भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 723

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ॐकारकी हंसरूपमें ॐ। प्रणवरूपी हंसका अकार दक्षिण पक्ष (पाँख) और हृदयमें है, तपोलोक कण्ठदेशमें है। भौंहों और ललाटके बीचमें उकार उत्तर (बायों) पक्ष माना गया है। मकार ही उसकी पूँछ है सत्यलोक व्यवस्थित है । उपर्युक्त कथनके अनुमोदनमें तथा अर्द्धमात्रा सिर है। रजोगुण और तमोगुण उसके दोनों श्रुतिने संगतिरूपसे 'सहस्राक्ष्यम्'* यह मन्त्र प्रदर्शित किया पैर हैं और सत्त्वगुण शरीर कहलाता है। धर्म दक्षिण नेत्र है है। इस प्रकारसे वर्णित जो ॐकाररूपी हंस है, उसपर और अधर्म वाम नेत्र कहलाता है। भूलोक उसके दोनों आरूढ—उसके चिन्तनमें निमग्न हुआ हंसयोग-विचक्षण पैरोंमें है। भुवर्लोक उसके दोनों जानुओंमें है, स्वर्लोक उसके पुरुष—प्रणवकी ध्यान-विधिमें कुशल उपासक कर्मानुष्ठान कटिदेशमें है और महर्लोक नाभिदेशमें है। जनलोक उसके करते हुए कोटि-कोटि पापोंसे छूटकर बन्धन-मुक्त हो जाता है ॥ १–५ ॥ द्वितीय खण्ड ॐकारकी बारह मात्राएँ और उनमें प्राण-वियोगका फल अकार नामकी प्रथम मात्रा आग्नेयी है, अग्निमण्डल वायु उसके देवता हैं। उसके बाद मकार नामकी उत्तर-मात्रा सदृश उसका रूप है, अग्नि उसके देवता हैं। दूसरी उकार सूर्यमण्डलके सदृश है, सूर्य ही उसके देवता हैं। और चौथी नामकी मात्रा वायव्या है, वायुमण्डलसदृश रूपवाली है। अर्द्धमात्रा वारुणी है, उसके देवता वरुण हैं । उन चारों

  • पूरा मन्त्र और उसका अर्थ इस प्रकार है—'सहस्राक्ष्य विहितावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पतत स्वर्ग म् देवान् सर्वानुरस्यथदद्य सम्पश्यन् याति भुवनानि पश्य ।' अर्थात् सूर्यदेवके विचरण करनेयोग्य जो स्वर्ग—द्युलोक है, उसकी ओर उड़नेवाले श्रीविष्णुरूपी हंस (ॐकार) के दो पक्ष हैं— पूर्व और पश्चिमके आकाशस्वरूप, अकार और उकार—ये दो मात्राएँ। वह ॐकाररूप हंस सात्त्विक देवताओंको अपने सत्त्वमय हृदयमें स्थापित करके सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देखता हुआ ब्रह्मलोकतक गमन करता है, उसपर आरूढ़ हुआ उपासक भी वहाँतक पहुँच जाता है।