भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 832 में से

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पृष्ठ 644

५९६ : श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् : [ खण्ड ७


[बायाँ स्तम्भ]

। सर्वथा शून्य), महादेव (परप्रकाशमय), महेश्वर (सर्व- नियन्ता), महान्, महाचित्, महानन्द—अर्थात् असीम सच्चिदानन्दमय तथा महाप्रभु (संनिधि एव सत्तामात्रसे सबके प्रवर्तक) रूप है। आत्मा महत्त्वादि गुणोमे विशिष्ट है और मकार 'महत्' आदि शब्दोका आदि होनेके कारण तत्तत्स्वरूप है। जो यो जानता है, वह शरीररहित, इन्द्रिय- रहित, प्राणरहित, तम (मोह एव अज्ञान) से रहित तथा शुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप स्वराट् (स्वयम्प्रकाश ब्रह्म) हो जाता है।

जब कोई किसीसे पूछता है कि 'तुम कौन हो?' तब वह 'अहम्' (मै हूँ) ऐसा उत्तर देता है। उसी प्रकार यह समस्त प्राणिसमुदाय 'अहम्' कहकर ही अपनेको सूचित करता है। अतः 'अहम्' यह सबका वाचक है। इस 'अहम्'का आदि अक्षर यह प्रणवकी प्रथम मात्रारूप अकार है। अतः यह अकार भी सबका वाचक होनेसे सर्वरूप है, वह पूर्वोक्त प्रकारसे जाननेवाला विद्वान् वही (सर्वरूप ही) हो जाता है। सम्पूर्ण जगत् यह आत्मा ही है, क्योकि यह सबका अन्तरात्मा है। यह सम्पूर्ण जगत् बिना आत्माके नहीं रह सकता। अतः आत्मा ही यह सब कुछ है। अतः सर्वात्मक अकारके साथ सर्वात्मक आत्माका अनुसंधान (चिन्तन) करे। सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही यह सब जगत् है। यह सब कुछ सच्चिदानन्दस्वरूप है।

निश्चय ही यह सब कुछ सत्वरूप है, क्योकि 'तत् सत् (वह है)' ऐसी प्रतीति सबको होती है। निश्चय ही यह सब कुछ चित् (चिन्मय) है; 'घट प्रकाशित होता है, पट प्रकाशित होता है' इत्यादि रूपमें सब कुछ प्रकाशस्वरूप (चिन्मय) ही प्रतीत होता है। देवताओ! क्या तुमने समझ लिया कि 'सत्' क्या है? (देवता बोले—) यह यह सत् है अर्थात् 'इदम्' रूपसे प्रतीत होनेवाली घट पट आदि सभी वस्तुएँ सत् हैं। (प्रजापतिने कहा—) नहीं। 'इदम्' रूपसे प्रतीत होनेवाला सम्पूर्ण जगत् ही असत् (नाशवान्) है, अतः वह सत् नही है। 'अनुभूति' ही सत् है। यदि पूछो कि 'यह अनुभूति क्या है?' तो सुनो। 'इयम्-इयम्' (यह- यह अनुभूति है) यों कहनेसे अनुभूतिका ज्ञान नहीं होता। अनुभूति वाणीका विषय नहीं है, इसलिये प्रजापतिने बिना • कुछ कहे ही स्वय अनुभव करते हुए देवताओंको उसका स्वरूप बताया, स्वतःसिद्ध स्वरूप ही अनुभूति है—यह बात देवताओको समझायी। इसी प्रकार 'चित्' और 'आनन्द'-


[दायाँ स्तम्भ]

को भी बिना कुछ कहे ही स्वय अनुभव करते हुए प्रजापतिने देवताओसे बताया। तात्पर्य यह कि स्वतःसिद्ध स्वरूप शुद्ध- बुद्ध आत्मा ही चित् और आनन्द है, 'इदम्' रूपमे प्रतीत होनेवाला प्राकृत दृश्य प्रपञ्च नहीं। इसी प्रकार ब्रह्मके अन्य सब लक्षण भी स्वतःसिद्ध आत्मस्वरूपके ही बोधक हैं। उनका वाणीद्वारा प्रकाशन नहीं हो सकता, वे सब अनुभवैक- गम्य हैं, परतु केवल मौन हो जानेसे देवता ब्रह्मका स्वरूप अच्छी तरह समझ न सके, इसलिये प्रजापति 'आनन्द' शब्द- के द्वारा ब्रह्मके स्वरूपका (लक्षणमे) परिचय कराते हैं— वह ब्रह्म परम आनन्द है। उस ब्रह्मका नाम है—'ब्रह्म'। इस 'ब्रह्म' शब्दमें अन्तिम अक्षर मकार है, अतः यह भी ब्रह्म शब्दस्वरूप ही है। इसलिये मकारके द्वारा परम ब्रह्मका अनुसंधान (चिन्तन) करे।

जब कोई किसीसे पूछता है कि 'क्या यह बात ऐसी ही है?' तब वह मनुष्य, यदि उसको पूछे हुए विषयमे संशय नही रहता, तो 'उ' (हाँ, ऐसी ही है) इस प्रकार दृढतापूर्वक उत्तर देता है। अतः 'उ' अवधारणार्थक (दृढ निश्चयका सूचक) है। इसलिये अ, उ, म्—इन तीन मात्राओंमेंसे अकारके द्वारा इस आत्माका अनुसन्धान (ग्रहण) करके मकारस्वरूप ब्रह्मके साथ उसकी एकता करे और उकारके द्वारा इस एकताके विषयमे निस्सन्देह होकर अपना निश्चय प्रकट करे। अर्थात् अ (आत्मा) उ (निश्चय ही) म् (ब्रह्म है) इस प्रकार निश्चित रूपसे जान ले। जो इस प्रकार जानता है, वह शरीररहित, इन्द्रियरहित, प्राणरहित एव अज्ञानरहित, केवल सच्चिदानन्दमय स्वप्रकाश आत्मा हो जाता है।

'निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है, क्योकि वह अत्ता (कारणरूपसे सबका सहर्ता), उग्र (सहारशक्तिसे विशिष्ट), वीर (पराभवको सहन न करनेवाला), महान्, विष्णु (व्यापक), ज्वलत् (सब ओरसे प्रकाशमान), सर्वतोमुख (सर्वव्यापी), नृसिंह (बन्धननाशक परमात्मा), भीषण (काल, वायु और सूर्य आदिको भी भयभीत करनेवाल), भद्र (परम कल्याणमय), मृत्युका भी मृत्यु, नमामि (अज्ञानशून्य) और 'अहम्' ('अहम्' इस नामका परम आश्रय) है।

निश्चय ही यह ब्रह्म सतत—देश, काल और वस्तुकी सीमासे रहित है, क्योकि वह उग्र, वीर, महत्, विष्णु, ज्वलत्, सर्वतोमुख, नृसिंह, भीषण, भद्र, मृत्युमृत्यु, नमामि