कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६५८ * सीतोपनिषद् *
रूपा तथा चन्द्र, सूर्य एव अग्निरूपा वे होती हैं। चन्द्रस्वरूपमे वे ओषधियोंका पोषण करती हैं। कल्पवृक्ष, पुष्प, फल, लता एव गुल्मो (झाड़ियों), ओषधियों एव दिव्य ओषधियोंकी स्वरूपभूता होती हैं तथा उसी चन्द्रके अमृतस्वरूपमें देवताओंके लिये 'महस्तोम' नामक यज्ञके फलको देनेवाली होती हैं। अमृतके द्वारा देवताओंको, अन्नके द्वारा पशुओं (प्राणियों) को तथा तृणके द्वारा उसपर अवलम्बित रहनेवाले जीवोंको—इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंको वे तृप्त करती हैं।
"वे सूर्यादि समस्त भुवनोंको-लोकोंको प्रकाशित करनेवाली हैं। दिन, रात्रि, निमेषसे लेकर घड़ी प्रभृति कालकी कलाएँ, आठ पहरोंसे युक्त दिन-रात्रिके भेदसे पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा संवत्सरके भेदसे मनुष्योंकी सौ वर्षकी आयुकी कल्पनाके द्वारा वे स्वयं ही प्रकाशित होती हैं। विलम्ब तथा शीघ्रतासे उपलक्षित निमेषसे लेकर परार्धपर्यन्त कालचक्र तथा जगच्चक्रादि प्रकारसे चक्रके समान घूमनेवाले कालके सभी विशेष-विशेष विभाग उन्हींके स्वरूप हैं, जो प्रकाशरूपा एव कालरूपा हैं।
"वे अग्निरूपा होकर प्राणियोंके लिये अन्न एव जलादि-पानके लिये क्षुधा एव पिपासारूपसे, देवताओंके लिये मुखरूपसे (देवता अग्निमें होमे हुए पदार्थ ही पाते हैं), वनौषधियोंके लिये शीतोष्णरूपसे, तथा काष्ठके बाहर एव भीतर नित्य एव अनित्य दोनों प्रकारसे (नित्यरूपमे व्याप्त अग्नितत्त्व एव अनित्यरूपमे प्रज्वलिताग्नि प्रभृति रूपोंमें) स्थित हैं।
"वे श्रीसीताजी अपने श्रीदेवीरूपमें तीन प्रकारका रूप धारण करके श्रीभगवान्के संकल्पानुसार सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये व्यक्त होती हैं। वे लोकरक्षणार्थ श्री तथा लक्ष्मीरूपमें लक्षित होती हैं, यों जाना जाता है। भूदेवी सम्पूर्ण जलमय समुद्रोंसहित सातों द्वीपवाली पृथिवीके रूपमें भूः भुवः आदि चौदहों भुवनोंकी आधार एव आधेयभूता प्रणवस्वरूपा होकर व्यक्त होती है। विद्युन्मालाके समान मुखवाली नीलादेवी भी सम्पूर्ण ओषधियों एव समस्त प्राणियोंके पोषणके लिये सर्वरूपा हो जाती है। समस्त भुवनोंके अधोभागमे जलाकारस्वरूप, मण्डूकमयी तथा भुवनोंकी आधाररूपा वही आदिशक्ति जानी जाती है।
"उन श्रीसीताजीका क्रियाशक्ति-रूप श्रीहरिके मुखसे नादके रूपमें व्यक्त हुआ। उस नादसे बिन्दु प्रकट हुआ। बिन्दुसे ॐकारका आविर्भाव हुआ। ॐकारसे परे राम-वैखानस नामका पर्वत है। उस पर्वतकी कर्म एव ज्ञानात्मिका अनेक शाखाएँ व्यक्त हैं। उसी पर्वतपर वेदत्रयीस्वरूप सर्वार्थको प्रकट करनेवाला आदि-शास्त्र है। तात्पर्य यह कि श्रीराम वैखानस पर्वत ही नित्य वेदस्वरूप हैं और लोकमें वह वेदोंके रूपमे व्यक्त होता है। उस आदि शास्त्रको ऋक्, यजुः एव सामात्मक होनेसे त्रयी कहा जाता है। कार्य-सिद्धिके लिये चार नामोसे उसका वर्णन होता है। अर्थात् देवस्वरूप वर्णनके मन्त्र, यज्ञ विधि निर्देशक मन्त्र तथा यज्ञमें गानके मन्त्र—ये ही तीन प्रकारके मन्त्र होनेसे वेदोंको त्रयी कहते हैं; किंतु यज्ञमे ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु एव उद्गाताके कार्यकी दृष्टिसे वेदोंको चार नामोंसे सम्बोधित किया जाता है—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्वाङ्गिरमवेद। यज्ञकर्ममें चातुर्होत्र प्रधान है और उसमे देवस्वरूपादि तीनका ही उपयोग होनेसे वेदोंको त्रयी कहते हैं। अथर्वाङ्गिरस वेद साम, ऋक् एव यजुःस्वरूप ही है। आभिचारिक कर्मोंकी समानतासे इन चारोंका पृथक्-पृथक् निर्देश होता है।
"ऋग्वेदकी इक्कीस शाखाएँ कही गयी हैं। यजुर्वेदीयोंकी एक सौ नौ शाखाएँ हैं। सामवेदकी एक सहस्र शाखाएँ हैं और अथर्ववेदकी पाँच शाखाएँ। इन वेदोंमें प्रथम (सर्वश्रेष्ठ) वैखानस मत है, जो प्रत्यक्ष दर्शन है। इसलिये मुनियोंद्वारा नित्य परम वैखानस (श्रीरामरूप) का स्मरण किया जाता है। कल्प, व्याकरण, शिक्षा, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्द—ये छः वेदाङ्ग हैं। अयन, मीमांसा और न्यायशास्त्रका विस्तार—ये वेदोंके उपाङ्ग हैं। धर्मज्ञ पुरुषोके सेवनके लिये चारों वेद तथा वेदोंसे अधिक ये अङ्ग-उपाङ्गादि हैं। सभी वैदिक शाखाओंमें उनके समयाचार (साम्प्रदायिक आचरण) की शास्त्रके साथ सगति लगानेके लिये निबन्ध हैं। धर्मशास्त्रों (स्मृतियो) को महर्षियोंने अपने अन्त:करणके दिव्य ज्ञानसे पूर्ण किया है। मुनियोंने इतिहास-पुराण, वास्तुवेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा आयुर्वेद—ये पाँच उपवेद बताये हैं। इन सबके साथ दण्ड, नीति और व्यापार-विद्या तथा परतत्त्वमें प्राणजय करके स्थिति—इस प्रकार इक्कीस भेदयुक्त यह स्वत:प्रकाश—स्वयं प्रकटित शास्त्र है।
"पूर्वकालमे वैखानस ऋषिके हृदयमें भगवान् विष्णुकी वाणी प्रकट हुई। उसी वाणीको वेदत्रयीके रूपमें इस प्रकार कल्पित करके देहधारी अपनी उन्नति करता है। वैखानस ऋषिने अपने हृदयमे प्रकट उस भगवद्वाणीको सख्यारूपमे सङ्कल्प करके पहले जिस प्रकार प्रकट किया, उसी प्रकार वह