कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 640, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५९२ * श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ५ भेदोने प्रधान प्रणवकी, अङ्गे=अकार आदि मात्राओसे संयोज्य = परस्पर समानताके कारण सयुक्त करके अर्थात् पहले बताये अनुसार ॐकारकी मात्राओं तथा परमात्माके प्रथम- द्वितीय आदि पदोंकी एकताका अनुभव करके; हत्वा = स्थूलका सूक्ष्ममे और सूक्ष्मका कारणमे लय करते हुए इसी क्रमसे सबका तुरीयमे संहार करके वन्ध्याम् (कृत्वा) = वहाँ कारणरूप मायाको पूर्वोक्त योगयोगके द्वारा अपने वशमे करके स्फुरन्तीम् (नत्वा) = अनुज्ञातृ-योगके द्वारा 'आत्म- सत्ताके अधीन ही उनकी सत्ता और स्फूर्ति है' ऐसा अनुभव करके असतीम् (कृत्वा) = अनुज्ञायोगके द्वारा उसकी पृथक् सत्ताका अभाव-सा करके' निपीय = उसे साक्षी चैतन्यमे निमग्न (विलीन) कर दे। यों करनेके पश्चात्; सिंहेन सम्बध्य = अज्ञान आदिने सर्वथा असम्पृक्त विशुद्ध बोधमय परमात्माके साक्षात्कारद्वारा उस मायाके आवरणको छिन्न भिन्न करके अथवा मन्त्रराज नारसिंहके जगद्वारा तुरीय- तुरीय परमात्माका चिन्तन करते हुए भगवान् और उनके मन्त्रके प्रभावसे मायाका सर्वथा सहार करके [च स्थितो भवति = जो स्थित होता है,] स एष वीरः = वही यह उपासक वीर है- उसको कभी संसारसे पराभव नहीं प्राप्त होता। ऋक्प्रोतान् = प्रणवकी मात्राओंसे व्याप्त चतुः-सप्तात्मा विराट् आदि तथा ब्रह्मणवेश्वर आदिकोः पदैः स्पृष्ट्वा = अनुष्टुप्-मन्त्रके प्रत्येक पदसे सयुक्त करके अर्थात् प्रणवकी मात्राओ तथा अनुष्टुप्के पादोकी पूर्ववन् एकताका चिन्तन करके, हत्वा = क्रमश. उनका पूर्वोक्त रीतिसे सहार करके, ताम् = उन कारणरूपा मायाको. ( जित्वे ) स्वयम् अगसत् = स्वयं ग्रस लिया अर्थात् पूर्वोक्तऋपमे परमात्मतत्त्वके अनुभवसे मायाका सर्वथा संहार कर दिया. [ सः = वह विद्वान् उपासक, ] नत्वा = इसी खण्डमें बतायी हुई रीतिसे भगवान्- को नमस्कार करके; च = तथा. बहुधा दृष्ट्वा = मन्त्रराज नारसिंहके पदोंके अनुसार उग्र, वीर आदि बहुत से रूपोंमे भगवान्का साक्षात्कार करके, स्वयं नृसिंहः सन् उद्बभौ = स्वय नृसिंहस्वरूप होकर अथवा मनुष्योमे श्रेष्ठ होकर उद्भासित होता है. अथवा उनके समक्ष स्वय भगवान् नृसिंह तेजोमय स्वरूपसे प्रकट हो जाते है; इति = इस प्रकार ये मन्त्र हैं। इन दो मन्त्रोंमें प्रथमसे लेकर चतुर्थ खण्डतकके अभिप्रायका संक्षेपतः संग्रह हो गया है । पञ्चम खण्ड अनुष्टुप् मन्त्रका ओंकारमें अन्तर्भाव करके उसीके द्वारा परमात्माके चिन्तनकी विधि (पहले बताया गया है कि अनुष्टुप्-मन्त्रका ओङ्कारमें अन्तर्भाव करके उसीके द्वारा परमात्माका चिन्तन करे । अब प्रश्न होता है कि कैसे अनुष्टुप्का प्रणवमें अन्तर्भाव हो और किस प्रकार उसके द्वारा परमात्माका चिन्तन हो । इस जिज्ञासा- का समाधान करनेके लिये इस खण्डका आरम्भ हुआ है। 'अथ' शब्द प्रकरणके आरम्भका सूचक है।) ओङ्कारकी प्रथम मात्रारूप यह अकार आततन (अतिशय व्यापक) अर्थवाला ही है। अत यह आततम (अतिशय व्यापक) अर्थवाले आत्मामे ही संगत होता है, सबके आत्मा भगवान् नृसिंहमे-नृसिंह नामसे प्रसिद्ध परब्रह्ममें ही यह गतार्थ होता है, क्योंकि यह अकार ही आततम (अतिशय व्यापक) है। यही साक्षी है। यही ईश्वर है। अतः यह सर्वगत है- सर्वत्र व्यापक है, इससे भिन्नरूपमें यह सम्पूर्ण जगत् कोई अस्तित्व नहीं रखता, क्योंकि यही व्याप्तम-अतिशय व्यापक है। यह सब जो कुछ दिखायी देता है, यह आत्मा ही है। जो यह आत्मा है, वही यह सब कुछ है। जो कुछ प्रतीत होता है, सब मायामात्र है। आत्मा या अकारसे भिन्नरूपमे इसकी सत्ता नहीं है। यह अकार ही उग्र है क्योकि यही व्याप्तम-अतिशय व्यापक है। यह अकार ही वीर है, क्योकि यही व्याप्ततम है। यह अकार ही महान् है, क्योंकि वही व्याप्तम है। यह अकार ही विष्णु है, क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही ज्वलन् (सब ओर देदीप्यमान) है, क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही सर्वतोमुख है; क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही नृसिंह है क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही भीषण है, क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही भद्र है; क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही मृत्युमृत्यु है; क्योकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही 'नमामि' ( आत्मतत्त्वका आच्छादन करनेवाले अज्ञानसे शून्य ) है; क्योंकि यही व्याप्तम है। यह अकार ही 'अहम्' है, क्योकि यही व्याप्तम है। जो इस प्रकार जानता है, वह नित्यमुक्त आत्मा ही हो जाता है। वह नृसिंहस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है। वह कामनारहित होता है। उसके मनसे सब लौकिक कामनाएँ