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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

६७२ नादबिन्दूपनिषद् [ अध्याय ३

६७२ * नादबिन्दूपनिषद् * [ अध्याय ३ एकाग्र होकर इधर-उधर कहीं नहीं दौड़ता । विषयोंके यह नाद मनरूपी मृगके बाँधनेमें जालका काम करता उद्यानमे विचरनेवाले मनरूपी मतवाले हाथीको वशीभूत है । मनरूपी तरङ्गको रोकनेमे तट का काम करता करनेमे यह नादरूपी तीक्ष्ण अंकुश ही समर्थ होता है। है ॥ १-५ ॥ द्वितीय खण्ड नादमें मनका लय ' ब्रह्मस्वरूप प्रणवमें सलग्न नाद ज्योतिःस्वरूप होता है, मन भी अमन हो जाता है । सशब्द नाद अक्षर-ब्रह्ममें उँसमे मन लयको प्राप्त होता है । वही भगवान् विष्णुका क्षीण हो जाता है । उस निःशब्द नादको ही परम पद कहते परमपद है । जबतक शब्दोंका उच्चारण और श्रवण होता है, हैं। जब निरन्तर नादका अनुसन्धान करनेसे वासनाएँ तभीतक मनमे आकाशका सङ्कल्प रहता है । निःशब्द होनेपर सम्यक्रूपसे क्षीण हो जाती हैं, तब मन और प्राण निःसन्देह तो वह परम ब्रह्म परमात्मरूपमें ही अनुभूत होता है । जबतक निराकार ब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं । कोटि-कोटि नाद और नाद है, तबतक मन है । नादके सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर होनेपर कोटि-कोटि बिन्दु ब्रह्मप्रणवनादमें लीन हो जाते हैं ॥ १-५ ॥ तृतीय खण्ड मनके अमन हो जानेकी स्थितिका वर्णन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति प्रभृति सारी अवस्थाओंसे सम्यक्रूपसे त्याग कर देता है । योगीका चित्त जाग्रत्, स्वप्न, मुक्त हुआ तथा सारी चिन्ताओंको त्यागकर जो योगी सुषुप्ति आदि तीनो अवस्थाओंका कभी अनुसरण नहीं मृतवत् रहता है, वह मुक्त है—इसमें संशय नहीं है। वह करता । योगी जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थासे मुक्त होकर अपने शङ्ख-दुन्दुभिनादको कदापि नहीं सुनता । जिसमें मन अमन स्वरूपमें अवस्थित होता है । बिना दृश्य वस्तुके ही जिसकी हो जाता है, उस अवस्थाके होनेपर मन इस देहमें दृष्टि स्थिर है, बिना प्रयत्नके ही जिसकी प्राणवायु स्थिर है, रहकर भी काष्ठवत् निश्चेष्ट प्रतीत होता है। वह न शीत बिना किसी अवलम्ब या आश्रयके ही जिसका चित्त स्थिर जानता है न उष्ण और न सुख जानता है न दुःख । न हो गया है, वह योगी ब्रह्ममय प्रणवके अन्तर्वर्ती तुरीय-तुरीय मान समझता है न अपमान । समाधिके द्वारा वह इन सबका स्वरूप नादरूपमे स्थित है । यह इतना उपनिषद् है ॥ १-५ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अमृतनादोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रणवोपासना, योगके छः अङ्ग, प्राणायामकी विधि; योग-साधनका फल, पाँचों प्राणोंका रंग

बुद्धिमान् पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन करके एवं बार-बार उनका अभ्यास करके ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके परम कारणभूत इस बिजलीकी चमकके समान क्षणप्रभायी जीवनको व्यर्थ नष्ट न करे । ॐकारके रथमें बैठकर और भगवान् विष्णुको सारथि बनाकर ब्रह्मलोकके यथार्थ पदका अन्वेषण करते हुए भगवान् रुद्रकी आराधनामें तत्पर होना चाहिये।* तबतक रथसे चले, जबतक रथसे चलने योग्य मार्गपर ही स्थिति हो । जब वह मार्ग पूरा हो जाता है, तब उस रथ-मार्गपर खड़े हुए रथको छोड़कर मनुष्य स्वतः आगे चला जाता है । तात्पर्य यह कि जबतक लक्ष्यकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक दृढ़तापूर्वक साधनमें संलग्न रहना चाहिये; लक्ष्य सिद्धिके पश्चात् अनावश्यक साधन स्वतः छूट जाते हैं। प्रणवकी जो अकार आदि मात्राएँ हैं, उनके लिङ्गभूत जो 'जागरितस्थान सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः' इत्यादि पद हैं, उनके आश्रयभूत विश्व, विराट् आदिके चिन्तनपूर्वक उनका त्याग करके स्वरहीन (केवल नादरूप) मकारके द्वारा उसके अर्थभूत मात्र ईश्वरका चिन्तन करनेसे साधक

  • यहाँ प्रणव तथा उसकी मात्राओंके चिन्तनकी बात कही गयी है । प्रणवकी तीन मात्राएँ हैं—अकार, उकार तथा मकार । अकार विष्णुका, उकार ब्रह्माका तथा मकार भगवान् रुद्रका वाचक है । इन तीन मात्राओंका क्रमश चिन्तन करना चाहिये । विष्णुको सारथि बनाना 'अकार' रूप प्रथम मात्राका चिन्तन करना है । ब्रह्मलोक-पदका अन्वेषण उकारका चिन्तन है और रुद्रका आराधनाका तात्पर्य मकारका चिन्तन है । उ० अ० ८५—

क्रमशः उस सूक्ष्मपद (तुरीयतत्त्व) में प्रवेश करता है, जो अकारादि स्वरों और ककारादि व्यञ्जनोंसे व्यवहृत होनेवाले सम्पूर्ण प्रपञ्चसे सर्वथा परे है । शब्द-स्पर्शादि पाँचों विषय, उन्हें ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ तथा अत्यन्त चञ्चल मन--इनको सूर्यरूप अपने आत्माकी किरणोंके रूपमें देखे । अर्थात् आत्मप्रकाशसे ही मनकी सत्ता है और उसी आत्मप्रकाशकी बाह्य सत्तासे शब्दादि विषय भी सत्तावान् हैं, ऐसा चिन्तन करे । इस प्रकार अनात्मपदार्थोंकी ओरसे मन और इन्द्रियों- को समेटकर केवल आत्माके चिन्तनको 'प्रत्याहार' कहा जाता है। प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क (विचार) तथा समाधि—ये योगके छः अङ्ग बताये गये हैं ॥ १–६ ॥ जैसे पर्वतोंमें उत्पन्न स्वर्णादि धातुओंका मल उनको अग्निमें तपानेसे भस्म हो जाता है, वैसे ही इन्द्रियोंद्वारा लाये गये दोष प्राणोंके रोकने (प्राणायाम करने) से भस्म हो जाते हैं। प्राणायामके द्वारा दोषों (इन्द्रियोंमें आये हुए विकारों) को तथा धारणाके द्वारा पापों (इन्द्रिय लोलुपताके संस्कारों) को भस्म कर दे। इस प्रकार पापों तथा उनके संस्कारोंका नाश करके आराध्यके मनोहर स्वरूपका चिन्तन करे । आराध्यके उस मनोहर स्वरूपका चिन्तन करते हुए वायुको भीतर स्थिर रखना (कुम्भक करना), रेचक करना (श्वासको छोड़ना) तथा वायुको खींचना (पूरक करना)— इस प्रकार रेचक, पूरक तथा कुम्भकके रूपमें तीन प्रकारके प्राणायाम बताये गये हैं। प्राण शक्तिका विस्तार करनेवाला साधक (ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, ॐ महः, ॐ जनः,

