कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 647, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें[खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५९९
ब्रह्म विकल्पसे शून्य है। वास्तवमें परमात्मा अविकल्प भी मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता रहता है। इसलिये यह अद्वितीय, -नहीं है; क्योंकि उसमें कोई भेद नहीं है (भेदकी सत्ता होने- स्वयंप्रकाश और महानन्दमय तत्त्व आत्मा ही है। यह ब्रह्म पर ही सविकल्प और अविकल्प आदि भेद हो सकते हैं)। अमृतस्वरूप है, यह ब्रह्म सर्वथा भयसे रहित है। ऐसी प्रसिद्धि इस परमात्मामें कोई भी भेद उपलब्ध नहीं होता। इसमें है कि ब्रह्म भयसे शून्य ही है। जो इस प्रकार जानता है, वह जो भेद-सा मानता है, वह सैकड़ों और सहस्रों प्रकारसे भेद- भयशन्य ब्रह्म ही हो जाता है। ऐसा इस प्रकरणका गूढ़ को प्राप्त होकर—सहस्रों भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहस्य है।
नवम खण्ड
प्रणवके द्वारा आत्माको जानकर साक्षिरूपसे स्थित होनेकी विधि
निश्चय ही उन प्रसिद्ध देवताओने प्रजापतिसे कहा— भगवन् ! हमें उस ॐकारके लक्ष्यार्थभूत आत्माका ही उपदेश करें । 'तथास्तु' कहकर प्रजापति बोले—'उपद्रष्टा (समीप रहकर देखनेवाला साक्षी) और अनुमन्ता (अपनेमें ही अध्यक्षत प्राण और शुद्धि आदिको संनिधानमात्रसे केवल अनुमति देनेवाला) यह आत्मा 'सिंह' अर्थात् बन्धननाशक परमात्मा ही है, चिन्मवरूप ही है, निर्विकार है और सर्वत्र साक्षिमात्र है। अतएव द्वैतकी सिद्धि नहीं होती; केवल आत्मा ही सिद्ध होता है—एकमात्र आत्माकी ही सत्ता प्रमाणित होती एव अनुभवमें आती है आत्मा अद्वितीय है—उससे भिन्न किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता नहीं है। मायासे ही अन्य वस्तुकी प्रतीति-सी होती है। निश्चय ही वह उपद्रष्टा आदिके रूपमें बतलाया हुआ यह आत्मा साक्षात् परमात्मा ही है। यह माया ही सम्पूर्ण द्वैत प्रपञ्चके रूपमें भासित होती है। ठीक ऐसी ही बात है। वही यह माया प्राज्ञमें अविद्यारूपसे स्थित होकर उसके स्वरूपपर आवरण डालती है। वही सम्पूर्ण जगत्के रूपमें भासती है। आत्मा तो विशुद्ध परमात्मा ही है। यद्यपि यह स्वप्रकाश (अपने ही प्रकाशमें प्रकाशित होनेवाला) एव सर्वज्ञ है, तथापि यहाँ सुषुप्तावस्थामें जानते हुए भी अपने और दूसरेको पृथक्-पृथक् नहीं जानता, क्योंकि उस समय वह अविषयरूप है, सत्तामात्रसे भिन्न किसी भी विषयका उसके साथ सम्बन्ध नहीं है। इसी प्रकार वह अज्ञानरूप भी है अर्थात् भेद-ज्ञानको ग्रहण करनेवाले अन्तःकरणके साथ उसका सम्बन्ध नहीं है। यह बात अनुभवसिद्ध है तथा यह तमोमयी (अज्ञानस्वरूपा) माया भी अनुभवमे ही जानी जाती है। इसलिये जड-मोहात्मक, प्रवाहरूपमे अनन्त और अत्यन्त तुच्छ यह दृश्यमान जगत् ही उसका स्वरूप है। यह माया ही इस पुरुषके समक्ष 'इदम्' रूपमे प्रतीत होनेवाले इस दृश्य-प्रपञ्चको अभिव्यक्त करनेवाली ह। यद्यपि यह नित्य निवृत्त है, ढूंढनेपर कहीं भी इसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती, तथापि अविवेकी पुरुषोंको यह आत्माकी भाँति अपना स्वरूप ही दिखायी देती है। यह इस चेतन आत्माकी सत्ता और असत्ताका भी दर्शन कराती है (मायाद्वारा प्रकट हुए जगत्का कोई चेतन आत्मा साक्षी अवश्य होना चाहिये—इस युक्तिसे आत्माकी सत्ताका अनुभव होता है, तथा यह माया स्वय ही आवरण बनकर आत्माके स्वरूपको छिपा देती है, इसलिये उसकी असत्ता सी प्रतीत होती है)। सिद्धता और असिद्धता तथा स्वतन्त्रता और अस्वतन्त्रताके कारण भी यह आत्माकी सत्ता और असत्ताका भान कराती है।* वही यह प्रसिद्ध माया साधारण वट-बीजकी भाँति एक होकर भी अनेक वटवृक्षोंके समान असंख्य जीवोंके उत्पादनकी शक्तिका केन्द्र है। यह कैसे ? सो बतलाते हैं। जैसे एक साधारण वट-बीज अपनेसे अभिन्न अनेका वट वृक्षोंको बीजसहित उत्पन्न करके उन सब-में अपनी पूरी शक्तिके साथ मौजूद रहता है, उसी प्रकार यह माया अपनेमें अभिन्न एव परिपूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) को दिखाकर आभासद्वारा चेतन आत्माको जीव और ईश्वरके भेदमें प्रतिष्ठित कर देती है। यह स्वय ही माया और अविद्या बन जाती है। यह प्रसिद्ध माया अति विचित्र, अत्यन्त दृढ, अनेक अङ्कुरोंवाली, म्वय तीन गुणोंम विभक्त होकर अङ्कुरों-
* अपनी महिमामें स्थित निर्विकल्प चैतन्यस्वरूप आत्मा, अविद्यामे सम्बन्ध होनेपर, उसके साधकरूपसे प्रकट होता है। अत उसके स्वरूपकी सिद्धि होनेमे उसकी सत्ता प्रमाणित होती है। तथा प्रकृतिस्थ होनेपर आसक्तिवश जब वह जडप्रधान हो जाता है, तब उसके स्वरूपकी सिद्धि न होनेसे उसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती। इसी प्रकार वह मायाका भी शामक और अधिष्ठाता होनेके कारण स्वतन्त्र है और अविद्यावश जब अपने स्वरूपको भूल जाता है, तब मायापरवश होनेके कारण अस्वतन्त्र हो जाता है, स्वतन्त्रता उसकी सत्ताका और अस्वतन्त्रता उसकी असत्ताका भान कराती है।