कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] * महांन्तं विभुमात्मानं मन्त्वा धीरो न शोचति * ५०१ चतुर्थ खण्ड अपने आत्माका पहले तुरीय-तुरीयरूपसे और पीछे भगवान् नृसिंहके रूपमें ध्यान करके ब्रह्मके साथ अपने-आपको एकीभूत करनेकी विधि पूर्वोक्त इस आत्मा एव परब्रह्मरूप ओङ्कारको, जो ओतादि- रूपसे प्रसिद्ध तुरीय ओङ्कारके पूर्वभागमे साक्षीरूपमे प्रकाशमान है, मन्त्रगत अनुष्टुप्का 'नमामि' पदतत्र उच्चारण करके, उसके द्वारा नमस्कार करके प्रनत नरे । प्रनत करके भावनाद्वारा ममारके उपसहारकी शक्ति प्राप्त रे । फिर चार मात्राओंवाले ओङ्कारका उच्चारण करते हुए पहले बताये अनुसार विराट्, तैजस आदिरा उत्तरोत्तरगे मह्तार करके अनुष्टुप-मन्त्र के अवशिष्ट 'अहम्' पदका उच्चारण करते हुए अपने आत्मान तुगीय तुगीयरूपमे ध्यान गरे । इसके अनन्तर इस आत्मा एव परब्रह्मरूप ओङ्कार को ही, जो ओत अनुज्ञातु आदिरूपसे प्रसिद्ध तुरीय ओङ्कारके पूर्व भागमे साक्षीरूपमे प्रकाशित हो रहा है तथा जो उग्र, बीर आदि ग्यारह पदांके गुणांमे युक्त एकादशात्मा नरसिंह- मन्त्रम्वम्प है; उन्हे नमस्कार करके ओङ्कारका उच्चारण मरते हुए ओनादिको अनुज्ञातु आदिमें लय करे। फिर तुरीय तुरीयको उपलब्ध करके 'उग्रम्' आदि एक एक पदसे उग्रत्व आदि गुणोंगे विशिष्टरूपमे भी उन्हींश चिन्तन करते हुए अपने आत्मम्पमे भगवान नृसिंहका ध्यान रे । तदनन्तर इम आत्मा परब्रह्मरूप ओङ्कारमा ही, ने ओत अनुज्ञातृ आदिरूपमे प्रसिद्ध तुरीय ओकारके अग्रभागम मार्थीरूपम प्रकाशित हो रहा है, प्रणवके द्वारा ही भलीभांति चिन्तन करके अनुष्टुप्-मन्त्रके 'उग्रम्' से लेकर 'मृत्युमृत्युम्'तक नौ पदोक्त माथ सन्, चित्, आनन्द, पूर्ण और आत्मा--इन ब्रह्मके पांचो म्वरूपोंमेंसे प्रत्येकका सम्बन्ध होनेसे जो पञ्चविध नवत्मक म्वरूपवाले हैं, ऐसे सच्चिदानन्द- पूर्णात्मस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्मका भलीभांति ध्यान रे*। तत्पश्चात् अनुष्टुप् मन्त्रके 'अहम्' इस पदके द्वारा अपनेको ग्रहण कर 'नमामि' इस पदके द्वारा नमस्कार करके ब्रह्मके साथ अपने आपको एरीभूत कर दे * । अथवा केवल अनुष्टुप्-मन्त्रके द्वारा ही भगवान्की सर्वात्मना और मर्वरूपताका चिन्तन करे। ये भगवान् ही 'नृ' (आत्मा) हैं, ये ही सर्वत्र सर्वदा सबके आत्मा हैं। ये ही सिह (बन्धननाशक) हैं। वे ही श्रुति-स्मृति आदिमें प्रसिद्ध परमेश्वर हैं। क्योंकि ये सर्वत्र सर्वदा सबके आत्म- म्पमे विद्यमान होकर सबके