६७४ * अमृतनादोपनिषद् * ॐ तपः, ॐ सत्यम्-इस प्रकार) व्याहृतियों तथा प्रणव- सहित सम्पूर्ण गायत्री मन्त्रका (ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् इस) शिरोभागके साथ पूरक, कुम्भक और रेचक करते समय जब तीन-तीन बार मानस-पाठ करे, तब उसे एक 'प्राणायाम' कहते हैं ॥ ७-१० ॥ प्राणवायुको आकाशमें निकालकर हृदयको वायुशून्य एव चिन्तनशून्य करके शून्यभावमें मनको लगा दे; यह रेचक प्राणायामका लक्षण है। जैसे मनुष्य मुखसे कमल नालद्वारा धीरे-धीरे जलको खींचता है, उसी प्रकार धीरे-धीरे वायुको अपने भीतर ग्रहण करना चाहिये-यह पूरकका लक्षण है। न तो श्वासको भीतर खींचे, न बाहर ही निकाले और न शरीरको हिलाये ही-इस प्रकार प्राणवायुका निरोध करे; यह कुम्भक प्राणायामका लक्षण है ॥ ११-१३ ॥ रूपोंको अंधेके समान देखे, शब्दको बहरेके समान सुने तथा शरीरको लकड़ीके समान समझे। अर्थात् रूप, शब्द तथा शरीरके सुख दुःखादिसे तनिक भी प्रभावित न हो । यह 'प्रशान्त' का लक्षण है। बुद्धिमान् पुरुष मनको सकल्पात्मक (सङ्कल्पस्वरूप) समझकर उसे आत्मामे (बुद्धिमें) विलीन कर दे तथा उस बुद्धिको भी परमात्म- चिन्तनमे स्थापित करे-लगाये। इसीको 'धारणा' कहा गया है। शास्त्रोंके अनुकूल ऊहा (युक्तिपूर्वक विचार) 'तर्क' कहा जाता है और जिसे प्राप्त करके दूसरे समस्त प्राप्तव्योंका अपमान कर देता है-सबको तुच्छ समझ लेता है, उस स्थितिको 'समाधि' कहा जाता है ॥ १४-१६ ॥ भूमिके समान एव रमणीय तथा (अशुद्धता, विषमता, कीटादियुक्तता प्रभृति) सम्पूर्ण दोषोंसे रहित भागमें मानसिक रक्षा (दिग्बन्धादि) करके और मण्डल (यदेतन्मण्डल तपति---इत्यादि मण्डल ब्राह्मण) का जप करके पद्मासन, स्वस्तिकासन अथवा भद्रासनमेंसे किमी योगासनको भली प्रकार लगाकर उत्तरकी ओर मुख करके बैठे। फिर एक अँगुलीसे नासिकाके एक छिद्रको बद करके दूसरे खुले छिद्रसे वायुको खींचकर, दोनों नासापुटोंको बदकर उस वायुको धारण करे। उस समय तेजोमय शब्द (प्रणव) का ही चिन्तन करे। वह शब्द 'ॐकार' स्वरूप एकाक्षर ब्रह्म ही है। फिर इसी 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका ही चिन्तन करता हुआ रेचक करे-वायुको धीरे-धीरे छोड़े। इस प्रकार अनेकों बार इस प्रणवस्वरूप दिव्य-मन्त्रके द्वारा (प्राणायाम करते हुए) अपने चित्तके मलको दूर करे ॥ १७-२० ॥ इस प्रकार प्राणायामद्वारा पापराशिका नाश करके पहले बताये हुए (अकार, उकार, मकार, बिन्दु तथा नादरूप) प्रणव-मन्त्रका ध्यान करे अर्थात् प्रणवकी प्रत्येक मात्राके साथ उसके लोक, गुण एव अधिदेवताका चिन्तन करते हुए प्राणायाम करे। इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामको स्थूलाति- स्थूल मात्रा*से अधिक कभी न करे। अपनी दृष्टिको तिर्यक् (सामनेकी ओर), ऊपरकी ओर अथवा नीचेकी ओर स्थिर करके महामति (परम बुद्धिमान्) साधक स्थिरतापूर्वक स्थित होकर, निष्कम्प (अङ्गचालनहीन) रहकर तब योगका अभ्यास करे ॥ २१-२२ ॥ यह योग तालवृक्षके समान कुछ समयमे फल देनेवाला है और इसका धारण नियत योजनापूर्वक (अर्थात् जितना प्रथम प्रारम्भ करे, उसे उतना ही रक्खे या बढाता जाय; पर न तो घटाये और न मध्यमे उसका विराम करे-इस प्रकार) करनेयोग्य है। इसमे द्वादश मात्राओकी (प्रणवकी अ, उ, म तथा नादरूप चारों मात्राओंकी तीनों प्राणायामोंमे) आवृत्ति भी कालसे निश्चित कही गयी है। अर्थात् एक मात्राके लिये जितना समय दिया जाय, दूसरीके लिये भी उतना ही समय देना चाहिये। कोई मात्रा शीघ्र एवं कोई देरतक मनमे न जपी जाय ॥ २३ ॥ यह प्रणव नामक घोष बाह्य प्रयत्नसे उच्चारित होनेवाला नहीं है। यह व्यञ्जन नहीं है। स्वर भी नहीं है। कण्ठ, तालु, ओष्ठ और नासिकासे उच्चारित होनेवाला (सानुनासिक) भी नहीं है। यह रेफजातीय (अर्थात् मूर्द्धासे उच्चारित होनेवाला भी) नहीं है। दोनों ओष्ठोंके भीतर स्थित दन्तनामक स्थानसे भी इसका उच्चारण नहीं हो सकता। यह वह अक्षर है, जो कभी क्षरित (च्युत) नहीं होता अर्थात् यह नादके अव्यक्त- रूपसे नित्य प्रकृतिमे विद्यमान रहता है। कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रणवका प्राणायामके रूपमें तो उपर्युक्त प्रकारसे समयादि- सयमसे अभ्यास करना चाहिये और निरन्तर नादके रूपमें मनको उसमें लगाये रहना चाहिये ॥ २४ ॥

  • एक समय इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामकी अस्सी आवृत्तियोंको 'स्थूल मात्रा' कहते हैं। एक बार वायु रोककर अस्सी बार प्रणवके जप करनेको 'अतिस्थूलमात्रा' प्राणायाम कहते हैं और ऐसे प्राणायामकी अस्सी बार आवृत्ति 'स्थूलातिस्थूलमात्रा' प्राणायाम है। इससे अधिक प्राण रोकना या अधिक आवृत्ति करना हानिकर है। प्राणायाम प्रात, मध्याह्न, साय एव अर्धरात्रिमैं---इस प्रकार चार बार नित्य करना चाहिये।
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७५ योगी जिससे मार्ग देखता है, अर्थात् मनके द्वारा जिस- जिस स्थानको उसमें प्रवेश करके गमन करनेयोग्य मानता है, प्राण उसी मार्ग (द्वार) से मनके साथ गमन करता है। अतएव प्राण श्रेष्ठ मार्गसे जाय, इसके लिये नित्य अभ्यास करना चाहिये। हृदयद्वार ही वायुके प्रवेशका द्वार है। इसी हृदय- द्वारसे प्राण सुषुम्णामार्गमें प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्व- गमनका मार्ग है। सबसे ऊपर इस सुषुम्णामार्गमें मोक्षका द्वार (जिस मार्गसे प्राणोत्सर्ग होनेपर योगी मोक्ष प्राप्त करता है) ब्रह्मरन्ध्र है। इसीको योगी सूर्यमण्डल जानते है। (इसी सूर्यमण्डल या ब्रह्मरन्ध्रको वेधकर प्राण छोड़नेसे मुक्ति होती है) ॥ २५-२६ ॥ भय, क्रोध, आलस्य, अत्यन्त निद्रा, अधिक जागना, बहुत भोजन करना और सर्वथा निराहार रहना—इनको योगी सर्वदा छोड़ दे। इस विधिसे भली प्रकार जो क्रमशः (उत्तरोत्तर बढाता हुआ) नित्य अभ्यास करता है, उसे तीन महीनोंमें स्वयं ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है— इसमें सन्देह नहीं। चार महीनोंमें वह देवताओंको देखने लगता है, पाँच महीनोंमें देवताओंके समान शक्तिशाली हो जाता है और नि सन्देह छः महीनोमे यदि उसकी इच्छा हो तो वह कैवल्य (जीवन्मुक्तावस्था) को प्राप्त कर लेता है।। २७-२९।। पृथिवीतत्त्वकी धारणाके समय प्रणवकी पाँच मात्राओंका, जल- तत्त्वकी धारणाके समय चार मात्राओंका, अग्नितत्त्वकी धारणाके समय तीन मात्राओंका, वायुतत्त्वकी धारणाके समय दो मात्राओं- का, आकाशतत्त्वकी धारणाके समय एक मात्रा का और स्वयं प्रणव- के रूपमें उसके अर्धमात्रास्वरूपका चिन्तन करे। अपने शरीरमें ही मनके द्वारा (पैरसे मस्तकटक क्रमश. पृथिवी आदिकी) धारणा करके पञ्चभूतोंकी सिद्धि करके उनका चिन्तन करे। इस प्रकार प्रणव-धारणाद्वारा पञ्चभूतोंपर अधिकार प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥ तीस अगुल लबा प्राण (श्वास) जिसमें प्रतिष्ठित है, वही इस प्राणवायुका अधिष्ठान (आश्रय) वास्तविक प्राण है। यही 'प्राण' नामसे विख्यात है। जो बाह्य प्राण है, वह तो इन्द्रियगोचर है, इस बाह्य प्राणमे एक लाख तेरह हजार छः सौ अस्सी निःश्वास (श्वास प्रश्वास) एक दिन-रात्रिमें आते हैं ॥ ३२-३३ ॥ आदि प्राण हृदयस्थानमे, अपान गुदास्थानमें, समान नाभिदेशमें तथा उदानं कण्ठमें निवास करता है। व्यान सम्पूर्ण अङ्गोंमें सर्वदा व्यापक होकर रहता है। अब क्रमशः प्राणादि पाँचों वायुओका रग वर्णन किया जाता है। प्राणवायु लाल रगकी मणिके समान कहा जाता है। अपान-वायु गुदाके मध्यमे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ेके समान लाल है। नाभिके मध्यभागमे समानवायु गायके दूधके समान अथवा स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। उदानवायु धूसर (मटमैले) और व्यान-वायु अग्नि-शिखाके रगका अर्थात् प्रकाशमय है ॥ ३४-३७ ॥ जिसका प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-स्थान, वायु-स्थान एव हृदयादि द्वारों) को वेधकर मस्तकमें चला जाता है, वह जहाँ-कहीं भी मरे, फिर जन्म नहीं लेता। वह फिर जन्म नहीं लेता ॥ ३८ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अमृतनादोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भीतर-बाहर नारायण ही व्याप्त हैं यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥ ( नारायणोप० ) जो कुछ जगत् देखने या सुननेमें आता है, उस सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके नारायण स्थित हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय मुद्गलोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड पुरुषसूक्तका संक्षिप्त विषय-निरूपण 'पुरुषसूक्त'के द्वारा प्रतिपादित अर्थ निर्णयकी व्याख्या इन तीन मन्त्रोंके समुदायद्वारा ही चतुर्व्यूहात्मक करता हूँ—इसे भगवान् वासुदेवने इन्द्रसे कहा और आगे भगवत्स्वरूपका वर्णन भी है। 'त्रिपाद्' प्रभृति मन्त्रके द्वारा विवेचन किया। पुरुषसंहितामे पुरुषसूक्तका अर्थ संक्षिप्त रीति- न्तुर्व्यूहके अनिरुद्ध-स्वरूपका वैभव वर्णित है। 'तस्माद्विराळ्०' से इस प्रकार बताया जाता है— इस मन्त्रद्वारा पादविभूतिरूप नारायणसे श्रीहरिकी स्वरूपभूता पुरुषसूक्तके 'सहस्रशीर्षा०' इस मन्त्रमे 'सहस्र' शब्द प्रकृति (माया) तथा पुरुष (जीव) की उत्पत्ति प्रदर्शित अनन्तका वाचक है। इसी प्रकार 'दशाङ्गुलम्' यह पद भी की गयी है। 'यत्पुरुषेण' इत्यादि मन्त्रद्वारा सृष्टिरूप यज्ञ अनन्त योजनोंका सूचक है। इस पुरुषसूक्तका उक्त 'सहस्र- कहा गया है और 'सप्तास्यासन् परिधय०' मन्त्रमें उस सृष्टि- शीर्षा०' मन्त्र भगवान् विष्णुके देशगत विभुत्वका वर्णन यज्ञके लिये समिधाका वर्णन हुआ है। यही सृष्टियज्ञ 'तं करता है, अर्थात् यह बतलाता है कि भगवान् सम्पूर्ण देशोंमें यज्ञमिति' मन्त्रके द्वारा बताया गया है और इस व्याप्त हैं। दूसरा मन्त्र इन्हीं भगवान् विष्णुकी कालतः व्याप्ति मन्त्रके द्वारा मोक्षका वर्णन भी हुआ है। 'तस्मादिति' बतलाता है, अर्थात् यह सूचित करता है कि भगवान् विष्णु इत्यादि सात मन्त्रोंमें जगत्‌की सृष्टि कही गयी है। 'वेदाहम्' सर्वकालव्यापी हैं—सब समय रहते हैं। तीसरा मन्त्र भगवान् इत्यादि दो मन्त्रोंमें श्रीहरिके वैभवका वर्णन किया गया है। विष्णुके मोक्षप्रदत्वको अर्थात् भगवान् श्रीहरि मोक्षदाता हैं— और 'यज्ञेन०' इस मन्त्रके द्वारा सृष्टि एव मोक्षके वर्णनका यह बतलाता है। 'एतावानस्य०' इस तीसरे मन्त्रसे श्रीहरिके उपसंहार किया गया है। जो इस प्रकार इस पुरुषसूक्तको जानता वैभवका वर्णन किया गया है ॥ १–३ ॥ है, वह निश्चय ही मुक्त हो जाता है ॥ ४-९ ॥ द्वितीय खण्ड महापुरुषका रूप-धारण इस प्रकार प्रथम खण्डके द्वारा मुद्गलोपनिषद्‌में पुरुष- लिये उस परम रहस्यस्वरूप ज्ञानका पुरुषसूक्तमय दो खण्डों- सूक्तका जो वैभव प्रतिपादित हुआ है, उसी भगवदीय ज्ञान- के द्वारा उपदेश किया है ॥ १ ॥ का भगवान् वासुदेवने इन्द्रको उपदेश देकर, फिर सूक्ष्मतत्त्व इस पुरुषसूक्तके दो खण्ड कहे जाते हैं। पुरुषसूक्तमें सुननेके लिये नम्र होकर शरणमें आये हुए उन्हीं इन्द्रके जिस पुरुषका वर्णन है, वह नाम-रूप तथा ज्ञानका

