कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 714, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीराधि । पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रुतियोंद्वारा श्रीराधिकाजीकी उपासना और स्तुति किसी समय उपासनाओंके स्वरूप एव लक्ष्यका विचार ( तात्पर्य यह कि विशुद्ध हृदयसे ही श्रीराधिकाजीकी उपासना करते समय ब्रह्मवेत्ताओं (-वेदज्ञों ) ने परस्पर यह विचार सम्भव है, अतः यजनसे आत्मशुद्धि करके तब प्रणाम करती करना प्रारम्भ किया कि श्रीराधिकाजीकी उपासना किस हैं) ॥ ३ ॥ लिये होती है । इस विचारमें प्रवृत्त होनेपर उनपर भगवान् 'जिनके दिव्य शरीरकी कान्तिके पड़नेसे ( जिन योगमाया- आदित्य ( वेदोंके अधिष्ठाता प्रकाशमय ज्ञानके रूपमें ) रूपके आश्रयसे) इन्द्रनीलमणिके समान वर्णवाला (इन्द्रियातीत अत्यन्त कृपालु हुए । अर्थात् प्रकाशस्वरूप वैदिक ज्ञान उनमें नीलिमाव्यञ्जक ) देवाधिदेव श्रीकृष्णचन्द्रका शरीर भी गौर प्रकट हुआ । (उन्होंने श्रीराधिकाजीकी उपासनाके सम्बन्धमें जान पड़ने लगता है ( घनसत्त्व होकर आविर्भूत होता है ) श्रुतियोंको इस प्रकार सलग्न पाया—) ॥ १ ॥ तथा जिनकी कान्ति पड़नेसे भौंरे, कौए और कोयल ( विषय- श्रुतियाँ कहती हैं—'सम्पूर्ण देवताओंमें जो देवत्व रस-लोलुप, कटुभाषी पापी एव मधुरभाषी, पर स्वरूपसे कृष्ण ( शक्ति ) है, वह श्रीराधिकाजीकी ही है । समस्त प्राणी अर्थात् योग-ज्ञानादि साधक, जिनका बाह्यरूप नीरस एव श्रीराधिकाजीके द्वारा ही अवस्थित हैं । अर्थात् देवतासे अनाकर्षक है ) भी ( रासमण्डलमें ) गौरवर्णके ( सत्त्वगुणी लेकर क्षुद्र प्राणियोंतक सभी जीव श्रीराधिकाजीकी शक्तिसे एव भक्तियुक्त ) हो जाते हैं, उन विश्वकी पालिका श्रीराधिका- स्थित एव चेष्टायुक्त हैं और उन्हींसे अभिव्यक्त हुए हैं। इसलिये जीको हम नमस्कार करती हैं ॥ ४ ॥ हम सब श्रुतियाँ उन श्रीराधिकाजीको नमस्कार करती हैं ॥२॥ 'हम सब श्रुतियाँ, सांख्य-योग शास्त्र तथा उपनिषद् जिन 'देवताओंके निवास पञ्चभूत, इन्द्रियों आदिमें श्रीराधिका- परब्रह्मकी अभिन्न शक्तिकी अगम्यताका प्रतिपादन करती हैं, जीकी प्रेरणासे ही कम्पन ( चेष्टा ) होती है । तथा उन्हींकी जिनको स्वरूपतः भली प्रकार पुराण भी नहीं जानते, उन प्रेरणासे वे हँसते ( उल्लास प्राप्त करते ) और नाचते ( क्रिया- देवताओंकी पालिका श्रीराधिकाजीको हम नमस्कार करती हैं॥५॥ शील होते ) हैं । सबकी अधिदेवता श्रीराधिकाजी ही हैं सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर त्रिभुवनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र ( सब उनके वशमें हैं ) । अतएव अपने सम्पूर्ण पापोंके जिन्हें प्राणसे भी अधिक प्रिय मानते हैं, वृन्दावनमें नाशके लिये व्याहृतियों ( भूः-भुवः-स्वः या श्रीं-क्लीं-ह्रीं )- स्थित अपनी ( श्रुतियोंकी ) इष्ट—आराध्य-देवी उन श्रीवृन्दा द्वारा हवन करके फिर श्रीराधिकाजीको हम प्रणाम करती हैं ।