कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ७ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५९५
ही क्रीडा, आत्मासे ही संयोग और आत्मामें ही आनन्दका अनुभव करते हुए तथा प्रणवको ही स्वप्रकाश, विशेषणशून्य, परब्रह्म जानते हुए उसीमें लीन हो गये । इसलिये देवताओंके मतका आचरण करते हुए प्रणवके वाच्यार्थभूत परब्रह्ममें विलीन हो जाय । इस प्रकार जानने और करनेवाला विद्वान् आत्मासे ही आत्माको परब्रह्मरूपमें देखता है। इस विषयमें यह श्लोक है- अङ्गेष्वङ्गं संयोज्य सिंहं शृङ्गेषु योजयेत् । अङ्गाभ्यां शृङ्गमावद्ध्य त्रयो देवा उपासते ॥ अङ्गेषु=प्रणवकी अकार, उकार और मकार-इन मात्राओं- में, अङ्गम् संयोज्य=अवयवशून्य तुरीय परमात्माका संयोग करके अर्थात् परमात्माको ही ओंकारका वाच्यार्थ जानकर; सिंहम्=नृसिंहदेवतासम्बन्धी मन्त्रराज अनुष्टुप्को, शृङ्गेषु योजयेत्=प्रणवकी अकारादि मात्राओंमें नियुक्त करे अर्थात् मन्त्रराज अनुष्टुप्को प्रणवमें ही अन्तर्भूत करे । तत्पश्चात्; अङ्गाभ्याम्=प्रणवकी दो मात्राओं-अकार-उकारद्वारा; शृङ्गम=प्रणवकी एक मात्रा-मकारको, आवद्ध्व=बाँधकर अर्थात् मकारमें उनके लयकी भावना करते हुए तीनों मात्राओंकी एकताका बोध एवं चिन्तन करके, त्रयो देवा उपासते=तीनों देवता (उत्तम, मध्यम और अधम अधि- कारी) ऊँची स्थिति प्राप्त कर लेते हैं ( इस प्रकार इस श्लोकमें पाँचवें-छठे खण्डोंका सारांश आ गया है)।
सप्तम खण्ड परमात्मा तथा आत्माकी एकताका अनुभव एवं चिन्तन करनेका प्रकार कहते हैं, देवताओंने प्रजापतिसे कहा- 'भगवन् ! पुनः हमें ज्ञानोपदेश कीजिये ।' यह सुनकर प्रजापति बोले- 'तथास्तु ।' फिर उन्होंने इस प्रकार उपदेश देना प्रारम्भ किया-आत्मा अज (जन्मरहित), अमर (मृत्युरहित), अजर (जरारहित), अमृतस्वरूप, अभय, अशोक (शोक- हीन), अमोह (मोहशून्य), अनशनाय (भूखरहित), अपिपास (प्याससे रहित) तथा अद्वैत है। और अकार इन सभी विशेषण-शब्दोंका आदिभूत है; अतः अकारके द्वारा इस अजत्व आदि गुणोंसे विशिष्ट आत्माका अनुसन्धान (चिन्तन) करके*, फिर उदुत्कृष्ट१ (अतिशय श्रेष्ठतम), उदुत्पादक (सबके स्रष्टा), उदुत्प्रवेष्टा (परमात्मारूपसे संसारकी सृष्टि करके जीवरूपसे प्रवेश करनेवाला), उदुत्थापयिता (नियन्ता- रूपसे सबको मर्यादामें स्थापित करनेवाला), उदुद्ध्रष्टा (विष्णुरूपसे पालन करते समय सदा सबपर विशेषरूपसे दृष्टि रखनेवाला), उदुत्कर्ता (सर्वोत्कृष्ट कर्ता), उदुत्यथवारक (स्वयं बुद्धि, विवेक और सहारा देकर सबको सदा कुमार्ग- से निवृत्त करनेवाला), उदुद्भासक (रुद्ररूपसे सबके परम संहारक), उदुद्धान्त (कारणरूपसे सर्वत्र व्यापक) तथा उदुत्तीर्णविकृति (साक्षीरूप होनेसे सब विकारोंके ऊपर उठे हुए) होनेके कारण उकारके द्वारा परम-सिंह१ (परब्रह्म) का अनुसन्धान (चिन्तन) करे। (सारांश यह कि ब्रह्म उत्कृष्टत्व आदि गुणोंसे युक्त है, अतः ये 'उदुत्कृष्ट' आदि शब्द उन-उन गुणोंसे विभूषित ब्रह्मके वाचक हैं, तथा 'उदुत्कृष्ट' आदि सभी विशेषणोंका आदि अक्षर उकार है; अतः यह उकार भी तत्तच्छब्दस्वरूप ही है। इस प्रकार समानाधिकरणता होनेसे उकारके द्वारा परब्रह्मका चिन्तन करना चाहिये ।) तत्पश्चात् अकारस्वरूप इस आत्माको उकारके पूर्वार्धभागरूप ब्रह्मके प्रति आकृष्ट करे- आत्माकी ब्रह्मके साथ एकता करे, अर्थात् आत्माको ब्रह्म- स्वरूप जाने। फिर उकारके उत्तरार्धभाग अर्थात् उत्तर मात्रा- द्वारा पूर्वोक्त ब्रह्मको ग्रहण करके मकारके अर्थभूत इस आत्मा- के साथ एकीभूत करे-ब्रह्म और आत्माको एक जाने। प्रणवकी तीसरी मात्रा मकारके द्वारा आत्माका ग्रहण इसलिये किया जाता है कि मकार और आत्मा दोनों ही महत् (सर्व- व्यापी), महस् (चिन्मय तेजसे युक्त), मान (सर्वसाधक प्रमाणस्वरूप), मुक्त (सब प्रकारके बन्धन और परतन्त्रतासे
- आगे आनेवाले 'आत्मना एकीकुर्यात्' (आत्मासे एकाकार करे) इस वाक्यके साथ सम्बन्ध होनेपर वाक्य पूरा होता है। यहाँ आत्माके दस विशेषण दिये गये हैं। उनमें चारके द्वारा उसमें देहधर्मका निराकरण किया गया है। फिर तीनके द्वारा बुद्धि-धर्म- का, दोके द्वारा प्राण-धर्मका और एकके द्वारा सामान्यत सभी प्रकारके धर्मोंका निषेध किया गया है। १ उत्कृष्टत्वधर्मोदुत्कृष्टत्वे सति उत्कृष्टत्वम् उदुत्कृष्टत्वम्= उत्कर्षसूचक धर्ममात्रसे उत्कृष्टता रखकर जो उत्कृष्टत्व होता है, वही 'उदुत्कृष्टत्व' है । सब प्रकारके सांसारिक धर्मोंसे रहित होते हुए सर्वज्ञत्व आदि गुणोंमे विशिष्ट होना ही ब्रह्मकी उदुत्कृष्टता है। १ बन्धनकारक अज्ञानका नाशक होनेसे 'सिंह' शब्द ब्रह्मका वाचक है।