खण्ड ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७७

अविषय होनेके कारण (अपने ब्रह्मस्वरूपसे) सांसारिक प्राणियोंके लिये दुर्ज्ञेय है। अतः संसारी जीवोके लिये अपने इस दुर्ज्ञेयविषयत्व (स्वरूप) को छोड़कर श्वेतादिसे युक्त देवादि (सत्त्वगुणविशिष्ट जीवों) के उद्धारकी इच्छासे उन्होंने सहस्र (अनन्त) कलाओंवाले अवयवोंसे युक्त ऐसे कल्याण- स्वरूप वेषको धारण किया, जो दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। उसी वेष (रूप) से भूमि आदि लोकोंमें व्याप्त होकर वे अनन्त योजनोंतक स्थित हुए। सृष्टिके पूर्व पुरुषस्वरूप नारायण ही भूत, वर्तमान एव भविष्य—तीनों कालोंके रूपमें अवस्थित थे। वे ही इन सब (जीवो) को मोक्ष देनेवाले हैं। वे सम्पूर्ण महत्त्वशालियोंसे श्रेष्ठ हैं। उनसे अधिक श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है ॥ २-३ ॥

उक्त महापुरुष (परमात्मा) ने अपनेको चार अंशों (चतुर्व्यूहों) मे प्रकट किया। उनमेंसे तीन अंगों (त्रिपादविभूति अथवा वासुदेव, प्रद्युम्न और सङ्कर्षणरूप) से वे परमव्योम (अपने परमधाम वैकुण्ठ) में निवास करते हैं तथा इनसे भिन्न अवशिष्ट चतुर्थ अंश—चतुर्थ व्यूहरूप अनिरुद्ध नामक प्रसिद्ध नारायणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वकी रचना (अभिव्यक्ति) हुई॥४॥

उस अनिरुद्धरूप चतुर्थपादात्मक नारायणने जगत्की सृष्टिके लिये प्रकृति (ब्रह्मा) को उत्पन्न किया। वे ब्रह्माजी शरीर प्राप्त करके भी सृष्टिकर्मको न जान सके। तब उन अनिरुद्धस्वरूप नारायणने ब्रह्माजीको सृष्टिका उपदेश किया। भगवान् नारायणने कहा—'ब्रह्माजी ! तुम अपनी इन्द्रियोंका यज्ञकर्ताओंके रूपमे ध्यान करो, कमलकोशसे उत्पन्न सुदृढ ग्रन्थिरूप (बलवान्) अपने शरीरको हवि समझो, मुझे अग्नि मानो, वसन्तकालमें घृतकी धारणा करो, ग्रीष्म ऋतुमें समिधाका भाव करो, शरद् ऋतुको रसरूप समझो। इस प्रकार अग्निमें हवन करनेपर तुम्हारा शरीर इतना सुदृढ हो जायगा कि उसके स्पर्शसे वज्र भी कुण्ठित हो जायगा। तब अपने कार्यरूप (कारणरूपमें विलीन होनेकी अवस्थासे कार्यरूपमें) सब प्राणी—पशु प्रभृति जीव प्रादुर्भूत होंगे। फिर सम्पूर्ण स्थावर- जङ्गम जगत् हो जायगा। इस प्रकार जीव एव आत्माके योगद्वारा मोक्षका प्रकार भी वर्णन किया गया, यह समझना -चाहिये। जो इस सृष्टि-यज्ञ तथा मोक्षप्रकारको भी जानता है, वह पूर्णायुको प्राप्त होता है ॥ ५-७ ॥

तृतीय खण्ड उपासकोंद्वारा अनेक रूपमें देखे गये महापुरुषमें आत्मत्वकी भावनासे उनके स्वरूपकी प्राप्ति

एक ही देव बहुत प्रकारसे प्रविष्ट होकर स्वय अजन्मा रहते हुए भी बहुत प्रकारसे प्रकट होता है। (तात्पर्य यह कि वही एक देव नानात्वमें व्याप्त है। वह स्वयं अजन्मा है, किंतु नानात्वकी सृष्टि भी उसीके द्वारा होती है। नानात्वके रूपमें भी वही है) ॥ १ ॥

अध्वर्युगण उसीकी उपासना इस अग्निके रूपमें करते हैं। यजुर्वेदीय उसीको 'यह यजुः है' इस बुद्धिसे सर्वयज्ञिय कर्मोमे योजित करते हैं। सामगान करनेवाले उसे 'साम' समझते हैं। इसी नारायणरूपमें निश्चय यह सब (दृश्य-जगत्) प्रतिष्ठित है। (तात्पर्य यह कि वही परमतत्त्व यज्ञमें अग्नि, मन्त्र तथा साम है। इससे भी आगे वह समस्त जगत्का आधार है।) सर्प उसे विष मानकर अपनाते हैं। सर्पवेत्ता (योगी) इसे सर्प—प्राणरूपसे ग्रहण करते हैं। देवता इसे अमृतरूपमे अपनाते हैं और मनुष्य इसे धन मानकर जीवन-निर्वाह करते हैं। असुर माया समझते हैं, पितर स्वधा (पितृभोजन) मानते हैं, देवजनवेत्ता (देवोपासक) देवता मानते हैं, गन्धर्व रूप समझते हैं और अप्सराएँ गन्धर्व समझती हैं। इसकी जो जिस भावसे उपासना करता है, यह परमतत्त्व उसके लिये उसी रूपका हो जाता है। इसलिये ब्रह्मज्ञानीको 'पुरुषरूप परब्रह्म मैं ही हूँ' यह भावना करनी चाहिये। ऐसी भावनासे वह उसी स्वरूपको प्राप्त हो जाता है और जो इस रहस्यको इस प्रकार जानता है, वह भी तद्रूप हो जाता है ॥ २-३ ॥

चतुर्थ खण्ड ब्रह्मका स्वरूप तथा उपनिषद्के अध्ययनका माहात्म्य, सूक्तके अनधिकारी तथा उसके उपदेशकी विधि

वह ब्रह्म तीनों तापोंसे रहित, छः कोशोंसे शून्य, षड्- ऊर्मियोंसे वर्जित, पञ्चकोशोंसे अतीत, षड्भावविकारोंसे रहित—इस प्रकार सबसे विलक्षण है। आध्यात्मिक, आधि- भौतिक और आधिदैविक—ये 'तीन ताप' हैं जो कर्ता- कर्म-कार्य, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय और भोक्ता भोग भोग्य—इस प्रकार एक-एक त्रिविध हैं। चर्म, मास, रक्त, अस्थि, नसें और मज्जा—ये 'छः कोश (धातु)' हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—ये 'छः शत्रुवर्ग' हैं। 'पञ्च कोश' हैं—अन्नमय,

६७८ * मुद्गलोपनिषद् * [ खण्ड ४ प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। प्रिय होना, उत्पन्न होना, बढ़ना, बदलना, घटना और नाश होना—ये 'छः भावविकार' हैं। भूख, प्यास, शोक, मोह, वृद्धावस्था और मृत्यु—ये छः ऊर्मियों हैं। कुल, गोत्र, जाति, वर्ण, आश्रम और रूप—ये 'छः भ्रम होते हैं। इन सबके योगसे परम पुरुष ही जीव होता है, दूसरा नहीं ॥ १-९ ॥ जो इस उपनिषद्‌का नित्य अध्ययन करता है वह अग्नि- पूत होता है। वह वायूपूत होता है। वह आदित्यपूत होता है। वह रोगहीन हो जाता है। श्रीसम्पन्न हो जाता है। पुत्र-पौत्रादिनी समृद्धिसे युक्त हो जाता है। विद्वान् हो जाता है। महापापोंसे पवित्र हो जाता है। × × × काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्यादिसे बाधित नहीं होता। सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसी जन्ममें वह पुरुष (परमात्मरूप) हो जाता है ॥ १० ॥ इसलिये इस पुरुषसूक्तका अर्थ अत्यन्त रहस्ययुक्त है। यह राजगुह्य देवगुह्य एव गोपनीयोंसे भी अधिक गोपनीय है। जो दीक्षित न हो, उसे इसका उपदेश न करे; जो विद्वान् होनेपर भी जिज्ञासुभावसे प्रश्न न करता हो, उसे भी इसका उपदेश न करे। जो यज्ञ न करता हो, उसे भी उपदेश न करे, अवैष्णवको न करे, अयोगीको न करे, बहुभाषीको न करे, अप्रियभाषीको न करे, जो वर्षभरमें एक बार वेदोंका स्वाध्याय न कर ले, उसे भी न करे, असंतोषीको न करे और जिसने वेदोंका अध्ययन न किया हो, उसे भी इसका उपदेश न करे। इसको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् गुरु भी पवित्र देशमें, पुण्य नक्षत्रमे, प्राणायाम करके, परमपुरुषका ध्यान करता हुआ, विनीतभावसे शरणमे आये हुए शिष्यको ही उसके दाहिने कानमे इस पुरुषसूक्तके अर्थका उपदेश करे। बहुत न बोले। नहीं तो वह उपदेश यातयामत्वरूप दोषसे दूषित हो जाता है (उसका सार चल जाता है, अतः वह उपदेश सफल नहीं हो पाता)। बार-बार कानमे उपदेश दे। ऐसा करनेवाला अध्येता (शिष्य) और अध्यापक (गुरु) दोनो इसी जन्ममें पुरुष—ब्रह्मरूप हो जाते हैं ॥ ११ ॥

