भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 832 में से

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पृष्ठ 718

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यन्तरण दिया गया है:

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय बिन्दू नि षद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मनके लयका साधन, आत्माका स्वरूप तथा ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय

ॐ । मन दो प्रकारका बताया गया है, एक तो शुद्ध मन और दूसरा अशुद्ध । जिसमें कामनाओं—विषय-भोगोंके सङ्कल्प उठते रहते हैं, वह अशुद्ध मन है, तथा जिसमें कामनाओंका सर्वथा अभाव हो गया है, वही शुद्ध मन है। मनुष्योंका मन ही उनके बन्धन और मोक्षका कारण है। विषयासक्त मन बन्धनका और विषय-सङ्कल्पसे रहित मन मोक्षका कारण माना गया है। क्योंकि विषय-सङ्कल्पसे शून्य होनेपर ही इस मनका लय होता है, इसलिये मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला साधक अपने मनको सदा विषयोंसे दूर रक्खे। जब मनसे विषयासक्ति निकल जाती है और वह हृदयमें स्थिर होकर उन्मनीभावको प्राप्त (संकल्प विकल्पसे रहित) हो जाता है, तब वही परम पद है। मनको तभीतक रोकनेका प्रयत्न करना चाहिये, जबतक कि वह हृदयमें ही विलीन नहीं हो जाता । मनका हृदयमें लय हो जाना—यही ज्ञान और मोक्ष है; इसके सिवा जो कुछ है, वह ग्रन्थका विस्तारमात्र है। जब न तो कोई चिन्तनीय रह जाय और न अचिन्तनीय ही रह जाय, चिन्तनीय तथा अचिन्तनीय दोनोंमेंसे किसीके प्रति भी मनका पक्षपात न रह जाय, उस समय यह साधक ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। स्वर अर्थात् प्रणवके साथ परमात्माकी एकता करे और फिर प्रणवसे अतीत परम तत्त्वकी भावना (चिन्तन) करे। प्रणवातीत तत्त्वकी उस भावनाके द्वारा भावरूप परमात्माकी ही उपलब्धि होती है, अभावकी नहीं। अर्थात् उसके बिना समाधि शून्यरूप ही होती है। वही कलाओंसे रहित अर्थात् अवयवहीन, विकल्पशून्य एव निरञ्जन—मायारूप मलरहित ब्रह्म है। 'वह ब्रह्म मैं हूँ' यों जानकर मनुष्य निश्चय ही ब्रह्म

हो जाता है। विकल्प-शून्य, अनन्त, हेतु और दृष्टान्तसे रहित, अप्रमेय तथा अनादि परम कल्याणमय ब्रह्मको जानकर विद्वान् पुरुष अवश्य ही ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १-९ ॥ न सहार है न सृष्टि; न बन्धन है न उससे छूटनेका उपदेश; न मुक्तिकी इच्छा है न मुक्ति। ऐसा निश्चय होना ही परमार्थबोध (यथार्थ ज्ञान) है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंमें एक ही आत्माका सम्बन्ध मानना चाहिये। जो इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत हो गया है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तर्यामी आत्मा प्रत्येक प्राणीके भीतर स्थित है। पृथक् पृथक् जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति वही एक और अनेक रूपोंमें दृष्टिगोचर होता है। घटमें आकाश भरा है, किन्तु घटके फूट जानेपर जैसे केवल घड़ेका ही नाश होता है, उसमें भरे हुए आकाशका नहीं, उसी प्रकार देहधारी जीव भी आकाशके ही समान है—शरीरके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता। जीवोंका यह भिन्न-भिन्न प्रकारका शरीर घटके ही सदृश है, जो बार-बार फूटता या नष्ट होता रहता है। यह नष्ट होनेवाला जड शरीर अपने भीतर परिपूर्ण चिन्मय ब्रह्मको नहीं जानता, परन्तु वह सर्वसाक्षी परमात्मा सब शरीरोंको सदा ही जानता रहता है। जीवात्मा जबतक नाममात्रका अस्तित्व रखनेवाली मायासे आवृत्त है, तबतक हृदय-कमलमें बद्धकी भाँति स्थित रहता है, जब अज्ञानमय अन्धकारका नाश हो जाता है, तब ज्ञानके आलोकमें विद्वान् पुरुष जीवात्मा और परमात्माकी नित्य एकताका ही दर्शन करता है ॥ १०-१५ ॥