कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 641, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५९३
[बायाँ स्तम्भ]
निकल जाती हैं। उसे सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्राप्त हो जाता है—उसके मनमें किसी भी वस्तुको पानेकी इच्छा शेष नहीं रहती। वह केवल आत्माकी ही कामना रखता है, अनात्माकी नहीं। मृत्युके पश्चात् उसके प्राण उत्क्रमण (कर्मफलभोगके लिये ऊपरके लोकोंमें गमन) नहीं करते, यहीं—आत्मामें ही एकीभावको प्राप्त हो जाते हैं। वह पहलेसे ब्रह्मस्वरूप होता हुआ ही पुनः ब्रह्मको ही प्राप्त होता है (केवल ब्रह्मसे भिन्न होनेका भ्रममात्र दूर होता है)।
यह ॐकारकी दूसरी मात्रा जो उकार है, वह उत्कृष्टतम (अतिशय श्रेष्ठ) अर्थवाला ही है। अतः यह अतिशय श्रेष्ठ अर्थवाले आत्मामें अर्थात् नृसिंहदेवस्वरूप परब्रह्ममें ही गतार्थ होता है। इसलिये यह उकार सत्यस्वरूप है। इससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु सत्य नहीं है। असत् होनेके कारण वह सब प्रमेय है—उसमें मान-सम्बन्धकी योग्यताका अभाव है। वह अनात्मप्रकाश है—दूसरेसे प्रकाशित होनेवाली वस्तु है, उसमे स्वयं अपनेको प्रकाशित करनेकी क्षमता न होनेसे वह असत् है। यह उकारस्वरूप आत्मा स्वप्रकाश है—अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला है। ('मैं हूँ' इस तथ्यको हृदयङ्गम करनेके लिये अन्य प्रकाश या प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती, इसका अनुभव स्वतः होता है।) असङ्ग है, अतः अपने सिवा दूसरी किसी अनात्म वस्तुको नहीं देखता। इसीलिये इसे अन्य किसी नामसे ख्याति नहीं प्राप्त हुई, यह केवल सर्वोत्कृष्ट आत्ममात्र है। यह आत्मस्वरूप उकार ही अनुष्टुप्-मन्त्रका अङ्गभूत उग्र है—उसके उग्रत्व-गुणसे विभूषित है, क्योंकि यही उत्कृष्ट (सर्वश्रेष्ठ) है। यह उकार ही वीर है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही महान् है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही विष्णु है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही ज्वलन् (सब ओरसे देदीप्यमान) है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही सर्वतोमुख है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही नृसिंह है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही भीषण है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही भद्र है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही मृत्युमृत्यु है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही 'नमामि' है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। यह उकार ही 'अहम्' है, क्योंकि यही उत्कृष्ट है। इसलिये आत्माको ही उकारके रूपमें जाने।
जो इस प्रकार जानता है, वह आत्मा ही होता है— श्रीनृसिंहदेवस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है। वह कामनासे रहित उ० अ० ७५—७६—
[दायाँ स्तम्भ]
होता है। उसके मनसे सब लौकिक कामनाएँ निकल जाती हैं। उसे सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्राप्त हो जाता है—उसके मनमे किसी भी वस्तुको पानेकी इच्छा शेष नहीं रहती। वह केवल आत्माकी ही कामना रखता है, अनात्माकी नहीं। मृत्युके पश्चात् उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते (कर्मफलभोगके लिये ऊपरके लोकोंमे गमन नहीं करते), यहीं—आत्मामें ही एकीभावको प्राप्त हो जाते हैं। वह पहलेसे ब्रह्मस्वरूप होता हुआ ही पुन. ब्रह्मको प्राप्त होता है (केवल ब्रह्मसे भिन्न होनेका भ्रममात्र दूर होता है)।
ओङ्कारकी यह तीसरी मात्रा जो मकार है, वह महाविभूति (असीम ऐश्वर्य) के अर्थमें है। यह महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न आत्मामें—श्रीनृसिंहदेवस्वरूप ब्रह्ममें ही गतार्थ होता है। इसलिये यह मकाररूप आत्मा अनल्प (महान्) है, अभिन्न- रूप (अद्वितीय) है, स्वप्रकाश—अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला है तथा यह मकारस्वरूप आत्मा ब्रह्म ही है। यही अतिशय व्यापक और अतिशय श्रेष्ठ है। यह ब्रह्म ही सर्वज्ञ, महामायावी तथा महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही उग्र है, क्योंकि यही महाविभूति (परमैश्वर्य) से सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही वीर है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही महत् है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही विष्णु है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही ज्वलन् (सब ओरसे देदीप्यमान) है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकार- स्वरूप ब्रह्म ही सर्वतोमुख है, क्योकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही नृसिंह है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही भीषण है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही भद्र है; क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही मृत्युमृत्यु है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही 'नमामि' है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है। यह मकारस्वरूप ब्रह्म ही 'अहम्' है, क्योंकि यही महाविभूतिसे सम्पन्न है।
इसलिये अकार और उकारके द्वारा इस अतिशय व्यापक, अतिशय उत्कृष्ट, चिन्मात्रस्वरूप, सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी, सबको अपनेमें लीन करनेवाले, सबकी प्रीतिके एकमात्र आश्रय, केवल सच्चिदानन्दमय, एकरस आत्माका—जो इस सत्, चित् आदिके वाच्यभेदसे होनेवाली भेद-प्रतीतिके पूर्वसे ही सबके साक्षीरूपमें भलीभाँति प्रकाशित है—अनुसन्धान