॥ ऋग्वेदीय मुद्गलोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

नारायणपरो ज्योतिरात्मा नारायणः परः। नारायणपरं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायणपरो ध्याता ध्यानं नारायणः परः॥ (नारायणोप०) नारायण परमज्योति हैं, नारायण परमात्मा हैं, नारायण परब्रह्म हैं, नारायण परमतत्त्व हैं, नारायण परम ध्याता हैं और नारायण ही परम ध्यान हैं।

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७९ ( मुद्गलोपनिषद्में वर्णित पुरुषसूक्त ) अथ पुरुषसूक्तप्रारम्भः

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुष सहस्राक्ष सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥ ॐ

उन परमपुरुषके सहस्रों (अनन्त) मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। वे इस सम्पूर्ण विश्वकी समस्त भूमि (पूरे स्थान) को सब ओरसे व्याप्त करके इससे दस अङ्गुल (अनन्त योजन) ऊपर स्थित है। अर्थात् वे ब्रह्माण्डमे व्यापक होते हुए उससे परे भी हैं। [यह मन्त्र भगवान् विष्णुके देशगत विभुत्वका प्रतिपादक है।] ॥ १ ॥

ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ २ ॥

  • यह जो इस समय वर्तमान (जगत्) है, जो बीत गया और जो आगे होनेवाला है, यह सब वे परमपुरुष ही है। इसके अतिरिक्त वे अमृतत्व (मोक्षपद) के तथा जो अन्नसे (भोजनद्वारा) जीवित रहते हैं, उन सबके भी ईश्वर (अधीश्वर—शासक) हैं। [यह मन्त्र भगवान्‌के सर्वकालव्यापी रूपका वर्णन करता है।] ॥ २ ॥

ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाञ्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ३ ॥

यह भूत, भविष्य, वर्तमानसे सम्बद्ध समस्त जगत् इन परम पुरुषका वैभव है। वे अपने इस विभूति-विस्तारसे महान् हैं। उन परमेश्वरकी एकपाद विभूति (चतुर्थांश) में ही यह पञ्चभूतात्मक विश्व है। उनकी शेष त्रिपादविभूतिमें शाश्वत दिव्यलोक (वैकुण्ठ, गोलोक, साकेत, शिवलोक आदि) हैं। [यह मन्त्र भगवान्‌के वैभवका वर्णन करता है और नित्य लोकोंके वर्णनद्वारा उनके मोक्षपदत्वको भी बतलाता है।] ॥३॥

ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुष पादोऽस्येहाभवत्पुन । ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ॥ ४ ॥

वे परमपुरुष स्वरूपतः इस मायिक जगत्‌से परे त्रिपादू-विभूतिमे प्रकाशमान हैं। (वहाँ मायाका प्रवेश न होनेसे उनका स्वरूप नित्य प्रकाशमान है।) इस विश्वके रूपमें उनका एक पाद ही प्रकट हुआ है। अर्थात् एक पादसे वे ही विश्वरूप भी हैं। इसलिये वे ही सम्पूर्ण जड एवं चेतनमय उभयात्मक जगत्‌को परिव्याप्त किये हुए हैं। [इस मन्त्रमें भगवान्‌के चतुर्व्यूहरूपमेंसे चतुर्थ अनिरुद्धरूपका वर्णन हुआ है। यही रूप एकपाद ब्रह्माण्डवैभवका अधिष्ठान है।] ॥ ४ ॥

ॐ तस्माद् विराळजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ॥ ५ ॥

उन्हीं आदिपुरुषसे विराट् (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न हुआ। वे परमपुरुष ही विराट्‌के अधिपुरुप—अधिदेवता (हिरण्यगर्भ) हुए। वह (हिरण्यगर्भ) उत्पन्न होकर अत्यन्त प्रकाशित हुआ। पीछे उसीने भूमि (लोकादि) तथा शरीर (देव, मानव, तिर्यक् आदि) उत्पन्न किये। [इस मन्त्रमें श्रीनारायणसे माया एव जीवोंकी उत्पत्तिका वर्णन है।] ॥ ५ ॥

ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्म शरद्धविः ॥ ६ ॥

देवताओंने उस पुरुषके शरीरमें ही हविष्यकी भावना करके यज्ञ सम्पन्न किया। इस यज्ञमें वसन्त ऋतु घृत, ग्रीष्म


पाद-टिप्पणी (Footnote):

  • उपनिषद्‌के अनुसार पुरुषसूक्तके प्रारम्भिक चार मन्त्रोंमें वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एव अनिरुद्ध—इन चतुर्व्यूहात्मक भगवत्-स्वरूपोंका वर्णन भी होता है। प्रथम मन्त्रमें भगवान्‌के वासुदेव-स्वरूपका वर्णन है। मन्त्रके अनुसार वे अनन्त हैं, सबको व्याप्त करके भी सबने परे हैं। उन्हींका दिव्य प्रकाश समस्त अन्त करणोंमें है और फिर भी वे अन्त करणोंके धर्मोंसे निर्लिप्त, सबसे परे हैं। यही उनका चेतनात्मक वासुदेवरूप है।

दूसरे मन्त्रमें उनके संकर्षण-स्वरूपका वर्णन है। संकर्षणस्वरूप दिव्य प्राणात्मक है। समस्त जगत् त्रिकालमें इसी रूपसे व्यक्त होता है और भगवान्‌का यही रूप उसका शासक एव स्वामी है। यही भगवान्‌का ईश्वरस्वरूप है।

तीसरे मन्त्रमें भगवान्‌के प्रद्युम्न-स्वरूपका वैभव है। भगवान्‌का यह स्वरूप सौन्दर्य-घन, दिव्य कामात्मक एव ध्यानगम्य है। त्रिपाद्विभूतिमें नित्यलोकोंमें भगवान् इसी स्वरूपसे विराजमान हैं। श्रुतिके इस तात्पर्यको उपनिषद्‌ने स्पष्ट किया है।

चतुर्थ मन्त्रमें भगवान्‌का अनिरुद्ध—दुर्निवार स्वरूप है। भगवान्‌का यह स्वरूप योगमायासमन्वित है। वही जगद्रूप एव जगत्‌का कारण है। यही रूप भगवान्‌की चतुर्थ पादविभूतिका है।

६८० : मुद्गलोपनिषद् : ऋतु इन्धन और शरद् ऋतु हविष्य ( चरु-पुरोडाशादि विशेष हविष्य ) हुए । अर्थात् देवताओने इनमें यह भावना की । [ इस मन्त्रमें सृष्टिरूप यज्ञका वर्णन है और आगे आठ मन्त्रोंतक वही है । ] ॥ ६ ॥ ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ ७ ॥ सबसे प्रथम उत्पन्न उस पुरुषको ही यज्ञमे देवताओं, साध्यों और ऋषियोंने ( पशु मानकर ) कुशके द्वारा प्रोक्षण करके ( मानसिक ) यज्ञ सम्पूर्ण किया । [ इस मन्त्रमें सृष्टि- यज्ञके साथ मोक्षका वर्णन भी किया गया है । ] ॥ ७ ॥ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशून् ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥ ८ ॥ उस ऐसे यज्ञसे जिसमें सब कुछ हवन कर दिया गया था, प्रशस्त घृतादि ( दूध, दधि प्रभृति ) उत्पन्न हुए । इस उस यज्ञरूप पुरुषने ही वायुमे रहनेवाले, ग्राममें रहनेवाले, वनमें रहनेवाले तथा दूसरे पशुओंको उत्पन्न किया । ( तात्पर्य यह कि उस यज्ञसे नभ, भूमि एव जलमे रहनेवाले समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और उन प्राणियोंसे देवताओंके योग्य हवनीय प्राप्त हुआ । ) ॥ ८ ॥ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ ९ ॥ जिसमें सब कुछ हवन क्रिया गया था, उस यज्ञपुरुषसे ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए । उसीसे गायत्री आदि छन्द प्रकट हुए । उसीसे यजुर्वेदकी भी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥

