भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 701

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥

ऋग्वेदीय

बह्वृचोपनिषद्

शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!


देवीसे सबकी उत्पत्ति और देवीकी ब्रह्मरूपता

हरिः ॐ। एकमात्र देवी ही सृष्टिसे पूर्व थीं, उन्होंने ब्रह्माण्डकी सृष्टि की। वे कामकलाके नामसे विख्यात हैं, वे ही शृङ्गारकला कहलाती हैं। उन्हींसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, विष्णु प्रकट हुए, रुद्र प्रादुर्भूत हुए। उन्हींसे समस्त मरुद्गण उत्पन्न हुए। उन्हींसे गानेवाले गन्धर्व, नाचनेवाली अप्सराएँ और वाद्य बजानेवाले किन्नर सब ओर उत्पन्न हुए। उन्हींसे भोग-सामग्री उत्पन्न हुई, सब कुछ उत्पन्न हुआ, सब कुछ शक्तिसे ही उत्पन्न हुआ। अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—जितने स्थावर जङ्गम प्राणी हैं, उनकी तथा मनुष्यकी सृष्टि भी उन्हींसे हुई। वे ही अपरा शक्ति हैं, वे ही वैशाम्भवी विद्या, कादि विद्या, हादि विद्या या सादि विद्या कहलाती हैं, वे ही रहस्यरूपा हैं। वे ही प्रणववाच्य अक्षर तत्त्व हैं, ॐ अर्थात् सच्चिदानन्दस्वरूपा वे वाणीमात्रमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों पुरों तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों प्रकारके शरीरोंको व्याप्तकर बाहर और भीतर प्रकाश फैला रही हैं। देश, काल और वस्तुके भीतर असङ्ग होकर रहती हुई वे महात्रिपुरसुन्दरी प्रत्यक्चेतना हैं। वे ही आत्मा हैं, उनके अतिरिक्त सब असत्य है, अनात्मा है। ये ब्रह्मविद्या हैं, भावाभाव-कलासे विनिर्मुक्त चिन्मयी विद्या-शक्ति हैं तथा अद्वितीय ब्रह्मका बोध करानेवाली हैं। वे सत्, चित् और आनन्दरूप लहरोंवाली श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी बाहर और भीतर प्रविष्ट होकर स्वयं अकेली ही विराजमान हो रही हैं। उनके अस्ति, भाति और प्रिय—इन तीन रूपोंमें जो अस्ति है, वह सन्मात्रका बोधक है। जो भाति है, वह चिन्मात्र है और जो प्रिय है, वह आनन्द है। इस प्रकार सब आकारोंमें श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी ही विराजमान हैं, तुम और मैं, सारा विश्व और सारे देवता तथा अन्य सब कुछ श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी ही हैं। ललिता नामकी वस्तु ही एकमात्र सत्य है, वही अद्वितीय, अखण्ड परब्रह्म तत्त्व है। पाँचों रूप अर्थात् अस्ति, भाति, प्रिय, नाम और रूपके परित्यागसे तथा अपने स्वरूपके अपरित्योगसे अधिष्ठानरूप जो एक सत्ता बच रहती है, वही महान् परम तत्त्व है॥ २॥

उसीको ‘प्रज्ञान ही ब्रह्म है’ अथवा ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इत्यादि वाक्योंसे प्रकट किया जाता है। ‘वह तू है’ इत्यादि वाक्योंसे उसीका कथन किया जाता है। ‘यह आत्मा ब्रह्म है’, ‘ब्रह्म ही मे हूँ’, ‘जो मै हूँ’, ‘वह मे हूँ’, ‘जो वह है, सो मै हूँ’—इत्यादि श्रुतिवाक्योंके द्वारा जिनका निरूपण होता है, वे यही षोडशी श्रीविद्या हैं। वही पञ्चदशाक्षर मन्त्रवाली श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, अम्बिका, बगला, मातङ्गी, स्वयंवर-कल्याणी, भुवनेश्वरी, चामुण्डा, चण्डा, वाराही, तिरस्करिणी, राजमातङ्गी, शुकश्यामला, लघुश्यामला, अश्वारूढा, प्रत्यङ्गिरा, धूमावती, सावित्री, सरस्वती, ब्रह्मानन्दकला इत्यादि नामोंसे अभिहित होती हैं। ऋचाएँ एक अविनाशी परम आकाशमें प्रतिष्ठित हैं, जिसमे सारे देवता भलीभाँति निवास करते हैं, उसको जाननेका प्रयत्न जिसने नहीं किया, वह ऋचाओंके अध्ययनसे क्या कर सकता है। निश्चय ही उसको जो जान लेते हैं, वे ही उसमे सदाके लिये स्थित हो जाते हैं।

॥ ऋग्वेदीय बह्वृचोपनिषद् समाप्त ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

कल्याण: उपनिषद् अङ्क · पृष्ठ 701, कुल 832 में से · BharatKosha