अज्ञान आदिको अपना ग्राम बनाते हैं-मभीका अज्ञान दूर करके उन्हें अपना स्वरूप बना लेते हैं। अतः सबके आत्मा (नृ) तथा 'मि' बन्धन का 'ह' अर्थात् नाशक होनेके कारण ये ही एकमात्र नृसिंह हैं। ये ही तुरीय हैं। ये ही उग्र हैं। ये ही वीर हैं। ये ही महान् हैं। ये ही विष्णु हैं। ये ही ज्वलन् (सब ओरसे देदीप्यमान) हैं। ये ही सर्वतामुख हैं। ये ही नृसिंह हैं। ये ही भीषण (वायु, सूर्य तथा मृत्युको भी भयभीत करनेवाले) हैं। ये ही भद्र (परम कल्याण एवं आनन्दके निकेतन) हैं तथा ये ही मृत्युके भी मृत्यु हैं। ये ही 'नमामि' (परिपूर्ण ज्ञानानन्द स्वरूप आत्माको आच्छादित करनेवाले अज्ञानसे शून्य ) हैं और ये ही 'अहम्' पदके एकमात्र आश्रय हैं। इस प्रकार पहले बतायी हुई उपासनासे तथा यहाँ अनुष्टुप पाठ मिश्रित उपासनामे प्रणवमय परमात्माके ध्यानयोगमें आरूढ हो ब्रह्मस्वरूप ओङ्कारमें ही अनुष्टुप् मन्त्रको अन्तर्भूत करके मब कुछ ओङ्कार ही है- इस प्रकार प्रणववाच्य परमात्माका चिन्तन करे । हमी विषयमे दो मन्त्र हैं, जिनका अन्वय और अर्थ इस प्रकार है-सिंहम् = जो वस्तुतः समस्त बन्धनोंको काटने- वाला एवं अविचल होकर भी उपाधिवश या अविवेकके कारण चञ्चल-सा प्रतीत हो रहा है, ऐसे 'सिंह' नाममे कहे हुए आत्माको, समन्य=अपनी ही महिमामे स्थिर करके, गुणधांन् = स्थूलत्व और स्थूलभोक्तृत्व आदि पूर्वोक्त गुणोंसे समृद्ध होकर जो वैश्वानर आदि स्वरूपको प्राप्त हो गये हैं, एम, म्वसुतान् = म्व अर्थात् आत्माके ही स्थूल विश्व आदि पुत्रोंको (जो परमात्माके प्रथम आदि पाद हैं), अधश्वस =
- यानके मम्य उचारणा योग्य वाक्य इस प्रकार होगा- ॐ उग्र मच्चिनानन्दपूर्णप्रत्यक्मन्मात्मान नृसिह परमात्मान पर ब्रह्म चिन्तयामि । ॐ वीर मच्चिनान्दपूर्णप्रत्यक्मन्मात्मान नृसिंह परमात्मानं पर ब्रह्म चिन्तयामि । इसी प्रकार 'मृत्युमृत्युम' पन्तके नौ वाक्य होंगे । इसके बाद फिर इमा ब्रह्ममे 'मदात्मानम्' की जगह 'चिदात्मानम्' कर दिया जायगा, उसके भी नौ वाक्य होंगे । फिर 'आनन्दात्मानम' कर देनेमे उसके भा नौ वाक्य होंगे । श्मो प्रकार 'पूर्णात्मानम' और 'प्रत्यगात्मानम' का भी क्रमश सन्निवेश करनेमें ९०९ वाक्य और भी होंगे ।
- नमस्कार-वाक्य भी इमी प्रकार ४५ हो सकते हैं। उदाहरणके लिये एक लिख दिया जाता है- 'ॐ उग्र सच्चिदानन्दपूर्ण- प्रत्यक्सदात्मान (चिदात्मान इत्यादि ) नृसिंह परमात्मान पर ब्रह्मह नमामि।' ब्रह्मकेसाथ आत्माको एमीभूत करना भावनाद्वारा ही होता है।