  • उपनिषदके अनुसार श्रुतिने मोक्षका प्रतिपादन भी किया है । 'परोक्षवादो वेदोऽयम्'–श्रुतियोंमें अध्यात्मवाद परोक्ष- रूपसे निरूपित है । अत मोक्षप्रतिपादनके लिये इस श्रुतिका अर्थ इस प्रकार होगा— उस आत्म-शोधनरूप यज्ञमें देवताओं-दिव्यवृत्तियोंने पुरुष- शरीराभिमानीको, जो शरीरमें अहङ्कार करके पशु हो गया था, कुशोंके—साधनोंके द्वारा प्रोक्षित—विशुद्ध किया । इस प्रकार प्रोक्षित होनेपर वह अग्रजन्मा ब्राह्मण—ब्रह्मज्ञानसम्पन्न हुआ । इसी प्रकार इन्द्रादि देवताओंने, साध्य देवताओंने और ऋषियोंने भी यजन किया । सबने इसी रीतिसे शरीराभिमानीका आत्मशोधन करके मोक्ष प्राप्त किया । ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥ १० ॥ उस यज्ञपुरुषमें घोड़े उत्पन्न हुए । उनके अतिरिक्त नीचे-ऊपर दोनो ओर दाँतोंवाले ( गर्दभादि ) भी उत्पन्न हुए । उसीसे गौएँ उत्पन्न हुईं और उसीसे बकरियों और मेढ़ें भी उत्पन्न हुईं ॥ १० ॥ ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥ ११ ॥ देवताओंने जिस यज्ञपुरुषका विधान ( सङ्कल्प ) किया, उसको कितने प्रकारसे ( किन अवयवोंके रूपमें ) कल्पित किया, इसका मुख क्या था, बाहुएँ क्या थीं, जघाएँ क्या थीं और पैर कौन थे—यह बताया जाता है ॥ ११ ॥ ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ १२ ॥ ब्राह्मण इसका मुख था । ( मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए । ) क्षत्रिय दोनों भुजाएँ बना । ( दोनो भुजाओंसे क्षत्रिय उत्पन्न हुए । ) इस पुरुषकी जो दोनों जङ्घाएँ थीं, वही वैश्य हुईं अर्थात् उनमे वैश्य उत्पन्न हुए, और पैरोंसे शूद्र-वर्ण प्रकट हुआ ॥ १२ ॥ ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत ॥ १३ ॥ उस यज्ञपुरुषके मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए । नेत्रोसे सूर्य प्रकट हुए । मुखसे इन्द्र और अग्नि तथा प्राणसे वायुकी उत्पत्ति हुई ॥ १३ ॥ ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ १४ ॥ यज्ञपुरुषकी नाभिसे अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुआ । मस्तक- से स्वर्ग प्रकट हुआ । पैरोंसे पृथिवी, कानोंसे दिशाएँ हुईं । इस प्रकार समस्त लोक उस पुरुषमें ही कल्पित हुए ॥ १४ ॥ ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ १५ ॥ देवताओंने जब यज्ञ करते समय ( संकल्पसे ) पुरुषरूप पशुका बन्धन किया, तब सात समुद्र इसकी परिधि ( मेखलाएँ ) थे । इक्कीस प्रकारके छन्दोंकी ( गायत्री, अतिजगती और कृतिमैसे प्रत्येकके सात-सात प्रकारसे ) समिधा बनी ॥ १५ ॥ [ इस मन्त्रमे सृष्टि-यज्ञकी समिधाका वर्णन है । ]
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८१ ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसस्तु पारे। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते* ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिनकी स्तुति की थी, इन्द्रने चारों दिशाओंमें जिसे (व्याप्त) जाना था, उस परम पुरुषको जो इस प्रकार (सर्वस्वरूप) जानता है, वह यहीं अमृतपद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग निज-निवास (स्वस्वरूप या भगवद्धाम)-की प्राप्तिका नहीं है ॥ १७ ॥ ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा- स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमान सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवा ‡ ॥ १८ ॥ देवताओने (पूर्वोक्त रूपसे) यज्ञके द्वारा यज्ञस्वरूप परम- पुरुषका यजन (आराधन) किया। इस यज्ञसे सर्वप्रथम सब धर्म उत्पन्न हुए। उन धर्मोंके आचरणसे वे देवता महान् महिमावाले होकर उस स्वर्गलोकका सेवन करते हैं, जहाँ प्राचीन साध्य देवता निवास करते हैं ॥ १८ ॥ [इस मन्त्रमें सृष्टि-यज्ञ एवं मोक्षके वर्णनका उपसंहार है।] तमस् (अविद्यारूप अन्धकार) से परे आदित्यके समान प्रकाशस्वरूप उस महान् पुरुषको मैं जानता हूँ। सबकी बुद्धिमें रमण करनेवाला वह परमेश्वर सृष्टिके आरम्भमें समस्त रूपोंकी रचना करके उनके नाम रखता है, और उन्हीं नामोंसे व्यवहार करता हुआ सर्वत्र विराजमान होता है ॥ १६ ॥ [इस मन्त्रमें और इसके आगेके मन्त्रमें भी श्रीहरिके वैभवका वर्णन है।] ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्रदिशश्चतस्रः। तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय† ॥ १७ ॥ ॥ पुरुषसूक्त सम्पूर्ण ॥ परमपद यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुर्वाति यत्र न चन्द्रमा भाति यत्र न नक्षत्राणि भान्ति यत्र नाग्निर्दहति यत्र न मृत्युः प्रविशति यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति सदानन्दं परमानन्दं शान्तं शाश्वतं सदाशिवं ब्रह्मादिवन्दितं योगिध्येयं परं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिनः। (बृहज्जाबाल०) जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहता, जहाँ चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होता, जहाँ तारे नहीं चमकते, जहाँ अग्नि नहीं जलता, जहाँ मृत्यु प्रवेश नहीं करता, जहाँ दुःख नहीं आ सकते, जो सदानन्द, परमानन्द, शान्त, सनातन, सदा कल्याणमय, ब्रह्मादिसे वन्दित है, वही योगियोंका ध्येय परमपद है, जिसको प्राप्त होकर योगी लौटते नहीं। *-† ये दोनों मन्त्र ऋग्वेदकी प्रचलित प्रतियोंके पुरुषसूक्तमें नहीं मिलते, परन्तु पुरुषसूक्तके पृथक् प्रकाशित कई संस्करणोंमें मिलते हैं। मूल उपनिषद्में भी इनका सकेत है। ये मन्त्र 'पारमात्मिकोपनिषद्,' 'महावाक्योपनिषद्' तथा 'चित्युपनिषद्' में आये हैं। १७ वाँ मन्त्र 'तैत्तिरीय आरण्यक' में भी है। ‡ उपनिषद् इस मन्त्रमें मोक्ष-निरूपणका उपसंहार भी निरूपित—निर्दिष्ट करता है। अत मोक्ष-निरूपणके लिये श्रुतिका अर्थ इस प्रकार होना चाहिये। सम्पूर्ण कर्म, जो भगवदर्पण-बुद्धिसे भगवान्‌के लिये किये जाते हैं, यज्ञ हैं। उस कर्मरूप यज्ञके द्वारा सात्त्विक वृत्तियोंने उन यज्ञस्वरूप भगवान्‌का यजन—पूजन किया। इसी भगवदर्पणबुद्धिसे किये गये यज्ञरूप कर्मोंके द्वारा ही सर्वप्रथम धर्म उत्पन्न हुए—धर्माचरणकी उत्पत्ति भगवदर्पणबुद्धिसे किये गये कर्मोंसे हुई । इस प्रकार भगवदर्पणबुद्धिसे अपने समस्त कर्मोंके द्वारा जो भगवान्‌का यजन- रूप कर्मका आचरण करते हैं, वे उस भगवान्‌के दिव्यधामको जाते हैं, जहाँ उनके साध्य—आराध्य आदिदेव भगवान् विराजमान हैं। उ० अं० ८६-

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय सावित्र्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! सविता एवं सावित्रीकी सर्वव्यापकता; सावित्रीके चार पाद; सावित्रीको जाननेका फल; बला-अतिबला विद्याओंकी उपासना

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८३ सावित्रीका यह तीसरा पाद है 'स्वः—धियो यो नः प्रचोदयात्।' स्त्री और पुरुष दोनों प्रजोत्पादन करते हुए (गृहस्थाश्रम- का पालन करते हुए) जो इस सावित्रीदेवीको इस प्रकार जानते हैं, वे पुनः मृत्युको नहीं प्राप्त होते। अर्थात् सविता देवताके उपासक मृत्युको जीत लेते हैं और अमरत्वको प्राप्त करते हैं। बला-अतिबला विद्याओंके विराट् पुरुष ऋषि हैं; गायत्री छन्द है और गायत्री देवता हैं। अकार बीज है, उकार शक्ति है और मकार कीलक है। क्षुधा आदिके निवारणके निमित्त इसका विनियोग है। क्लींके द्वारा षडङ्गन्यास करे। 'ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम्, ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट्।' अब ध्यानका वर्णन करते हैं। अमृतसे जिनके करतल आर्द्र हो रहे हैं, सब प्रकारकी सञ्जीवनी शक्तियोंसे जो सम्पन्न हैं, पापोंका नाश करनेमेंजो सुदक्ष हैं तथा जो वेदोंके सारस्वरूप, किरणात्मक, प्रणवरूप विकारवाले एव सूर्यनारायणके सदृश सुदीप्त शरीरवाले हैं, उन वला और अतिबला विद्याओंके अधिष्ठातृ-देवताओंको मैं निरन्तर अनुभव करता हूँ। वला-अतिबला विद्याओंके अधिष्ठातृ-देवताका मन्त्र है— ॐ ह्रीं वले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरुषार्थ- सिद्धिप्रदे तत्सवितुर्वरेदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुद्रमोपनाशिनि धीमहि धियो यो नो जाते प्रचुर्य. या प्रचोदयादात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हु फट् स्वाहा। इस प्रकार जाननेवाला कृतकृत्य हो जाता है। वह सावित्रीदेवीके ही लोकको प्राप्त होता है। यह उपनिषद् है। ॥ सामवेदीय सावित्र्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ब्रह्मको ढूँढ़ना चाहिये अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तरा- काशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति । (छान्दोग्य ८।१।१) अब इस ब्रह्मपुर (शरीर) के भीतर जो सूक्ष्म र स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है और उसके भीतर जो (ब्रह्म) है, उसको ढूँढ़ना चाहिये और उसीकी विशेष जानकारी प्राप्त करनी चाहिये।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथर्ववेदीय सूर्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आदित्यकी सर्वव्यापकता, सूर्यमन्त्रके जपका माहात्म्य

