कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 648, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६०० ------------------ श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ---------------- [खण्ड ९ मे भी त्रिगुणमय स्वरूपसे स्थित रहनेवाली, सर्वत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें उपस्थित और आत्म-चैतन्यसे उदीप्त रहने- वाली है। इसलिये सर्वत्र जो गुण भेदसे त्रिविध स्वरूपकी उपलब्धि होती है, वह आत्माका ही स्वरूप है। कारणरूपमे भी वही स्थित है। मायाके कारण ही जीव और ईश्वरका भेद है। शरीरमे अभिमान रखनेवाला चेतन जीव कहलाता है और उसपर नियन्त्रण रखनेवाला ईश्वर कहा गया है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टि शरीरमे अभिमान रखनेवाले जीवका नाम ही 'हिरण्यगर्भ' है। गुण भेदसे उसके भी तीन रूप है। ईश्वरकी भाँति उसमे भी आत्म चैतन्यका बोध स्वत. प्रकट होता है। यह हिरण्यगर्भ सर्वव्यापी ईश्वर है, क्रिया एव ज्ञानस्वरूप है। सम्पूर्ण क्षेत्र समुदाय सर्वमय है (क्योकि वह सर्वात्मक मायासे उत्पन्न है)। सब अवस्थाओं- मे (छोटे बड़े सभी रूपोंमे) प्रकट हुए सम्पूर्ण जीव भी सर्वमय है। तथापि अल्प शरीरसे अभिमान रखनेके कारण वे अल्प कहलाते है। वही यह परमात्मा सम्पूर्ण भूतों, इन्द्रियों, विराट् ब्रह्माण्ड, इन्द्रियाधिष्ठाता देवों तथा अन्नमय आदि पाँच कोशोंकी सृष्टि करके उनमे प्रवेश करता है और प्रवेश करके मूढ न होते हुए भी मूढकी भाँति व्यवहार करता रहता है। यह सब कुछ मायासे ही होता है। (अत. मायाका कार्य होनेसे यह जगत् और तत्सम्बन्धी व्यवहार सब के-सब मिथ्या ही हैं।) इसलिये यह आत्मा एकमात्र अद्वितीय ही है। यह सन्मात्रस्वरूप, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्य, मुक्त, निरञ्जन (मायातीत), विभु (सर्वव्यापक), अद्वैत, आनन्दमय, पर (सर्वोत्कृष्ट) तथा प्रत्यगेकरस (आत्मामे ही एकमात्र रस की उपलब्धि करनेवाला) है। इन प्रत्यक्ष आदि तथा सत्, चित्, आनन्दकी उपलब्धि आदि प्रमाणोंद्वारा इसका ज्ञान होता है। यह सब कुछ सत्तामात्र ही है। इस कार्य कारणमय जगत्के पूर्वसे केवल सस्वरूप ब्रह्म ही स्वतःसिद्ध है (श्रुति भी कहती है—'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्')। इस ब्रह्ममें उससे भिन्न दूसरी किसी वस्तुका अनुभव नहीं होता। ब्रह्ममें अविद्या भी नहीं है, क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप, स्वयम्प्रकाश, सबका साक्षी, निर्विकार और अद्वितीय है। यहाँ इस जगत्मे भी देखो—जो कुछ भी है, वह सन्मात्र है। जो सत्से भिन्न है, वह असत् है। इस प्रकार सम्पूर्ण कल्पनाओंके साक्षीरूपसे सत्यस्वरूप ब्रह्मकी ही पहलेसे उपलब्धि होती है। वास्तवमे कार्यकी सत्ता न होनेसे यह परमात्मा कारणरूप भी नहीं है। यह सद्-स्वरूप ब्रह्म अपने आत्मामें ही स्थित, आनन्दमय, चिद्धनस्वरूप एवं स्वतःसिद्ध है। निश्चय ही किन्हीं अन्य प्रमाणोंसे इसकी सिद्धि नहीं होती। वही विष्णु, वही शिव और वही ब्रह्मा है। अन्य सब रूपोमे भी वही उपलब्ध होता है। वह सर्वग (सर्वत्र व्यापक) एव सर्वस्वरूप है। अतएव नित्य-शुद्ध है। उसके स्वरूपका कभी बाघ नहीं होता। वह बुद्ध (ज्ञानस्वरूप), सुखरूप आत्मा है। यह सम्पूर्ण जगत् निरात्मक (आत्मासे शून्य) नहीं हे, तथा निरपेक्ष आत्मा भी नहीं है, क्योंकि स्वतन्त्र आत्मा तो इस जगत्की उत्पत्तिके पहलेसे ही स्वतःसिद्ध है। यह सब जगत् कदापि सत्य नहीं है। आत्मा अपनी ही महिमामे स्थित, सर्वथा निरपेक्ष, एकमात्र साक्षी और स्वयम्प्रकाश है।' देवताओने पूछा—'वह नित्य, शुद्ध बुद्ध एव आत्मभूत तत्त्व क्या है ?' प्रजापतिने कहा—'वही आत्मा है। उस ब्रह्मके आत्मा होनेमे किसी प्रकारका सशय नहीं करना चाहिये। यह आत्मस्वरूप ब्रह्म ही इस मम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करता हे। यह द्रष्टाका भी द्रष्टा, निर्विकार, साक्षी, नित्य सिद्ध और अविधारहित है; क्योकि यह बाहर और भीतर है तथा कार्य और कारणका भी निरीक्षण करनेवाला है। यह पहलेमे ही भलीभाँति प्रकाशित है तथा अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा परे है।' इतना उपदेश देकर प्रजापतिने पूछा-देवताओ ! बताओ तो सही, मेरे द्वारा उपदेश दिये हुए आत्माके स्वरूपका तुम्हे साक्षात्कार हुआ कि नहीं ? देवता बोले—हमने आत्माके स्वरूपका साक्षात्कार ता किया; किंतु वह अव्यवहार्य (व्यवहारमे न आनेयोग्य ) तथा अल्प है। यह सुनकर प्रजापतिने कहा—'नहीं, आत्मा अल्प नही है। वह सबका साक्षी है, निर्विशेष है। उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। वह सुख और दुःख दोनोंसे रहित हे। अद्वितीय परमात्मा है। सर्वज्ञ है, अनन्त है, अभिन्न है तथा द्वैतरहित है । मायाके कारण ही उसकी सदा सम्यक् प्रकारसे उपलब्धि नही होती। परतु वास्तवमे वह प्रकाशित न होनेवाला नही है। कारण कि वह स्वय- प्रकाश है। माया और अज्ञान भी आत्मामें ही कल्पित होनेके कारण आत्मासे भिन्न नहीं हैं । तुम्हीं सब लोग आत्मा हो।' इतना कहकर पुनः प्रश्न किया—'क्या अब भी तुम्हें आत्म-तत्त्वका दर्शन हुआ ? यदि हुआ तो अद्वैतरूपसे या द्वैतरूपसे ?' देवताओने कहा—हमें तो द्वैतका ही दर्शन होता है। प्रजापतिने कहा—'नही, तुम्हें द्वैतरूपमें आत्माका दर्शन नहीं होता; क्योंकि आत्मा तो तुम्हीं हो। यह तुमखे