कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 716, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ ऋग्वेदीय श्रीराधोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीराधाजीके स्वरूप तथा नामोंका वर्णन
[बायाँ स्तम्भ] ॐ एक बार ऊर्ध्वरेता सनकादि महर्षियोंने भगवान् श्रीब्रह्माजीकी स्तुति करके पूछा, 'देव ! सर्वप्रधान देवता कौन हैं और उनकी कौन कौन-सी शक्तियाँ हैं तथा उन शक्तियोंमें सृष्टिका सर्वश्रेष्ठ कारण कौन-सी शक्ति है ?' यह सुनकर श्रीब्रह्माजी बोले—'पुत्रो ! सुनो, किंतु इस अति गोपनीय रहस्यको तुम किसीसे प्रकट न करना—तुम इसे किसी ऐरे-गैरेको मत दे डालना । हाँ, जो स्नेही हों, ब्रह्मवादी हों, गुरुभक्त हों, उन्हें अवश्य देना । उनके अतिरिक्त और किसीको देनेसे महान् पाप लगेगा । भगवान् हरि श्रीकृष्ण ही परमदेव हैं । वे छहों ऐश्वर्योंसे पूर्ण भगवान् गोप और गोपियोंके सेव्य, श्रीवृन्दा ( तुलसी ) देवीसे आराधित और श्रीवृन्दावनके अधीश्वर हैं । वे ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं । उन्ही श्रीहरिके एक रूप नारायण भी हैं जो कि अखिल ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर हैं । ये श्रीकृष्ण प्रकृतिसे भी पुरातन और नित्य हैं। उनकी आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञान, इच्छा और क्रिया आदि बहुत-सी शक्तियाँ हैं । उनमें आह्लादिनी सर्वप्रधान हैं । ये ही परम अन्तरङ्गभूता श्रीराधा है। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिये ये राधा है, अथवा ये सर्वदा कृष्णकी आराधना करती है; इसलिये राधिका कहलाती हैं । श्रीराधाको गान्धर्वा भी कहते हैं, ब्रजकी गोपाङ्गनाएँ, द्वारकाकी समस्त श्रीकृष्ण महिषियाँ और
[दायाँ स्तम्भ] श्रीलक्ष्मीजी इन्हीं श्रीराधिकाजीकी कायव्यूह (अंशरूपा) हैं। ये राधा और श्रीकृष्ण रस सागर एक होते हुए ही शरीरसे क्रीड़ाके लिये दो हो गये हैं। ये श्रीराधिकाजी भगवान् हरिकी सर्वेश्वरी, सम्पूर्ण सनातनी विद्या हे और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं । वेद एकान्तमे इनकी ऐसी ही स्तुति किया करते हैं । इनकी महिमाका मैं अपनी सम्पूर्ण आयुमें भी वर्णन नहीं कर सकता । जिसपर इनकी कृपा होती है, परमधाम उनके हाथमें आ जाता है । इन श्रीराधिकाजीको न जानकर जो श्रीकृष्णकी आराधना करना चाहता है, वह महामूर्ख है, मूढ़तम है । श्रुतियाँ इनके इन नामोंका गान करती है— १ राधा, २ रासेश्वरी, ३ रम्या, ४ कृष्णमन्त्राधिदेवता, ५ सर्वाद्या, ६ सर्ववन्द्या, ७ वृन्दावनविहारिणी, ८ वृन्दारोध्या, ९ रमा, १० अशेषगोपीमण्डलपूजिता, ११ सत्या, १२ सत्यपरा, १३ सत्यभामा, १४ श्रीकृष्णवल्लभा, १५ वृषभानुसुता, १६ गोपी, १७ मूल प्रकृति, १८ ईश्वरी, १९ गान्धर्वा, २० राधिका, २१ आरम्या, २२ रुक्मिणी, २३ परमेश्वरी, २४ परात्परतरा, २५ पूर्णा, २६ पूर्णचन्द्रनिभानना, २७ भुक्तिमुक्तिप्रदा तथा २८ भवव्याधिविनाशिनी । इन अट्ठाईस नामोंका जो पाठ करते है, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं। यों भगवान् श्रीब्रह्माजीने कहा है* ।
[पाद-टिप्पणी श्लोक]
- राधा रासेश्वरी रम्या कृष्णमन्त्राधिदेवता । सर्वाद्या सर्ववन्द्या च वृन्दावनविहारिणी ॥ वृन्दारोध्या रमाशेषगोपीमण्डलपूजिता । सत्या सत्यपरा सत्यभामा श्रीकृष्णवल्लभा ॥ वृषभानुसुता गोपी मूलप्रकृतिरीश्वरी । गान्धर्वा राधिकाऽऽरम्या रुक्मिणी परमेश्वरी ॥ परात्परतरा पूर्णा पूर्णचन्द्रनिभानना । भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं भवव्याधिविनाशिनी ॥