भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 724

६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २ मात्राओंमेंसे प्रत्येक मात्रा तीन तीन कलारूपी मुखसे सुशोभित का उत्क्रमण होनेपर वह महिमाशाली यक्ष होता है । तृतीया है । इस प्रकार द्वादशकलात्मक 'ॐकार' कहा गया है । मात्रामे विद्याधर, और चतुर्थीमे गन्धर्व होता है। यदि पञ्चमी धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा इसको जानना चाहिये । मात्रामें उसका प्राणोंसे वियोग होता है तो वह तुषित नामके उन द्वादश कलाओंमें प्रथमा मात्रा 'घोषिणी' कहलाती है, देवताओंके साथ रहता हुआ चन्द्रलोकमे सम्मानित होता है। षष्ठी द्वितीया 'विद्युन्माला', तृतीया 'पतङ्गी', चतुर्थी 'वायुवेगिनी', मात्रामें (मृत्यु होनेपर) इन्द्रका सायुज्य प्राप्त होता है । सप्तमी- पञ्चमी 'नामधेया' और षष्ठी मात्रा 'ऐन्द्री' कहलाती है । में भगवान् विष्णुक पद ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्राप्त करता सप्तमीका नाम 'वैष्णवी' है और अष्टमी 'शाङ्करी' कहलाती है । अष्टमीमें रुद्रलोकमे जाकर पशुपति भगवान् शङ्करका है । नवमी 'महती', दशमी 'ध्रुवा', एकादशी 'मौनी' और सामीप्य लाभ करता है । नवमी मात्रामें महर्लोक, दशमी द्वादशी मात्रा 'ब्राह्मी' कहलाती है । यदि प्रथमा मात्रामें मात्रामे ध्रुवलोक, एकादशी मात्रामें तपोलोक तथा द्वादशी उपासकका प्राणान्त होता है तो वह भारतवर्षमें सार्वभौम मात्रामें प्राणका उत्क्रमण होनेपर उपासक शाश्वत ब्रह्मलोकमें चक्रवर्ती राजाके रूपमें जन्म लेता है । द्वितीया मात्रामें प्राणों- (ब्रह्माकी आयुपर्यन्त ) प्रतिष्ठित होता है ॥ १-१० ॥ तृतीय खण्ड योगयुक्त स्थितिका वर्णन इसकी अपेक्षा भी परतर—श्रेष्ठ, शुद्ध, व्यापक, निष्कल में ही आसक्त है, वह योगमार्गके द्वारा स्वस्थ होकर सब तथा कल्याणस्वरूप सदा उदित परब्रह्म-तत्त्व है; उसीसे प्रकारकी लौकिक आसक्तियोंसे मुक्त हो धीरे-धीरे शरीरमें अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि सभी प्रकारकी ज्योतियोंका उदय आत्माभिमानको त्याग दे । तब उसका संसार-बन्धन होता है । जब मन इन्द्रियातीत और सत्त्व आदि तीनों नष्ट हो जाता है; वह निर्मल, कैवल्य-प्राप्त और गुणोंके परे परतत्त्वमें लीन होता है, तब वह उपमारहित और परमात्मस्वरूप हो जाता है । और उसी ब्रह्मभावसे अभावरूप हो जाता है। उस स्थितिमें साधकको योगयुक्त परमानन्दको प्राप्त करता है, परमानन्दका उपभोग करता कहना चाहिये। जो परमात्माका भक्त है, जिसका मन परमात्मा- है ॥ १-४ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड ज्ञानीके लिये प्रारब्ध नहीं रह जाता हे महामते ! निरन्तर प्रयत्न करके आत्माके स्वरूपको प्रकार यह जाग्रत्-कालका शरीर भी अध्यासमात्र है । अध्यस्त जानकर उसीके चिन्तनमे अपना समय व्यतीत करो, समस्त पदार्थकी उत्पत्ति कहाँ होती है । और जिसकी उत्पत्ति नहीं प्रारब्धकर्मोंके भोगोंको भोगते हुए तुम्हे उद्विग्न नहीं होना हुई, उसकी स्थिति कहाँ । ( जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास चाहिये । आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्ध स्वयं नहीं छोड़ता। होनेपर रज्जुमें सर्प नहीं पैदा होता और न वहाँ सर्पकी परन्तु जब तत्त्वज्ञानका उदय होता है, तब ज्ञानीकी दृष्टिमे स्थिति ही होती है ।) इस प्रपञ्चका उपादान-कारण आत्मा प्रारब्धकर्मका उसी प्रकार अभाव हो जाता है, जिस प्रकार है, जिस प्रकार मिट्टीके पात्रोंका उपादान-कारण मिट्टी है । स्वप्नलोकके देहादिक असत् होनेके कारण जागनेपर नहीं वेदान्तके अनुसार यह प्रपञ्च अज्ञानके कारण आत्मामें भासता रह जाते । जन्मान्तरके लिये हुए जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध है, यदि अज्ञान नष्ट हो जाय तो विश्वकी विश्वता कहाँ रहेगी। कहे गये हैं। परन्तु ज्ञानीके लिये तो जन्मान्तर भी नहीं है, जिस प्रकार भ्रमसे मनुष्य रज्जुबुद्धिका त्याग करके उसे सर्प- अत उसके लिये कभी भी प्रारब्ध नहीं रहता । जिस प्रकार बुद्धिसे ग्रहण करता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुष सत्य स्वप्नकालीन देह देह नहीं होती अध्यासमात्र होती है, उसी (आत्मा)का ज्ञान न होनेके कारण प्रपञ्चको देखता है ।