भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 637

खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५८९ द्वादशान्तमें चिन्तन करे।* सप्तात्मा, चतुरात्मा, चतुःसप्तात्मा, चतुरात्मा एवं आनन्दामृतरूप ओङ्कारका षोडशान्तमें चिन्तन करे।† तदनन्तर इन सबका पूर्वोक्त आनन्दामृतद्वारा चार प्रकारसे अर्थात् देवता, गुरु, मन्त्र और आत्मारूपमें पूजन करके और ब्रह्माका ही, विष्णुका ही, रुद्रका ही, पृथक्-पृथक् इन तीनोंका ही और एक साथ भी इन तीनोंका ही तथा ज्योतिर्मय लिङ्गरूपमें ही देवता, गुरु, मन्त्र और आत्मारूपसे चार बार भलीभाँति नाना प्रकारकी भेट- सामग्रियोंसे पूजन करे। फिर प्रणवके उच्चारणद्वारा उन लिङ्गोंका उपसंहार कर सबको एकीभूत करके अमृतका अभिषेक करे और उस सर्वतेजोमय तेजको बढ़ाये।‡ उक्त सर्वदेवतामय तेजसे त्रिविध—स्थूल, सूक्ष्म एव प्रकार आगेके वाक्योंमें भी समझना चाहिये। यहाँ अष्टदल कमलमें अकारके मन्त्रगणरूपमे बनाये गये जो अकारसहित पृथिवी आदि आठ हैं, वे मानो 'अनुष्टुप्-मन्त्र' के प्रथम पादके आठ अक्षररूप हैं, उन्हींमें स्थित साङ्गोपाङ्ग वेदोंका और चतुर्दल कमलमें स्थित ब्रह्मब्रह्मा, ब्रह्मविष्णु, ब्रह्मरुद्र और ब्रह्मसर्वेश्वरका यहाँ परिवाररूपमे चिन्तन करना चाहिये। आठ दलोंके भीतर पूर्वादि दिशाओंके दलोंमें तो चारों वेदोंका चिन्तन करना चाहिये। और अग्निकोणमें व्याकरण आदि छ वेदाङ्गोंका, नैर्ऋत्यकोणमें मीमांसाका, वायव्यकोणमें न्यायका और ईशानकोणमें इतिहास, पुराण, आगम (तन्त्र), काव्य, नाटक आदिका चिन्तन करना चाहिये। इसी प्रकार चतुर्दल कमलके चार दलोंमेंसे पूर्वमें ब्रह्मसर्वेश्वर, दक्षिणमें ब्रह्मरुद्र, उत्तरमें ब्रह्मविष्णु और पश्चिममें ब्रह्मब्रह्माका चिन्तन करे। इस प्रकार आगे भी चार मूर्तियोंकी स्थिति समझनी चाहिये। तात्पर्य यह कि प्रणवरूप अकार जिनका स्वरूप हैं, ऐसे रजःप्रधान, चन्द्रमण्डलवर्ती श्रीब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मसर्वेश्वरका सरस्वती मूलप्रकृतिके सहित नाभिमें यानी तेजोमण्डलके मध्यभागमें—अष्टदल कमलके मध्यवर्ती चतुर्दल कमलकी कर्णिकामें ध्यान करे।

  • इसी तरह उकारके सम्बन्धीरूपमें बताये हुए जो अन्तरिक्ष आदि सात हैं, उनकी दृष्टिसे सप्तात्मा और स्थूल आदि भेदसे चतुरात्मा उकार ही जिनका स्वरूप है, जो श्रीमूलप्रकृतिके साथ हैं, सत्त्वप्रधान हैं और सूर्यमण्डलके मध्यमें स्थित हैं, उन श्रीविष्णु- सर्वेश्वरका, हृदयके अष्टदल कमलमें ध्यान करे। उकारके सम्बन्धीरूपमें वर्णित अन्तरिक्ष आदि अष्टकरूप जो अनुष्टुप्-मन्त्रके द्वितीय पादके आठ अक्षर हैं, वे प्रत्येक दलमें स्थित हैं और उनके भीतर क्रमशः वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, बलभद्र, श्रीकृष्ण