हरिः ॐ । अब सूर्यदेवतासम्बन्धी अथर्ववेदीय मन्त्रोंकी व्याख्या करेंगे । इस सूर्यदेवसम्बन्धी अथर्वाङ्गिरस मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। आदित्य देवता हैं। 'हंसः' 'सोऽहं' अग्नि नारायणयुक्त बीज है। हृल्लेखा शक्ति है। वियत् आदि सृष्टिसे संयुक्त कीलक है । और चारों प्रकारके पुरुषार्थों- की सिद्धिमें इस मन्त्रका विनियोग किया जाता है। छः स्वरोंपर आरूढ बीजके साथ, छः अङ्गोंवाले, लालकमलपर स्थित, सात घोड़ोंवाले रथपर सवार, हिरण्यवर्ण, चतुर्भुज तथा चारो हाथोंमें क्रमशः दो कमल तथा वर और अभय मुद्रा धारण किये, कालचक्रके प्रणेता सूर्यनारायणको जो इस प्रकार जानता है, निश्चयपूर्वक वही ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) है। 'जो प्रणवके अर्थभूत सच्चिदानन्दमय तथा भूः, भुवः और स्वःरूपसे त्रिभुवनमय हैं, सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले उन भगवान् सूर्यदेवके सर्वश्रेष्ठ तेजका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरणा देते रहते हैं।' भगवान् सूर्यनारायण सम्पूर्ण जङ्गम तथा स्थावर जगत्के आत्मा हैं; निश्चयपूर्वक सूर्यनारायणसे ही ये भूत उत्पन्न होते हैं। सूर्यसे यज्ञ, मेघ, अन्न (बल-वीर्य) और आत्मा (चेतना) का आविर्भाव होता है। हे आदित्य ! तुम- को हमारा नमस्कार है। तुम्हीं प्रत्यक्ष कर्म-कर्ता हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष विष्णु हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष रुद्र हो। तुम्हीं प्रत्यक्ष ऋग्वेद हो। तुम्हीं प्रत्यक्ष यजुर्वेद हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष सामवेद हो। तुम्हीं प्रत्यक्ष अथर्ववेद हो। तुम्हीं ┈┈ छन्दःस्वरूप हो। आदित्यसे वायु उत्पन्न होता है। आदित्यसे भूमि उत्पन्न होती है, आदित्यसे जल उत्पन्न होता है। आदित्यसे ज्योति (अग्नि) उत्पन्न होती है। आदित्यसे आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं। आदित्यसे देवता उत्पन्न होते हैं। आदित्यसे वेद उत्पन्न होते हैं। निश्चय ही ये आदित्य देवता ही इस ब्रह्माण्ड मण्डलको तपाते (गर्मी देते) हैं। वे आदित्य ब्रह्म हैं। आदित्य ही अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्काररूप हैं। आदित्य ही प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँचों प्राणोंके रूपमे विराजते हैं। आदित्य ही श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण—इन पाँच इन्द्रियोंके रूपमें कार्य कर रहे हैं। आदित्य ही वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—ये पाँचों कर्मेन्द्रिय भी हैं। आदित्य ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये ज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय हैं। आदित्य ही वचन, आदान, गमन, मल त्याग और आनन्द—ये कर्मेन्द्रियोंके पाँच विषय बन रहे हैं। आनन्द- मय, ज्ञानमय और विज्ञानमय आदित्य ही हैं। मित्रदेवता तथा सूर्यदेवको नमस्कार । प्रभो ! मृत्युसे मेरी रक्षा करो। दीप्तिमान् तथा विश्वके कारणरूप सूर्यनारायणको नमस्कार है। सूर्यसे सम्पूर्ण चराचर जीव उत्पन्न होते हैं, सूर्यके द्वारा ही उनका पालन होता है, और फिर सूर्यमें ही वे लयको प्राप्त होते हैं। जो सूर्यनारायण हैं, वह मैं ही हूँ। सविता देवता हमारे नेत्र हैं तथा पर्वके द्वारा पुण्यकालका आख्यान करनेके कारण जो पर्वतनामसे प्रसिद्ध हैं, वे सूर्य ही हमारे चक्षु हैं। सबको धारण करनेवाले धाता नामसे

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८५ प्रसिद्ध वे आदित्यदेव हमारे नेत्रोंको दृष्टिशक्ति प्रदान करके धारण करें। '(श्रीसूर्यगायत्री) 'हम भगवान् आदित्यको जानते हैं— पूजते हैं; हम सहस्र (अनन्त) किरणोंसे मण्डित भगवान् सूर्य- नारायणका ध्यान करते हैं; वे सूर्यदेव हमें प्रेरणा प्रदान करें।'* पीछे सविता देवता हैं, आगे सविता देवता हैं, उत्तर-मार्गमें भी सविता देवता हैं, और दक्षिण मार्गमें भी (तथा ऊपर-नीचे भी) सविता देवता हैं। सविता देवता हमारे लिये सब कुछ प्रसव करें (सभी अभीष्ट वस्तुएँ दें)। सविता देवता हमें दीर्घ आयु प्रदान करें। 'ॐ' यह एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि.' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है, 'सूर्य' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है। 'आदित्य' इस मन्त्रमें तीन अक्षर हैं। इन सबको मिलाकर सूर्यनारायणका अष्टाक्षर महामन्त्र—'ॐ घृणि. सूर्य आदित्योम्' बनता है। यही अथर्वाङ्गिरस सूर्यमन्त्र है। इस मन्त्रका जो प्रतिदिन जप करता है, वही ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) होता है, वही ब्राह्मण होता है। सूर्यनारायणकी ओर मुख करके जपनेसे महाव्याधिके भयसे मुक्त हो जाता है। उसका दारिद्रय नष्ट हो जाता है। सारे दोषों—पापोंसे वह मुक्त हो जाता है। मध्याह्न- में सूर्यकी ओर मुख करके इसका जप करे। यों करनेसे मनुष्य सद्यःउत्पन्न पञ्च महापातकोंसे छूट जाता है। यह सावित्री विद्या है, इसकी कहीं कुछ भी प्रशंसा न करे। जो महाभाग इसका प्रातः पाठ करता है, वह भाग्यवान् हो जाता है, उसे गौ आदि पशु प्राप्त होते हैं, वेदार्थ-ज्ञानकी प्राप्ति होती है। तीनों काल इसका जप करनेसे सैकड़ों यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो सूर्यदेवताके हस्त नक्षत्रपर रहते समय (अर्थात् आश्विन मासमे) इसका जप करता है, वह महामृत्यु- से तर जाता है, जो इस प्रकारसे जानता है, वह भी महामृत्यु- से तर जाता है। ॥ अथर्ववेदीय सूर्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! जगतकी दुःखमयता और आनन्दमयता अज्ञस्य दुःखौघमयं ज्ञस्यानन्दमयं जगत् । अन्धं भुवनमन्धस्य प्रकाशं तु सुचक्षुषाम् ॥ (वराहोपनिषद् २२) जैसे अन्धेके लिये जगत् अन्धकारमय है और अच्छी आँखोंवालेके लिये प्रकाशमय है, वैसे ही अज्ञानी (जगत्‌को भगवान्‌से रहित विषयमय देखनेवाले) के लिये जगत् दुःखोंका समूहमय है और ज्ञानी (समस्त जगत्‌में भगवान्‌से पूर्ण देखनेवाले) के लिये आनन्दमय है।
  • 'आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि। तन्न सूर्य प्रचोदयात्।'

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अक्ष्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड नेत्ररोगहरी विद्या कथा है कि एक समय भगवान् सांकृति आदित्यलोकको पधारे । वहाँ सूर्यनारायणको प्रणाम करके उन्होंने चाक्षुष्मती विद्याके द्वारा उनकी स्तुति की । ॐ चक्षु-इन्द्रियके प्रकाशक भगवान् श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार है । ॐ आकाशमें विचरण करनेवाले सूर्यनारायणको नमस्कार है। ॐ महासेन ( सहस्रों किरणोंकी भारी सेना साथ रखनेवाले ) श्रीसूर्य- नारायणको नमस्कार है। ॐ तमोगुणरूपमें भगवान् सूर्य- नारायणको नमस्कार है । ॐ रजोगुणरूपमें भगवान् सूर्य- नारायणको नमस्कार है । ॐ सत्त्वगुणके रूपमें भगवान् श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार है। ॐ हे भगवन् ! मुझे असत्से सत्‌की ओर ले चलिये, मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले चलिये, मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले चलिये । भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं, और वे अप्रतिरूप भी हैं—उनके रूपकी कहीं भी तुलना नहीं है। जो अखिल रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा रश्मिमालाओंसे मण्डित हैं, उन जातवेदा (सर्वज्ञ) स्वर्णसदृश प्रकाशवाले ज्योतिःस्वरूप और तपनेवाले भगवान् भास्करको हम स्मरण करते हैं। ये सहस्रों किरणोंवाले और शत शत प्रकारसे वर्तमान भगवान् सूर्यनारायण समस्त प्राणियोंके समक्ष उदित हो रहे हैं। जो हमारे नेत्रोंके प्रकाश हैं, उन अदिति- नन्दन भगवान् श्रीसूर्यको नमस्कार है। दिनका भार वहन करनेवाले विश्ववाहक सूर्यदेवके प्रति हमारा सब कुछ सादर समर्पित है। इस प्रकार चाक्षुष्मती विद्याके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् सूर्यनारायण अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले—'जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको आँख- का रोग नहीं होता, उसके कुलमें अन्धे नहीं होते । आठ ब्राह्मणों- को इसका ग्रहण करा देनेपर इस विद्याकी सिद्धि होती है। जो इस प्रकार जानता है, वह महान् हो जाता है ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड ब्रह्मविद्याका उपदेश तदनन्तर सांकृति मुनिने सूर्यनारायणसे कहा, 'भगवन् ! मेरे लिये ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये ।' उनसे भगवान् आदित्य बोले—'सांकृति ! सुनो, तुमसे अत्यन्त दुर्लभ तत्त्व ज्ञानका वर्णन करता हूँ, जिसके विज्ञानमात्रसे तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे । सबको एक, अज, शान्त, अनन्त, ध्रुव, अन्यय तथा तत्त्वत चैतन्यरूप देखते हुए तुम शान्ति और सुखसे रहो । असवेदन अर्थात् आत्मा अथवा परमात्माके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुका भान न हो—ऐसी स्थितिको ही योग मानते हैं; यही वास्तविक चित्तक्षय है । अतएव योगस्थ होकर कर्मोंको करो; नीरस अर्थात् विरक्त होकर कर्म मत करो । अब असवेदनरूपी योगकी प्रथम भूमिका बतलाते हैं— योगमें प्रवृत्त होनेपर अन्त:करण प्रतिदिन वासनाओंसे विरक्त होता जाता है और नित्यप्रति उदार कर्मोंमें संलग्न होता और उन्हींमें प्रसन्नताका अनुभव करता है । मूर्ख मनुष्योंकी ग्राम्य-चेष्टाओं ( अश्लील विषयभोगकी प्रवृत्तियों ) से वह सदा घृणा करता है। किसीकी छिपी हुई मार्मिक बातोंको

