भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 832 में से

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पृष्ठ 699
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४७ उनके स्तुत्यर्ह और मृत्युरहित देवता उत्पन्न हुए। काम ( क ), योनि ( ए ), कमला ( ई ), वज्रपाणि—इन्द्र ( ल ), गुहा ( ह्रीँ )। ह, स—वर्ण, मातरिश्वा—वायु ( क ), अभ्र ( ह ), इन्द्र ( ल ), पुन. गुहा ( ह्रीँ )। स, क, ल—वर्ण, और माया ( ह्रीँ ), यह सर्वात्मिका जगन्माताकी मूल विद्या है और यह ब्रह्मरूपिणी है। ( शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती- लक्ष्मी-गौरीरूपा, अशुद्ध मिश्र शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूपका निर्विकल्प ज्ञान देनेवाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी—यही इस मन्त्रका भावार्थ है। यह मन्त्र सब मन्त्रोंका मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्रमें पञ्चदशी कादि श्रीविद्याके नामसे प्रसिद्ध है। इसके छ. प्रकार- के अर्थ अर्थात् भावार्थ, वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ और तत्त्वार्थ 'नित्या षोडशिकार्णव' ग्रन्थमे बताये गये हैं। इसी प्रकार 'वरिवस्यारहस्य' आदि ग्रन्थोंमें इसके और भी अनेक अर्थ दर्शाये हैं। श्रुतिमे भी ये मन्त्र इस प्रकारसे अर्थात् कचित् स्वरूपोद्धार, क्वचित् लक्षणा और लक्षित लक्षणासे और कहीं वर्णके पृथक् पृथक् अवयव दरसाकर जान बूझकर विश्रृङ्खलरूपसे कहे गये हैं। इससे यह मालूम होगा कि ये मन्त्र कितने गोपनीय और महत्त्वपूर्ण हैं।) ये परमात्माकी शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण धारण करनेवाली हैं। ये 'श्रीमहा- विद्या' हैं। जो इस प्रकार जानता है, वह शोकको पार कर जाता है। भगवती ! तुम्हें नमस्कार है। माता ! सब प्रकारसे हमारी रक्षा करो ॥ ८—१६ ॥ ( मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहते हैं— ) वही ये अष्ट वसु हैं, वही ये एकादश रुद्र हैं, वही ये द्वादश आदित्य हैं, वही ये सोमपान करनेवाले और न करनेवाले विश्वेदेव हैं, वही ये यातुधान ( एक प्रकारके राक्षस ), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं, वही ये सत्त्व रज-तम हैं, वही ये ब्रह्म- विष्णु-रुद्ररूपिणी हैं, वही ये प्रजापति इन्द्र-मनु हैं, वही ये ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं, वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं, पापका नाश करनेवाली, भोग-मोक्ष देनेवाली, अन्तरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष, शरण लेने योग्य, कल्याणदात्री और मङ्गलरूपिणी उन देवीको हम सदा प्रणाम करते हैं। वियत्—आकाश ( ह ) तथा 'ई' कारसे युक्त, वीतिहोत्र— अग्नि ( र ) सहित, अर्धचन्द्र ( ँ ) से अलंकृत जो देवी- का बीज (ह्रीँ) है, वह सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। इस एकाक्षर ब्रह्मका ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण हैं और जो ज्ञानके सागर हैं। ( यह मन्त्र देवीप्रणव माना जाता है। ॐकारके समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थसे भरा है। सक्षेपमें इसका अर्थ इच्छा-ज्ञान-क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत शिव-शक्ति-स्फुरण है।) वाणी ( ऐँ ), माया ( ही ), ब्रह्मासू—काम ( क्लीँ ), इसके आगे वक्त्र अर्थात् आकारसे युक्त छठा व्यञ्जन ( चा ), 'अवाम श्रोत्र'— दक्षिण कर्ण ( उ ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वारसे युक्त सूर्य ( मु ), नारायण अर्थात् 'आ'से युक्त टकारसे तीसरा वर्ण (डा), अधर अर्थात् 'ऐ'से युक्त वायु ( यै ) और 'विच्चे'—यह नवार्णमन्त्र उपासकोंको आनन्द और ब्रह्मसायुज्य देनेवाला है। (इस मन्त्रका अर्थ—हे चित्स्वरूपाणी महासरस्वती ! हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी ! हे आनन्दरूपिणी महाकाली ! ब्रह्मविद्या पानेके लिये हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली- महालक्ष्मी-महासरस्वतीस्वरूपिणी चण्डिके ! तुम्हें नमस्कार है। अविद्यारूप रज्जुकी दृढ ग्रन्थिको खोलकर मुझे मुक्त करो।) जो हृदयरूप कमलके मध्यमें रहती हैं, प्रातःकालीन सूर्यके समान जिनकी प्रभा है, जो पाश और अङ्कुश धारण किये रहती हैं, जिनका मनोहर रूप है, जिनके हाथ वरद और अभय मुद्राओंसे युक्त हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो लाल वस्त्र पहने रहती हैं और भक्तोंके मनोरथ पूर्ण करती हैं, उन देवीको मै भजता हूँ। महाभयका नाश करनेवाली, महासङ्कटको शान्त करनेवाली और महान् करुणाकी साक्षात् मूर्ति तुम महादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वरूप ब्रह्मादिक भी नहीं जानते— इसलिये जिन्हें अज्ञेया कहते हैं, जिनका अन्त नहीं मिलता— इसलिये जिन्हें अनन्ता कहते हैं, जिनका स्वरूप देख नहीं पड़ता—इसलिये जिन्हें अलक्ष्या कहते हैं, जिनका जन्म समझमे नहीं आता—इसलिये जिन्हें अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है—इसलिये जिन्हें एका कहते है, जो अकेली ही विश्वरूपमें सजी हुई हैं—इसलिये जिन्हे नैका कहते हैं, वे इसीलिये अज्ञेया, अनन्ता, अजा, एका और नैका कहाती हैं। सब मन्त्रोंमें 'मातृका'—मूलाक्षररूपसे रहनेवाली, शब्दोंमें अर्थरूपसे रहनेवाली ज्ञानोंमे 'चिन्मयातीता', शून्यों- में 'शून्यसाक्षिणी' तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वे दुर्गा नामसे प्रसिद्ध हैं। उन दुर्विज्ञेया, दुराचारनाशिनी और ससार-सागरसे तारनेवाली दुर्गादेवीको ससारसे डरा हुआ मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १७—२५ ॥