और कल्कि—ये आठ परिवार हैं। उस अष्टदल कमलके मध्यगत चतुर्दल कमलकी मध्य-कर्णिकामें श्रीविष्णुसर्वेश्वरका ध्यान करना चाहिये। इसी प्रकार मकारसम्बन्धी जो द्युलोक आदि अष्टक हैं, वे ही मकारकी गणना न करनेसे सात होते हैं और उन्हींकी दृष्टिसे मकार सप्तात्मा है तथा पूर्ववत् स्थूल-सूक्ष्म आदि भेदसे वह चतुरात्मा है। तादृश मकारस्वरूप रुद्रसर्वेश्वरका भ्रूमध्यमे ध्यान करे। वे उमारूपा मूलप्रकृतिके साथ विराजमान हैं, उनमें तमोगुणकी प्रधानता है और वे अग्निमण्डलमें स्थित हैं। भ्रूमध्यगत अष्टदल कमलके आठ दलोंमें द्युलोकादिरूप अष्टक ही मानो अनुष्टुप्-मन्त्रके तृतीय पादके आठ अक्षरोंरूपमें स्थित हैं और उनमें शर्व, भव, पशुपति, ईशान, भीम, महादेव, रुद्र एव उग्र ही परिवाररूपमें विराजमान हैं। इस अष्टदलके भीतर चतुर्दल कमलकी मध्यकर्णिकामें मकारस्वरूप रुद्र- सर्वेश्वरका ध्यान करना चाहिये। † मकारसम्बन्धी अर्धमात्राके सम्बन्धसे बतायी हुई जो मोमलोक आदि आठ वस्तुएँ हैं, उनमें मात्राकी गणना न होनेसे वे सात होते हैं, उनकी दृष्टिसे ओंकार सप्तात्मा है और पूर्ववत् स्थूल, सूक्ष्म आदि भेदमे चतुरात्मा है। इसके सिवा सम्पूर्ण ॐकारमें अ, उ, म् ( और अर्धमात्रा—ये चार मात्रायें हैं, इनमें प्रत्येक मात्राके साथ एक-एक सप्तकका सम्बन्ध है। ओङ्कारमें वे सभी अन्तर्भूत हैं, अत यह चतुः सप्तात्मा भी है। पहले अर्धमात्राकी दृष्टिसे स्थूलादि-भेदविशिष्ट ओङ्कारको चतुरात्मा कहा गया है, किंतु सम्पूर्ण ओङ्कार भी स्थूल- सूक्ष्म आदि चार भेदोंवाला है, अत दुबारा उसके लिये 'चतुरात्मा' विशेषण दिया गया है। ऐसे तुरीय प्रणवरूप ओङ्कारका, जो गुणोंकी साम्यावस्थारूप उपाधिसे युक्त एव शक्ति-मण्डलमें स्थित और मूल-प्रकृतिरूपा मायाके सहित है, द्वादशान्तमें अर्थात् बत्तीस दलोंवाले कमलमें चिन्तन करे। मूलाधारस्थ बत्तीस दलोंमें बताये हुए पूर्वोक्त देवता ही यहाँ परिवार हैं। बत्तीस दलवाले कमलके भीतर सद् आदि अष्टविध मूर्तियोंसे युक्त अष्टदल-कमल है तथा उसकी भी कर्णिकामें व्याप्त चतुर्दल कमलके भीतर ब्रह्मसर्वेश्वर आदि चार मूर्तियाँ स्थित हैं, उसकी मध्यकर्णिकामें ॐकाररूप सर्वेश्वरका ध्यान करना चाहिये। पूर्वोक्त गुणोंवाले ओङ्कारका ही, जो तुरीय तथा आनन्दामृत- स्वरूप है, षोडशान्तमें चिन्तन करे। अधोमुख द्वात्रिंशद्दल, अष्टदल एव चतुर्दल कमलोंसे तथा उनमें बताये हुए पूर्वोक्त देवरूप परिवारोंसे युक्त पीठको ही यहाँ षोडशान्त कहा गया है। यह आनन्दामृतरूप तुरीय गुणवीरूप उपाधिसे युक्त एव शक्ति-मण्डलमें स्थित है। ‡ यहाँ चतुर्मूर्तियोग, ब्रह्मयोग, विष्णुयोग, रुद्रयोग, भेदयोग, अभेदयोग और लिङ्गयोगका क्रमशः उल्लेख हुआ है। प्रणवका