खण्ड २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८७

दूसरोंपर प्रकट नहीं करता । परंतु सदा पुण्यकर्मोंका ही सेवन करता रहता है और जिनके द्वारा किसी प्राणीको उद्वेग न हो, ऐसे मृदु ( दया और उदारतासे पूर्ण ) सौम्य कर्मोंका सेवन करता है। निरन्तर पापसे डरता है और भोगकी आकाङ्क्षा नहीं करता। वह ऐसे वचन बोलता है, जिनमें स्नेह और प्रेम भरा हो, मृदुल और उचित हों तथा देश-कालके अनुकूल हों । मन, वचन और कर्मसे वह सज्जन पुरुषोंका सङ्ग करता है और जहाँ कहींसे भी सग्रह करके नित्य सत्-शास्त्रोंका अनुशीलन करता है। ऐसी स्थिति आनेपर वह प्रथम भूमिका- को प्राप्त होता है। संसार-सागरको पार करनेके लिये जो इस प्रकारके विचारोंमें संलग्न रहता है, वह भूमिकावान् कहलाता है और दूसरे 'आर्य' कहलाते हैं। जो योगकी विचार नाम- की दूसरी भूमिकाको प्राप्त होता है, उसके लक्षण ये हैं—॥ १-१० ॥ वह ऐसे श्रेष्ठ विद्वानोंका आश्रय लेता है जो श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा और ध्यानकी उत्तम व्याख्या करनेके कारण अधिक विख्यात हों। वह पद और पदार्थोंके विभागको ठीक ठीक जानता है और श्रवण करनेयोग्य शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेनेके कारण कर्तव्य-अकर्तव्यके निर्णयको ठीक उसी प्रकार जानता है, जैसे घरका स्वामी घरके पदार्थोंको जानता है। मद, अभिमान, मत्सरता (डाह), लोभ और मोहकी अधिकता उसके मनमें रहती नहीं, किंतु बाह्य आचरणमे भी जो थोड़ी-बहुत इन दोषोंकी स्थिति देखी जाती है, उसको भी वह उसी भाँति त्याग देता है, जैसे साँप केंचुलको। ऐसी बुद्धिवाला साधक शास्त्र, गुरु और संतजनोंकी सेवाके द्वारा रहस्यपूर्वक सारी बातोंको यथावत् जान लेता है॥११-१४॥ इसके बाद वह असंसर्गा नामकी तीसरी योगभूमिकामें प्रवेश करता है—ठीक वैसे ही, जैसे एक सुन्दर पुरुष स्वच्छ पुष्प-शय्यापर आरूढ होता है। शास्त्रोंके वाक्य जिस अर्थको प्रकट करते हैं, उसमे विधिपूर्वक अपनी निश्चल बुद्धिको लगाकर (शास्त्रोके वचनोंपर पूर्ण श्रद्धा रखकर), तपस्वियोंके आश्रममें रहकर तथा अध्यात्मशास्त्रकी चर्चा करते हुए वह पत्थरकी शय्यापर आसीन होकर अपनी विस्तृत आयु व्यतीत करता है । वह नीतिज्ञ पुरुष चित्तको शान्ति प्रदान करनेके कारण अधिक भानेवाले वनभूमि-विहार ( वनके स्थानोंमें भ्रमण ) द्वारा विषयोंमें अनासक्त हो स्वाभाविक सुख-सौख्यका उपभोग करता हुआ अपना समय विताता है। सत्-शास्त्रोंके अभ्याससे तथा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जीवकी यह यथार्थ वस्तुदृष्टि निर्मल होती है। इस तृतीय भूमिकाको प्राप्त करके वह स्वयं बुद्ध (ज्ञानी) होकर अनुभव करता है ॥ १५-१९ ॥ असंसर्ग दो प्रकारका होता है, उसके इस भेदको सुनो। यह असंसर्ग सामान्य और श्रेष्ठ—दो प्रकारका है। मै न तो कर्ता हूँ न भोक्ता हूँ, न बाध्य हूँ और न बाधक ही हूँ— इस प्रकार विषयोंमें आसक्त न होनेका भाव ही सामान्य असंसर्ग कहलाता है। सब कुछ पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके फल-रूपमें उपस्थित है, अथवा सब कुछ ईश्वराधीन है, अतएव सुख हो या दुःख, इसमे मेरा कर्तृत्व ही क्या है। भोगोंका विस्तार (अधिक संग्रह) महारोग है; सब प्रकारकी सम्पदाएँ परम आपदाएँ हैं। सारे संयोग एक दिन वियोगके लिये ही हैं, आधियाँ (मानसिक चिन्ताएँ) अज्ञानियोंके लिये व्याधिरूप हैं। समस्त पदार्थोंको काल निरन्तर अपना ग्रास बनानेमे लगा है, अतएव सारे पदार्थ अस्थायी है,—इस प्रकार शास्त्रोंके वचनोंको समझनेसे सर्वत्र अनास्था हो जानेके कारण जो मनमें उनके अभावकी भावना होती है, उसे सामान्य असंसर्ग कहते हैं। इस प्रकार क्रमशः महात्माओके सत्सङ्गसे 'मै कर्ता नहीं हूँ, ईश्वर कर्ता है अथवा-मेरे पुराकृत कर्म ही कर्ता हैं' ऐसा निश्चय करके सब प्रकारकी चिन्ताओं तथा शब्द-अर्थकी भावनाको भी अत्यन्त दूर कर देनेके पश्चात् जो मौन (मन इन्द्रियोंका पूर्ण सयम), आसन (आन्तरिक स्थिति) और शान्तभाव (बाह्य भावोका विस्मरण) हो जाता है—वह श्रेष्ठ असंसर्ग कहलाता है ॥ २०-२६ ॥ सतोष और आनन्दमयी होनेसे मधुर प्रतीत होनेवाली पहली भूमिका इस प्रकार उदय होती है, मानो वह अन्त.करण की भूमिमे उगा हुआ अमृतका छोटा-सा अङ्कुर हो। इस भूमिकाके उदित होनेके पश्चात् अन्तःकरणमे अन्य भूमिकाओके प्रकट होनेके लिये एक भूमि (क्षेत्र) हो जाती है। उसके बाद साधक क्रमशः द्वितीय और तृतीय भूमिकाओंको भी प्राप्त कर लेता है। इनमे यह तीसरी भूमिका ही सर्वश्रेष्ठ होती है, क्योकि इसमे पुरुष सम्पूर्ण सङ्कल्पात्मक वृत्तियोंना त्याग कर देता है। इन तीनों भूमिकाओके अभ्याससे अज्ञानके क्षीण होनेपर चतुर्थी भूमिकाको प्राप्त हुए साधक सर्वत्र समभावसे देखते हैं। उस समय अद्वैतभाव दृढ होकर द्वैतभावकी शान्ति हो जाती है, इससे चौथी भूमिकामर पहुँचे हुए साधक इस लोकको स्वप्नवत् देखते हैं । पहली तीनो भूमिकाएँ जाग्रत्-स्वरूपा हैं तथा यह चौथी भूमिका स्वप्न कहलाती है ॥ २७-३२ ॥

६८८ * अक्ष्युपनिषद् * [ खण्ड २ पाँचवीं भूमिकाको प्राप्त होनेपर साधकका चित्त शरत्- विदेहमुक्तिकी अवस्था ही सातवीं भूमिका बतायी गयी है। कालके मेघखण्डोंके समान आकाशमे विलीन हो जाता है, यह भूमिका परम शान्त एव वाणीके द्वारा अगम्य है। यही और केवल सत्तामात्र अवशिष्ट रहता है। इसमे चित्तके विलीन सब भूमिकाओंकी अन्तिम सीमा है, यहाँ योगकी सारी भूमिकाएँ हो जानेके कारण सासारिक विकल्पोंका उदय ही नहीं होता। समाप्त हो जाती हे। लोकाचारका अनुगमन करना छोड़कर, सुषुप्तपद नामकी इस पाँचवीं भूमिकाके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण देहाचारका अनुमरण छोड़कर तथा शास्त्रानुगमनको त्यागकर विशेषाश (भेद) शान्त हो जाते हैं, और साधक केवल अपने अध्यासको दूर करो। विश्व, प्राज्ञ और तैजस आदि- (निर्विशेष) अद्वैत स्थितिमें आ जाता है। द्वैतका आभास रूप समस्त जगत् 'ॐकार' मात्र है, क्योंकि वाच्य और नष्ट हो जाता है और आत्मज्ञानसे सम्पन्न प्रसन्न साधक पाँचवीं वाचकमे भेद नहीं होता (ॐकार वाचक है और परमात्मरूप भूमिकामें पहुँचकर सुषुप्तघन (आनन्दमयी) स्थितिमें ही सम्पूर्ण विश्व वाच्य है)। भेदमे इसकी उपलब्धि नहीं होती। रहता है। वह बाहरके व्यवहार करता हुआ भी सदा अन्तर्मुख प्रणवकी पहली मात्रा अकार ही 'विश्व' है, उकार 'तैजस' ही रहता है और सदा परिश्रान्त होकर निद्रा लेनेवालेके है और मकार 'प्राज्ञ' स्वरूप है--ऐसा क्रमशः अनुभव समान दिखलायी देता है। इस भूमिकामें अभ्यास करता हुआ करे। समाधिकालसे पूर्व ही अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चिन्तन वह वासना रहित होकर क्रमशः तुर्या नामकी छठी भूमिशामे करके स्थूल और सूक्ष्मके क्रमसे सबको चिदात्मामें विलीन कर पदार्पण करता है। जहाँ न सत् है न असत् है, न अहङ्कार है दे। चिदात्माको अपना स्वरूप समझे। मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, न अनहङ्कार है, उस विशुद्ध अद्वैतावस्थामे वह अत्यन्त निर्भय मुक्त, सत्तामात्र, अद्वय परमानन्द-सन्दोहमय एव वासुदेव- होकर मननात्मक वृत्तिसे रहित हो जाता है। उसके हृदयकी स्वरूप ॐकार हूँ-ऐसी दृढ भावना करे। क्योंकि यह सारा ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं, संदेह शान्त हो जाते हैं, वह प्रपञ्च आदि, मध्य और अन्तमें केवल दुःखमय ही है, जीवन्मुक्त होकर भावाशून्य हो जाता है और निर्वाणको न अतएव हे अनघ ! सबको छोड़कर तत्त्वनिष्ठ बनो। मैं प्राप्त होनेपर भी निर्वाणको प्राप्त हुआ-सा हो जाता है। उस अविद्यारूपी अन्धकारसे परे, सब प्रकारके आभाससे रहित, समय वह चित्रलिखित दीपककी भाँति निश्चेष्ट रहता है। इस आनन्दस्वरूप, निर्मल, शुद्ध, मन और वाणीकी पहुँचके परे, छठी भूमिकामें स्थित होनेके पश्चात् वह सातवीं भूमिकाको प्रज्ञानघन और आनन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ-इस प्रकारकी भावना प्राप्त होता है ॥ ३३-४० ॥ करनी चाहिये। यह उपनिषद् है ॥ ४१-४९ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अक्ष्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! परमात्माका चिन्तन करो निद्राया लोकवार्त्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥ (अध्यात्मोपनिषद् ५) नींद, लोकचर्चा, इन्द्रियोंके शब्दादि विषय और आत्मविस्मृति (परमात्माका स्मरण न करना) इन (चारों) को कहीं तनिक-सा भी अवसर न देकर मनसे निरन्तर आत्मा (परमात्मा) का चिन्तन करो।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

