कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 638, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारणरूप शरीरको व्याप्त करके उनके अधिष्ठानभूत आत्माको सब ओरसे प्रभावित करे अर्थात् सर्वव्यापक आत्माका तेजोमय स्वरूपमे चिन्तन करे। फिर उस तेजका—आत्म- चैतन्यरूप बलका निरोध करके उसके गुणोंमे अर्थात् स्थूलत्व, सूक्ष्मत्व, बीजत्व, साक्षित्व आदि पूर्वोक्त गुणोंसे वाच्य वाचक (परमात्मा एव ओङ्कार) की पूर्ववत् एकता करे। तदनन्तर महास्थूलको महासूक्ष्ममें और महासूक्ष्मको महाकारणमे विलीन करके अकार, उकार और मकार— इन मात्राओंसे (जो क्रमशः विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर- रूप हैं) एकका दूसरीमें लय करते हुए सबका तुरीय ओङ्कार- में लय करे। फिर पूर्ववत् ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्पका चिन्तन करते हुए सबको अविकल्पमें लीन करके अविकल्परूप परमात्माका चिन्तन करे और उन्हींमें सबका उपसंहार कर दे।
उच्चारण करके अमृतका स्राव करे। अमृत-स्राव भावनाका विषय है। पूर्वोक्त ब्रह्मसर्वेश्वर आदि चारों मूर्तियोंका, नाना प्रकारकी भेंट-सामग्रियोंसे, चतुर्विध पूजा करके उन मूर्तियोंको तेजसे प्रकट हुई मानकर उनका तेजोमय चार लिङ्गरूपमे चिन्तन करे तथा मन्त्रराज नारसिंहसहित प्रणवका उच्चारण करके भावनाद्वारा उक्त चारों लिङ्गोंको एक रूपमें परिणत करके उसपर अमृतका स्राव करे—यह चतुर्मूर्तियोग है। 'ब्रह्माका ही' इस वाक्याशके द्वारा ब्रह्मयोग सूचित किया गया है। जिस प्रकार चतुर्मूर्त्ति-योगमें चार स्थानोंमे चार मूर्तियोंका चिन्तन, पूजन, उन तेजोमयी मूर्तियोंका उपमहार, एकीकरण और अमृतस्राव आदि विधि बतायी गयी थी, उसी प्रकार इस ब्रह्मयोगमें केवल सरस्वतीरूप मूलप्रकृतिसहित सपरिवार ब्रह्मसर्वेश्वरका ही चिन्तन और पूजन आदि करने चाहिये। 'विष्णुका ही' इस वाक्याशमे विष्णुयोग सूचित किया गया है। पूर्वोक्त चारों मूर्तियोंकी जगह चारों स्थानोंमे विष्णुसर्वेश्वरका ही मूल-प्रकृति मा तथा परिवारसहित चिन्तन करके पूजन आदि करना विष्णुयोग है। 'रुद्रका ही' इस वाक्यांगसे रुद्रयोगकी सूचना दी गयी है। यहाँ ना चार मूर्तियोंकी जगह चारों स्थानोंमें उमारूपा मूलप्रकृति और पूर्वोक्त परिवारसहित श्रीरुद्रसर्वेश्वरका ही ध्यान एव पूजन आदि कर्तव्य है। 'विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् रूपमें इन तीनोंका ही' इस वाक्याँशसे भेदयोग सूचित किया गया है। यहाँ चारों स्थानोंमें तीनों प्रकृतियों तथा त्रिविध परिवारोंसहित उक्त ब्रह्मसर्वेश्वर आदि तीनों मूर्तियोंका ही चिन्तन और पूजन आदि करे । इस योगमें सर्वत्र द्वात्रिंशद्दल, अष्टदल और चतुर्दल कमलोंको पूर्वोक्त देवताओंसे विशिष्ट रूपमें ही चिन्तन करना चाहिये। इनमें ब्रह्मा पीतवर्ण और चार मुखोंवाले हैं। उनके चार भुजाएँ हैं और हाथोंमें क्रमशः स्रुक्-स्रुवा, अक्षमाला, दण्ड और कमण्डलु धारण किये हुए हैं। उनके साथ श्वेतवर्णा सरस्वती हैं, जिनके हाथोंमें अक्षमाला, पुस्तक, मुद्रा और कलश शोभा पाते हैं। भगवान् विष्णुका विग्रह विद्युत्के समान कान्तिमान् है, वे अपने चार हाथोंमें चक्र, शङ्ख, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं। उनके साथ रक्तवर्णा लक्ष्मी हैं—जिनके हाथोंमें दो कमल, श्रीफल और अभयकी मुद्रा है। भगवान् शिवकी कान्ति श्वेत है। वे अपने चार हाथोंमें परशु, हरिण, शूल और कपाल धारण किये हुए हैं। उनके साथ श्यामवर्णा उमा हैं—जो पाश, अङ्कुश, अभय और वर धारण करती है। तीनों मूर्तियोंको एक ही पीठपर विराजमान समझना चाहिये। शक्तियोंको उनके अङ्कमें अथवा वाम ऊरुपर बैठी हुई ध्यानमे देखे। कमलके आठ दलोंमेसे प्रत्येक दलम वेदादि, वराहादि, शर्वादि तथा सद् आदि इन चतुर्विध अष्टावरणोंका चिन्तन करना चाहिये । 'एक रूपमें भी इनका ही' इस वाक्यांशके द्वारा अभेद-योगकी सूचना दी गयी है। ब्रह्मा आदि तीनोंको एक विग्रहन ही देखकर अर्थात् इन्हें एकरूप ही मानकर चारों स्थानोंमें इनका चिन्तन और पूजन आदि ' करे। इनके साथ शक्तियोंकी अविभक्तरूप मूलप्रकृति माया और पूर्वोक्त परिवारोंका भी चिन्तन करना चाहिये। ब्रह्मा आदि तीनोंको जहाँ एकता है, वही सर्वेश्वर-विग्रह है, अत यहाँ सर्वेश्वर और मायाशक्तिका ही चिन्तन है। सर्वेश्वरके तीन मुख और छ बाहु हैं। वे अपनी भुजाओंमें हरिण, परशु, शङ्ख, चक्र, अक्षमाला और दण्ड धारण किये हुए ह। उनके श्रीविग्रहका वर्ण अनिर्देश्य है, वाणीद्वारा उसका कोई स्पष्ट निर्देश नहीं हो सकता। उनकी शक्तिभूता जो माया प्रकृति है, वह भी तीन मुख और छ भुजाओंवाली है। उसके हाथोंमें पाश अङ्कुश, कमल, कमल-मुद्रा और पुस्तक है। उसका कान्ति भी अनिर्देश्य है। 'लिङ्गरूपन हो' इस वाक्याशके द्वारा लिङ्गयोग सूचित किया गया है, शक्ति और परिवारसहित ब्रह्मा आदिका सर्वत्र ज्योतिर्मय लिङ्गरूपसे चिन्तन ओर पूजनादि करे, यही लिङ्ग- योग है। इन सबके पूजनकी विधि और मन्त्रोंका उल्लेख श्रीविद्यारण्यमुनिद्वारा विरचित दीपिका नामक व्याख्यामे विस्तारके साथ हुआ है। जिज्ञासु साधक वहाँसे उनका सङ्ग्रह कर सकते है। यहाँ अधिक विस्तारने भयसे उल्लेख नहीं किया जा सका है।