कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 726, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६७२ * नादबिन्दूपनिषद् * [ अध्याय ३ एकाग्र होकर इधर-उधर कहीं नहीं दौड़ता । विषयोंके यह नाद मनरूपी मृगके बाँधनेमें जालका काम करता उद्यानमे विचरनेवाले मनरूपी मतवाले हाथीको वशीभूत है । मनरूपी तरङ्गको रोकनेमे तट का काम करता करनेमे यह नादरूपी तीक्ष्ण अंकुश ही समर्थ होता है। है ॥ १-५ ॥ द्वितीय खण्ड नादमें मनका लय ' ब्रह्मस्वरूप प्रणवमें सलग्न नाद ज्योतिःस्वरूप होता है, मन भी अमन हो जाता है । सशब्द नाद अक्षर-ब्रह्ममें उँसमे मन लयको प्राप्त होता है । वही भगवान् विष्णुका क्षीण हो जाता है । उस निःशब्द नादको ही परम पद कहते परमपद है । जबतक शब्दोंका उच्चारण और श्रवण होता है, हैं। जब निरन्तर नादका अनुसन्धान करनेसे वासनाएँ तभीतक मनमे आकाशका सङ्कल्प रहता है । निःशब्द होनेपर सम्यक्रूपसे क्षीण हो जाती हैं, तब मन और प्राण निःसन्देह तो वह परम ब्रह्म परमात्मरूपमें ही अनुभूत होता है । जबतक निराकार ब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं । कोटि-कोटि नाद और नाद है, तबतक मन है । नादके सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर होनेपर कोटि-कोटि बिन्दु ब्रह्मप्रणवनादमें लीन हो जाते हैं ॥ १-५ ॥ तृतीय खण्ड मनके अमन हो जानेकी स्थितिका वर्णन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति प्रभृति सारी अवस्थाओंसे सम्यक्रूपसे त्याग कर देता है । योगीका चित्त जाग्रत्, स्वप्न, मुक्त हुआ तथा सारी चिन्ताओंको त्यागकर जो योगी सुषुप्ति आदि तीनो अवस्थाओंका कभी अनुसरण नहीं मृतवत् रहता है, वह मुक्त है—इसमें संशय नहीं है। वह करता । योगी जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थासे मुक्त होकर अपने शङ्ख-दुन्दुभिनादको कदापि नहीं सुनता । जिसमें मन अमन स्वरूपमें अवस्थित होता है । बिना दृश्य वस्तुके ही जिसकी हो जाता है, उस अवस्थाके होनेपर मन इस देहमें दृष्टि स्थिर है, बिना प्रयत्नके ही जिसकी प्राणवायु स्थिर है, रहकर भी काष्ठवत् निश्चेष्ट प्रतीत होता है। वह न शीत बिना किसी अवलम्ब या आश्रयके ही जिसका चित्त स्थिर जानता है न उष्ण और न सुख जानता है न दुःख । न हो गया है, वह योगी ब्रह्ममय प्रणवके अन्तर्वर्ती तुरीय-तुरीय मान समझता है न अपमान । समाधिके द्वारा वह इन सबका स्वरूप नादरूपमे स्थित है । यह इतना उपनिषद् है ॥ १-५ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!