कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 702, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ ऋग्वेदीय सौभाग्यलक्ष्म्युपनि द् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड श्रीमहालक्ष्मीका श्रीसूक्तके अनुसार ध्यान, न्यास, पूजन और यन्त्रकी विधि हरि ॐ। एक समय देवताओंने भगवान् आदिनारायण- ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे से कहा—'भगवन् ! हमारे लिये सौभाग्यलक्ष्मी विद्याका स्वाहा। ॐ रजतस्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य- उपदेश कीजिये।' भगवान्ने कहा—'बहुत अच्छा, आप स्रजायै नमः कवचाय हुम्। ॐ हिरण्यायै नमः नेत्रत्रयाय सब देवगण एकाग्रचित्त होकर सुनें । जो स्थूल, सूक्ष्म एव कारण- वौषट्। ॐ हिरण्यवर्णायै नमः अस्त्राय फट् । रूप तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीयस्वरूपा है—नहीं-नहीं, तुरीय- —पश्चात् श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। सिर, नेत्र, मे भी अतीत अर्थात् निर्गुणस्वरूपा है, सबसे बढ़कर उत्कृष्ट कर्ण, नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों भुजाएँ, हृदय, नाभि, लिङ्ग, अर्थात् भयङ्कर रूपवाली है, तथा जो सभी मन्त्रोंको आसन गुदा, ऊरु (जाँघ), जानु, जङ्घा (पिंडली)—इन स्थानोंमें बनाकर उनपर विराजमान हैं, पीठों और उपपीठोमे प्रतिष्ठित श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे क्रमशः न्यास करे। इसके बाद निम्नलिखित देवताओंसे आवृत्त है, चार भुजाओंसे युक्त है—उन श्री मन्त्रके अनुसार ध्यान करे— अर्थात् लक्ष्मीदेवीका 'हिरण्यवर्णीम्०' इत्यादि श्रीसूक्तकी अरुणकमलसंस्था तद्रजःपुञ्जवर्णा पञ्चदश ऋचाओंके द्वारा ध्यान करें । करकमलधृतेष्टाभीतीयुग्माम्बुजा च । मणिकटकविचित्राऽऽलङ्कृताऽऽल्पजालै सकलभुवनमाता सन्ततं श्रीः श्रियै नः ॥ अर्थात् हल्के लाल (गुलाबी) रंगके कमलदल- पर बैठी हुईं, कमल परागकी राशिके समान पीत वर्णवाली, चारो हाथोंमें क्रमशः वर मुद्रा, अभय मुद्रा और दो कमल-पुष्प धारण किये हुए, मणिमय कड़ोंसे विचित्र शोभा धारण करने- वाली और अलङ्कारसमूहोंसे अलङ्कृत, समस्त लोकोंकी जननी श्रीमहालक्ष्मीदेवी निरन्तर हमें श्रीसम्पन्न करें ॥ १ ॥ (तत्पश्चात् यन्त्र लिखकर उसकी पूजा करे। यन्त्रके कर्णिकावृत्तके ऊपर अष्टदल, उसपर द्वादशदल तथा उदशदलके ऊपर षोडशदल बनाकर तीनोंको एक एक वृत्तसे ेर दे।) पीठकर्णिका अर्थात् बीजकोषके भीतर साध्य-कार्यसहित श्रीबीज (श्रीं) को लिखे। उसके बाद अष्टदल, द्वादशदल और