भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 832 में से

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पृष्ठ 725

खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७१ जब सामने रस्सीके टुकड़ेको अच्छी तरह पहचान लेनेपर शिवस्वरूप परमात्माका आविर्भाव होता है—ठीक वैसे ही, जैसे उसमें प्रतीत होनेवाला सर्परूप नहीं रह जाता, उसी जिस प्रकार मेघके दूर हो जानेपर सूर्यनारायण प्रकाशित हो प्रकार अधिष्ठानस्वरूप आत्माका ज्ञान होनेपर जब प्रपञ्च भी उठते हैं। योगी सिद्धासनसे बैठकर वैष्णवी मुद्रा¹ धारण करके शून्यताको प्राप्त हो जाता है, तब देह भी प्रपञ्चरूप ही दहिने कानके भीतर उठते हुए नाद ( अनाहत ध्वनि ) होनेके कारण उसके साथ ही शून्यतामें परिणत हो जाता है। को सदा सुनता रहे। इस प्रकार अभ्यासमें लाया हुआ नाद उस अवस्था मे प्रारब्धकी स्थिति कैसे रह सकती है। अज्ञानी- वाह्य ध्वनियोंको आवृत कर लेता है। इस प्रकार एक पक्ष जनोंको समझानेके लिये प्रारब्धकी बात कही जाती है। अर्थात् अकारको जीतकर दूसरे पक्ष उकारको जीते और तदनन्तर कालवश ही प्रारब्धके नष्ट हो जानेपर प्रणव और क्रमशः सम्पूर्ण प्रणवपर विजय प्राप्तकर तुर्यपद अर्थात् ब्रह्मकी एकताके चिन्तनसे नादरूपमें साक्षात् ज्योतिर्मय, आत्मसाक्षात्कारको प्राप्त होता है ॥ १-११ ॥ द्वितीय खण्ड नादके अनेक प्रकार अभ्यासके प्रारम्भमें यह नाद बहुत जोर-जोरसे और तथा नगारेकी ध्वनिके समान वह नाद सुनायी देता है और नाना प्रकारसे सुनायी देता है और अभ्यासके बढ़ जानेपर अन्तमें किङ्किणी, वंशी, वीणा तथा भ्रमरकी ध्वनिके समान वह सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर रूपमें सुनायी पड़ता है। प्रारम्भमें समुद्र, मधुर नाद सुन पड़ता है। इस प्रकार सूक्ष्म-से-सूक्ष्म होते हुए बादल, भेरी तथा झरनोंसे उत्पन्न ध्वनिके समान एव मृदङ्ग, घंटे नाना प्रकारके नाद सुनायी पड़ते हैं ॥ १-३ ॥ तृतीय खण्ड नादानुसंधान जब महान् भेरी आदिकी ध्वनि सुन पड़े, तब उसमे मन उस नादके साथ ही सहसा चिदाकाशमे विलीन हो जाता सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर नादका विचार करे—घने नादको छोड़कर है। इसलिये नाद-श्रवणसे अतिरिक्त विषयोंकी ओरसे उदासीन सूक्ष्म नादमे अथवा सूक्ष्म नादको छोड़कर घने नादमें रमते होकर सयमी पुरुष निरन्तर अभ्यासके द्वारा मनको तत्काल या जाते हुए मनको अन्यत्र न ले जाय। पहले जिस किसी अपने प्रति उत्सुक बनानेवाले नादका ही श्रवण एव चिन्तन भी सूक्ष्म या घन नादमें मन लगता है, वहीं-वहीं वह स्थिर होकर करता रहे। सारी चिन्ताओंका त्याग करके, सारी चेष्टाओंको उस नादके साथ ही विलीन हो जाता है। सारे वाह्य प्रपञ्चको छोड़कर नादका ही अनुसंधान करे; क्योंकि नादमें चित्त भूलकर दूधमें मिले हुए पानीके समान नादमे एकीभूत हुआ विलीन होता है, नादमे चित्त विलीन होता है ॥ १-५ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड नादके द्वारा मन कैसे वशीभूत होता है जिस प्रकार पुष्परसका पान करता हुआ भ्रमर पुष्पगन्ध- चित्तरूपी आन्तरिक सर्प नादको ग्रहण करनेपर उस सुन्दर की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार नादमें सदा आसक्त नादकी गन्धसे बँधकर तत्काल सारी चपलताओंका रहनेवाला चित्त विषयोंकी आकाङ्क्षा नहीं करता । यह परित्याग कर देता है। फिर ससारको भूलकर और १ 'अन्तर्लक्ष्य वहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषा सा वैष्णवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ 'बाहरकी ओर निर्निमेष दृष्टि हो और भीतरकी ओर लक्ष्य हो—सब तन्त्रोंमें गूढ भावसे बतायी हुई वह वैष्णवी मुद्रा यही है।'

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