुरात्मने तैजसाय हिरण्यगर्भाया- न्तरिक्षयजुर्वेदविष्णुरुद्रत्रिष्टुब्दाक्षिणाग्न्युकारात्मकने स्थूलसूक्ष्मबीजसाक्ष्यात्मने द्वितीयपादाय नमः ॥ २ ॥ ॐ नृसिंह भीषण भद्र सुषुप्तस्थानायैकीभूताय प्रज्ञानघनायानन्दमयायात्मानन्दभुजे चेतोमुखाय चतुरात्मने प्राज्ञयेश्वराय घुसाम- वेदरुद्रादित्यजग त्याहवनीयमकारात्मने स्थूलसूक्ष्मबीजसाक्ष्यात्मने तृतीयपादाय नम ॥ ३ ॥ ॐ मृत्युमृत्यु नमाम्यह सर्वेश्वराय सर्वज्ञाय सर्वशक्तये सर्वान्तर्यामिणे सर्वात्मने सर्वयोनये सर्वप्रभवाय स्वाप्ययाय सोम्लोकाथर्ववेद- सवर्तकाग्निमहरुदिराडेकथ्योङ्कारात्मने स्थूलसूक्ष्मबीजसाक्ष्यात्मने चतुर्थपादाय नम ॥ ४ ॥ ॐ उग्र वीरं महाविष्णु ज्वलन्त सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् । नान्त प्रज्ञायानधिष्प्रशायानुभयप्रज्ञायाप्रज्ञाय- नाप्रज्ञायाप्रज्ञानघनायादृष्टायानव्यवहार्यायाग्राह्यायालक्षणायोचिन्त्यायाव्यपदेश्यायकैकात्म्यप्रत्ययसारायामात्राय प्रपञ्चोपशमाय शिवाय शान्ताया- द्वैताय सर्वसहारसमर्थाय परमत्वासहाय प्रभवे व्यासाय सदोज्ज्वलायाविद्याकार्यहोनाय स्वात्मनन्धदशाय सर्वदा द्वैतरहितायानन्तरूपाय मर्वाधिष्ठान- सन्मात्राय निरस्वाविघातमोमोहायाह्वत्रिमाह्वविमर्शायाङ्काराय तुरीयातुरीयाय नम ॥ ५ ॥ इसके बाद पुन प्रणवसे एक बार व्यापक करके निम्नाङ्कितरूपसे अङ्गन्यास करे- ॐ उग्र वीर महाविष्णु पृथिव्यृग्वेदब्रह्मवसुगायत्रीगार्हपत्याकारभूरन्वात्मने सर्वशानशक्त्यात्मने हृदयाय नम । ॐ ज्वलन्न सर्वतोमुखमन्तरिक्षयजुर्वेदविष्णुरुद्र त्रिष्टुन्दक्षिणाग्न्युकारभुव प्रजापत्यात्मने नित्यतृप्त्यैश्वर्यशक्त्यात्मने शिरसे स्वाहा। ॐ नृसिह भीषण भद्र थुसामवेदरुद्रादित्यजग त्याहवनीयमकारस्व सूर्यात्मनेऽनादिबोधशक्त्यात्मने शिखायै वषट् । ॐ मृत्युमृत्यु नमाम्यहं सोम्लोकार्थवं- वेदसवतंकाग्निमहरुदिराडेकप्योङ्कारमूर्ध्वं स्वर्मात्मने स्वातन्त्र्यबलशक्त्यात्मने कवचाय हुम् । ॐ उग्र वीर महाविष्णु ज्वलन्त सर्वतोमुखम्। नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् ओंकारभास्वत्यलुप्तवीर्यशक्त्यात्मने नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ उग्र वीर महाविष्णुं ज्वलन्त सर्वतो- मुखम् । नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् । पृथिव्यकारवेदब्रह्मवसुगायत्रोगापत्यन्तरिक्षोङ्कारयजुर्वेदविष्णुरुद्रत्रिष्टुब्द क्षिणाग्नि- घुमकारसामवेदरुद्रादित्यजग त्याहवनीयसोमलोकोङ्कारायथर्वेदसवतं काग्निमहरुदिराडेकार्पिमात्मनीमत्यात्मनेऽनन्ततेज शक्त्यात्मनेऽस्त्राय फट् । ३ चतुरात्मा होकर अर्थात् चतुर्मूर्त्तिरूपसे आत्माका ही पूजन करके, मूत्तिचतुष्टयमे व्यापक परमानन्दबोधके मिन्धु साक्षीका ध्यान करते हुए उन्हींमें मूत्ति-चतुष्टयके निमग्न होनेकी भावना करे। यही आत्मपूजा है। ४ महापीठ वह्निमुख, सदात्मक तथा गुणबीजरूप है। मूलाधारपर स्थित क्रमश द्वात्रिंशद्-दल, अष्टदल एव चतुर्दल कमल- इस प्रकार उस महापीठकी आकृति है। ५ पृथिव्यादि, अन्तरिक्षादि, द्युलोकादि और सोमलोकादि जो चतुर्विध अष्टक हैं, वे ही बत्तीस होकर बत्तीस दलींमें स्थित हैं। अष्टदल कमलमें सत्, चित्, आनन्द, पूर्ण, आत्मा, अद्वैत, प्रकाश और विमर्श-इनकी स्थिति है, तथा चतुर्दल कमलमें ब्रह्मासर्वेश्वर, विष्णुसर्वेश्वर, रुद्रसर्वेश्वर तथा सर्वेश्वर-सर्वेश्वर-इन चारोंका अवस्थान है। ये ही सब मिलकर परिवार कहे गये हैं। ६ अकार, उकार, मकार तथा ओङ्कारसे सम्बद्ध पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और सोमलोक हैं-इन चारोंके साथ वेद, देवता आदि सात-सातका समुदाय है, इसीको लक्ष्यमें रखकर 'चतु सप्तात्मा' कहा गया है। यद्यपि ये आठ-आठ हैं, तथापि अकार आदिकी गणना न करनेसे सात-सात होते हैं। ७ समष्टि-व्यष्टिगत स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी-इन चतुर्विध स्वरूपोंसे विशिष्ट होनेके कारण उन्हें चतुरात्मा बताया गया है। ८ अग्निका अर्थ यहाँ चिन्मय प्रकाश समझना चाहिये । 'अग्निरूप' कहनेसे यह ध्वनित होता है कि प्रणवके ध्यानमें हाथ-पैर आदिसे युक्त विग्रहकी कल्पना न करके प्रलयकालीन अग्नि एव सूर्यके सदृश प्रकाशमय स्वरूपका ही चिन्तन करना चाहिये।
- लोक, वेद, देवता, गण, छन्द, अग्नि और व्याहृतिरूपसे तो अकार सप्तात्मा है और स्थूल, सूक्ष्म, बीज एव साक्षीरूपसे चतुरात्मा है। यही बात ऒकार आदिने सम्बन्धमें भी है । 'सप्तात्मा' के साथ भी पूर्ववत् 'परिवारसहित' इस विशेषणका सम्बन्ध है। इसी