भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 713
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *- ६५९ सब मैं बतलाता हूँ; सुनो। जो सनातन ब्रह्ममय रूपधारिणी क्रियाशक्ति कही गयी है, वह भगवान्‌की साक्षात् शक्ति है। भगवान्‌के स्मरणमात्र (संकल्पमात्र) से वे जगत्‌के रूपोंको प्रकट करती तथा दृश्य-जगत्‌मे स्वय व्यक्त होती ह। वे शासन एव कृपास्वरूपा, शान्ति तथा तेजोरूपा, व्यक्त (प्राणियों) की, अव्यक्त (देवादि) की कारणभूता एव उनके चरणादि समस्त अवयव तथा मुख एवं वर्ण (रूपादि) भेदस्वरूपा, भगवान्‌के साथ चलनेवाली (उनके सकल्पसे ही गति करनेवाली), भगवान्‌से कभी विलग न होनेवाली एव अविनाशिनी, निरन्तर भगवान्‌के साथका ही आश्रय करनेवाली, कहे हुए और न कहे हुए सभी स्वरूपोंवाली, निमेष-उन्मेषसे लेकर सृष्टि, स्थिति, सहार, तिरोधान, अनुग्रह आदि समस्त सामर्थ्यांस युक्त होनेके कारण साक्षात् शक्तिरूपमे वर्णित होती है। “श्रीसीताजीका इच्छाशक्ति रूप भी तीन प्रकारका है। प्रलयके समय विश्रामके लिये भगवान्‌के दाहिने वक्षःस्थलपर श्रीवत्सकी आकृति धारण करके जो विश्राम करती हैं, वे योगशक्ति हैं। भोगशक्ति भोगरूपा है। वे कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिन्तामणि तथा शङ्ख, पद्म (तथा मकर, कच्छप) आदि नौ निधियोंमे निवास करती ह और भगवद्भक्तोंकी कामनाके अनुसार अथवा उनकी कामनाके बिना भी नित्य नैमित्तिक कर्मके द्वारा, अग्निहोत्रादिसे अथवा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधिसे-किसी भी निमित्तसे भगवान्‌की उपासना करनेवालोंके उपभोगके लिये बड़े-बड़े भोगोंसे, विशाल द्वार एव प्राकारवाले भवनोंसे, विमानोंसे अथवा भगवद्विग्रहके अर्चन पूजनादिकी सामग्रियोंसे अर्चनरूपमें, स्नानादि (तीर्थस्नानादि) रूपमें, पितृपूजा आदिके रूपमे, अन्न (भोज्य पदार्थ) एव पीने योग्य रस आदिसे, यह भगवान्‌को प्रसन्न करनेके लिये है—यो कहकर वे सब उपभोग-सामग्रियोंका सम्पादन करती हैं। “श्रीसीताजीकी वीरशक्ति चतुर्भुजा हैं। उनके हाथोंमें अभय एव वरदानकी मुद्राएँ तथा दो कमठ हैं। किरीट एव आभूषणोंसे वे भूषिता हैं। सम्पूर्ण देवताओंसे घिरी हुई, कल्पवृक्षके मूलमें चार श्वेत हाथियोंद्वारा रत्नजटित कलशोंके अमृत-जलसे अभिषिक्त होती हुई वे आसीन है। ब्रह्मादि समस्त देवता उनकी वन्दना करते हैं। अणिमादि अष्ट ऐश्वर्यंसे वे युक्त हैं और उनके सम्मुख खड़ी होकर कामधेनु उनकी स्तुति करती हैं। वेद और शास्त्र आदि भी मूर्त्तिमान् होकर उनकी स्तुति करते हैं। जया आदि अप्सराएँ एव देवनारियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। सूर्य एव चन्द्र दीपक बनकर वहाँ प्रकाश कर रहे हैं। तुम्बुरु एव देवर्षि नारद आदि उनका गुणगान कर रहे हैं। राका और सिनीवाली नामकी देवियाँ उनपर छत्र लगाये हैं। ह्लादिनी एव माया उनके दोनों ओर चँवर डुला रही हैं। स्वाहा एव स्वधा उनपर पखे झलती हैं। भृगु और पुण्य आदि महात्मा उनकी पूजा कर रहे हैं। दिव्य सिंहासनपर अष्टदलपद्मके ऊपर आसीन वे महादेवी समस्त कारणों एव कार्योंको निर्मित करनेवाली हैं। इस प्रकार भगवती लक्ष्मीके भगवान्‌से पृथक् निवासका ध्यान करना चाहिये। उन्होंने अपनेको अनुरूप दिव्य आभूषणोंसे अलकृत किया है। वे स्थिर होकर प्रसन्न नेत्रोंसे समस्त देवताओंद्वारा पूजित वीरमक्ष्मी कही जाती हैं।” ॥ अथर्ववेदीय सीतोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!