कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 700, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
६४८ -- देव्युपनिषद् -- इस अथर्वशीर्षका जो अध्ययन करता है, उसे पाँचों पापोंका नाश करता है, प्रातःकालमें अध्ययन करनेवाला रात्रि- अथर्वशीर्षके जपका फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्षको में किये हुए पापोंका नाश करता है, दोनो समय अध्ययन न जानकर जो प्रतिमास्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करनेवाला पहलेका पापी भी निष्पाप होता है । मध्यरात्रिमे करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता । अष्टोत्तरशत (१०८ तुरीय* सन्ध्याके समय जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है। नयी बार ) जप (इत्यादि ) इसकी पुरश्चरणविधि है। जो इसका दस प्रतिमापर जप करनेसे देवताका सान्निध्य प्राप्त होता है । बार पाठ करता है, वह उसी क्षण पापोंसे मुक्त हो जाता है मौमाश्विनी (अमृतसिद्धि) योगमें महादेवीकी सन्निधिमे जप और महादेवीके प्रसादसे बडे दुस्तर सकटोंको पार कर जाता करनेसे महामृत्युसे तर जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह है। इसका सायङ्कालमे अध्ययन करनेवाल दिनमे किये हुए महामृत्युसे तर जाता है । इस प्रकार यह अविद्यानाशिनी ब्रह्मविद्या है ॥ २६ ॥ ॥ अथर्ववेदीय देव्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्ति . ! शान्ति . !! शान्ति . !!! सब ब्रह्म है सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमय' पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत' प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । (छान्दोग्य ३ । १४ । १) यह सब ब्रह्म ही है । ब्रह्मसे ही जगत् उत्पन्न होता है, ब्रह्ममें ही विलीन होता है और ब्रह्ममें ही चेष्टा करता है। शान्त (मयत) होकर ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिये । पुरुष कर्ममय है। इस लोकमें जैसा कुछ कर्म करता है, मरनेके बाद प लोकमें वह वैसा ही होता है। इसलिये सत्कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ।
- श्रीविद्याके उपासकोंके लिये चार सन्ध्याएँ आवश्यक हैं । इनमें तुरीय-सन्ध्या मध्यरात्रिमें होती है ।