कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 645, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५९७ तथा अहम् है । * इसलिये प्रणवस्य अकारके द्वारा परम ब्रह्मका अनुसन्धान (चिन्तन) करके मकारके द्वारा मन आदिके रक्षक तथा मन आदिके साक्षी आत्माका अन्वेषण (चिन्तन) करे । वह साक्षी आत्मा जब सुषुप्ति-अवस्थामे इस कार्य कारणमय सम्पूर्ण जगत्की उपेक्षा—इसके प्रति अहंता और ममताके भावका त्याग कर देता है, तब यह सब इस ब्रह्मस्वरूप आत्मामे प्रवेश कर जाता—लीन हो जाता है, इससे पृथक् जगत्की सत्ता नहीं रहती। और जब यह जागता है, तब यह सब जगत् फिर इसीमे प्रकट हो जाता है । यह आत्मा अपनेसे ही प्रकट हुए इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको कुछ काल तक अपनेमे ही स्थापित करके रखता है । फिर अपनेमें ही इसका संहार करके इसको सब ओर व्याप्त कर लेता है। तत्पश्चात् इसे चिन्मय प्रकाशस्वरूपमे परिणत करके अपनेम ही लीन कर लेता है। इस प्रकार इन समस्त पदार्थोंको ही यह आत्मस्वरूपता प्रदान करता है । (यह सब करनेकी इसमे पूर्ण शक्ति है, क्योंकि) यह अति-उग्र, अतिवीर, अति- महान्, अतिविष्णु (अतिशय व्यापक), अतिज्वलन् (अत्यन्त प्रकाशमय), अतिसर्वतोमुख, अतिनृसिंह, अति- भीषण, अतिभद्र, अतिमृत्युमृत्यु, अतिनमामि (अज्ञानमे अत्यन्त दूर) और अति-अहम् ('अहम्' पदका अन्तिम लक्ष्य) होकर सदा अपनी महिमामें ही स्थित रहता है। इसलिये इस आत्माको अकारके अर्थभूत परब्रह्मके साथ एकीभूत करे और उकारके द्वारा इस एकताके प्रति संदेह- रहित हो जाय । (फिर उस ब्रह्मका मकारके अर्थभूत आत्माके साथ भी एकताका अनुभव और चिन्तन करे।) जो इस प्रकार जानता है, वह शरीररहित, इन्द्रियरहित, प्राणरहित तथा अज्ञानरहित केवल सच्चिदानन्दमय स्वयंप्रकाश परमात्म- स्वरूप हो जाता है । इस विषयमें यह श्लोक है— अङ्गं ब्रह्माध्र्धमाकृष्य अङ्गेनानेन योजयेत् । अङ्गेनेन परे ब्रह्मन् तमनेनापि योजयेत् ॥ (इस श्लोकमे इस खण्डके भीतर कही हुई सभी बातें संलरूपसे आ गयी हैं।) अङ्गम्=प्रणवकी प्रथममात्रा अकारके अर्थभूत आत्माको, ब्रह्माध्र्धम् आकृष्य=द्वितीय मात्रा उकारके पूर्वार्ध—ब्रह्मके प्रति आकृष्ट करके अर्थात् आत्मा और ब्रह्मकी एकताका अनुभव करके, अनेन अङ्गेन योजयेत्=फिर मकारके अर्थभूत इस आत्माके साथ उकारके उत्तरार्धरूप ब्रह्मको भी संयुक्त करे, अर्थात् ब्रह्मकी आत्माके साथ एकताका चिन्तन करे, एनम् अङ्गम्= 'अहं' शब्दके आदिभूत प्रणवस्य अकारके अर्थरूप आत्माको, परे ब्रह्म=ब्रह्मशब्दके अन्तिम अक्षर मकारसे अभिन्न जो प्रणवस्य मकार है, उसके अर्थभूत ब्रह्मके साथ (उकारद्वारा एकीभूत करे), तम्=उस अन्तिममात्रारूप परमात्माको, जो प्रणवके अकारद्वारा प्रतिपाद्य है; अनेन अपि योजयेत्=इस मन आदिके रक्षक एव साक्षी प्रणवस्य मकारके अर्थभूत आत्माके साथ संयुक्त करे, अर्थात् परमात्मा और आत्माकी एकताका अनुभव एव चिन्तन करे । अष्टम खण्ड भयरहित ब्रह्मरूप हो जानेकी विधि पिछले खण्डोंमें प्रणवकी विभक्त (पृथक् पृथक् की हुई) मात्राओंद्वारा आत्मा एव परमात्माका प्रतिपादन किया गया। अब तुरीयस्वरूप अविभक्त प्रणवके द्वारा 'ओत', 'अनुज्ञातृ', 'अनुज्ञा' और 'अविकल्प' रूपसे आत्मतत्त्वके बोधका प्रकार बतलाया जाता है। यह प्रसिद्ध है कि यह ब्रह्मस्वरूप† आत्मा सर्वत्र ओत और प्रोत है (सामान्यतः सद्रूपसे सबमे 'ओत' और चिदानन्दस्वरूपसे सबमें 'प्रोत' है। ओत प्रोतका अर्थ है— पूर्णतः व्यापक) । इस ब्रह्ममय आत्मामे सम्पूर्ण जगत् है, क्योंकि यह सबका आत्मा है। इसीलिये यह सर्वरूप है। (अतएव व्याप्य व्यापकभाव भी नहीं बन सकता। जब कोई व्याप्य हो, तभी उसमे व्यापक रह सकता है। जब सब कुछ आत्मा ही है, तब व्याप्य कहाँसे आया। इसीलिये श्रुति कहती है—) वास्तवमें आत्मा ओत (व्यापक) नहीं है। निश्चय ही यह आत्मा अद्वितीय है। (अद्वितीय होनेके कारण ही इसे 'ओत' अर्थात् व्यापक भी कहा गया है।) आत्मा एकमात्र ही है। इसीलिये इसे 'अद्वय' कहा गया है। (अद्वितीयता भी व्यवहारमात्र ही है और समस्त व्यवहार कल्पित हैं, किंतु आत्मा इन कल्पनाओंसे रहित है। अतः) यह अविकल्प है—निर्विरोष है। कोई भी वस्तु, जो आत्मासे भिन्न है, सत् नहीं है। अतएव यह आत्मा 'ओत' अर्थात्
- यहाँ भी उग्र आदि पदोंका भाव वैसा ही है, जैसा ऊपर बताया गया है। † सिंहका अर्थ है—ब्रह्मस्वरूप। 'सिं' अर्थात् बन्धनकारक अज्ञानको 'ह' अर्थात् नष्ट करनेवाला ज्ञानस्वरूप ब्रह्म।