अब नेत्र-रोगका हरण करनेवाली पाठमात्रसे सिद्ध ॐ (भगवान्का नाम लेकर कहे )। हे चक्षुके अभिमानी होनेवाली चाक्षुषी विद्याकी व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त सूर्यदेव ! आप चक्षुमे चक्षुके तेजरूपसे स्थिर हो जायें । मेरी नेत्ररोगोंका सम्पूर्णतया नाश हो जाता है और नेत्र तेजयुक्त हो रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आँखके रोगोंका शीघ्र शमन करें, जाते हैं । उस चाक्षुषी विद्याके ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री शमन करें । मुझे अपना सुवर्ण-जैसा तेज दिखला दें, दिखला छन्द है, सूर्यभगवान् देवता हैं, नेत्ररोगकी निवृत्तिके लिये दें । जिससे में अंधा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, इसका जप होता है—यह विनियोग है *। उपाय करें । मेरा कल्याण करें, कल्याण करें । दर्शन-शक्तिका चाक्षुषी विद्या अवरोध करनेवाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको ॐ चक्षु चक्षुः चक्षु. तेजः स्थिरो भव । मा पाहि जड़से उखाड़ दे, जड़से उखाड़ दें । ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) पाहि । त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय । मम जातेरूपं नेत्रोंको तेज प्रदान करनेवाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्करको तेजो दर्शय दर्शय । यथाहम् अन्धो न स्या तथा कल्पय नमस्कार है । ॐ करुणाकर अमृतस्वरूपको नमस्कार है । कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि ॐ सूर्यभगवान्‌को नमस्कार है । ॐ नेत्रोंके प्रकाश भगवान् चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय । सूर्यदेवको नमस्कार है । ॐ आकाशविहारीको नमस्कार है । ॐ नम चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नम परम श्रेष्ठस्वरूपको नमस्कार है । ॐ ( सबमें क्रिया-शक्ति करुणाकरायामृताय । ॐ नम. सूर्याय । ॐ नमो भगवते उत्पन्न करनेवाले ) रजोगुणरूप सूर्यभगवान्‌को नमस्कार है । सूर्यायाक्षितेजसे नम. । खेचराय नम. । महते नम. । रजसे ( अन्धकारको सर्वथा अपने अदर समा लेनेवाले ) तमोगुणके नम.। तमसे नम.। असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। आश्रयभूत भगवान् सूर्यको नमस्कार है । हे भगवन् ! मुझको मृत्योर्मा अमृत गमय। उष्णो भगवान्छुचिरूपः। हंसो भगवान् असत्‌से सत्‌की ओर ले चलिये । अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले शुचिरप्रतिरूप । य इमा चाक्षुष्मतीविद्या ब्राह्मणो नित्यमधीते चलिये । मृत्युसे अमृतकी ओर ले चलिये । उष्णस्वरूप भगवान् न तस्याक्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । सूर्य शुचिरूप हैं । हंसरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति ॥ हैं—उनके तेजोमय स्वरूपकी समता करनेवाला कोई नहीं है । जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको नेत्रसम्बन्धी कोई रोग नहीं होता । उसके कुलमे कोई

  • तस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषि, गायत्री छन्द , सूर्यो देवता, चक्षूरोगनिवृत्तये विनियोग । उ० अं० ८१-

६९० * चाक्षुषोपनिषद् * अन्धा नहीं होता। आठ ब्राह्मणोंको इस विद्याका दान ॐ षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न भगवान् आदित्यको करनेपर—इसका ग्रहण करा देनेपर इस विद्याकी सिद्धि नमस्कार है। उनकी प्रभा दिनका भार वहन करनेवाली है, होती है।८ दिनका भार वहन करनेवाली है। हम उन भगवान्‌के लिये जो सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेधा अत्यन्त प्रिय है, वे जो किरणोंसे सुशोभित एवं जातवेदा (भूत आदि तीनों ऋषिगण उत्तम पत्तोंवाले पक्षीके रूपमें भगवान् सूर्यके पास कालोंकी बातको जाननेवाले) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे—'भगवन् ! इस (सुवर्णके समान कान्तिमान्) पुरुषके रूपमें तप रहे हैं; इस अन्धकारको छिपा दीजिये, हमारे नेत्रोंको प्रकाशसे पूर्ण सम्पूर्ण विश्वके जो एकमात्र उत्पत्तिस्थान हैं, उन प्रचण्ड कीजिये तथा तमोमय बन्धनमें बँधे हुए से हम सब प्राणियोंको प्रतापवाले भगवान् सूर्यको हम नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्षको समस्त प्रजाओ (प्राणियों) के समक्ष उदित हो रहे हैं। नमस्कार है। पुष्करेक्षणको नमस्कार है। निर्मल नेत्रोंवाले— ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी अमलेक्षणको नमस्कार है। कमलेक्षणको नमस्कार है। विश्व- स्वाहा। रूपको नमस्कार है। महाविष्णुको नमस्कार है।' ॥ कृष्णयजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् समाप्त ॥ ❖ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ❖ ॐ चाक्षुषी (नेत्र)-उपनिषद्की शीघ्र फल देनेवाली विधि— (लेखक—पं० श्रीमुकुन्दवल्लभजी मिश्र, ज्योतिषाचार्य) नेत्ररोगसे पीड़ित श्रद्धालु साधकको चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी) से अनारकी शाखाकी कलमके द्वारा काँसेके पात्रमें निम्नलिखित बत्तीसे यन्त्रको लिखे— +------+------+------+------+ फिर उसी यन्त्रपर ताँबेकी कटोरीमें चतुर्मुख (चारों ओर चार बत्तियोंका) घीका दीपक | ८ | १५ | २ | ७ | जलाकर रख दे। तदनन्तर गन्ध-पुष्पादिसे यन्त्रका पूजन करे। फिर पूर्वकी ओर मुख करके बैठे और +------+------+------+------+ हरिद्रा (हल्दी) की मालासे ॐ ह्रीं हंस' इस बीजमन्त्रकी ६ मालाएँ जपकर नेत्रोपनिषद्के | ६ | ३ | १२ | ११ | कम-से-कम बारह पाठ करे। पाठके पश्चात् फिर उपर्युक्त बीजमन्त्रकी ५ मालाएँ जपे। तदनन्तर +------+------+------+------+ सूर्यभगवान्‌को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर प्रणाम करे और मनमें यह निश्चय करे कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही | १४ | ९ | ८ | १ | नष्ट हो जायगा। +------+------+------+------+ ऐसा करते रहनेसे इस उपनिषद्का नेत्ररोगनाशक अद्भुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखनेमें | ४ | ५ | १० | १३ | आता है। +------+------+------+------+ 'मम चक्षूरोगान् शमय शमय' १. 'पुण्डरीकाक्ष', 'पुष्करेक्षण' और 'कमलेक्षण'—इन तीनों नामोंका एक ही अर्थ है—कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रा णो नि द् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् नारायणकी सर्वकारणता एवं सर्वरूपता, अष्टाक्षर नारायण-मन्त्रका स्वरूप और महिमा

ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके अत्र नारायणोप- निषद् आरम्भ किया जाता है । निश्चय ही, भगवान् नारायण सबके शरीरोंमें शयन करनेवाले अन्तर्यामी आत्मा हैं । उन्होंने संकल्प किया—'मैं जीवोंकी सृष्टि करूँ ।' अतः उन्हींसे सबकी उत्पत्ति हुई है । नारायणसे ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न होता है, उन्हींसे मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ प्रकट होती हैं। आकाश, वायु, तेज, जल तथा सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वी—इन सबकी नारायणसे ही उत्पत्ति होती है। नारायणसे ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं। नारायणसे शिवजी प्रकट होते हैं। नारायणसे इन्द्रका जन्म होता है। नारायणसे प्रजापति उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही बारह आदित्य प्रकट हुए हैं। ग्यारह रुद्र, आठ वसु और सम्पूर्ण छन्द (वेद) नारायणसे ही उत्पन्न होते हैं, नारायणसे ही प्रेरित होकर अपने-अपने कार्यमें प्रवृत्त होते हैं और नारायणमें ही लीन हो जाते हैं। यह ऋग्वेदीय उपनिषद्का कथन है ॥ १ ॥ भगवान् नारायण नित्य हैं । ब्रह्मा नारायण हैं । शिव भी नारायण हैं। इन्द्र भी नारायण हैं । काल भी नारायण हैं । दिशाएँ भी नारायण हैं । विदिशाएँ (दिशाओंके बीचके कोण) भी नारायण हैं । ऊपर भी नारायण हैं। नीचे भी नारायण हैं । भीतर और बाहर भी नारायण हैं । जो कुछ हो चुका है तथा जो कुछ हो रहा है और होनेवाला है, यह सब भगवान् नारायण ही हैं । एकमात्र नारायण ही निष्कलङ्क, निरञ्जन, निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एव विशुद्ध देव हैं; उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है । जो इस प्रकार जानता है, वह विष्णु ही हो जाता है, वह विष्णु ही हो जाता है । यह यजुर्वेदीय उपनिषद्का प्रतिपादन है ॥ २ ॥ सबसे पहले 'ॐ' इस अक्षरका उच्चारण करे, इसके बाद 'नम ' पदका, फिर अन्तमें 'नारायणाय' इस पदका उच्चारण करे । 'ॐ' यह एक अक्षर है । 'नमः' ये दो अक्षर हैं । 'नारायणाय' ये पाँच अक्षर हैं। यह 'ॐ नमो नारायणाय' पद भगवान् नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र है । निश्चय ही, जो मनुष्य भगवान् नारायणके इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करता है, वह उत्तम कीर्तिसे युक्त हो पूरी आयुतक जीवित रहता है । जीवोंका आधिपत्य, धनकी वृद्धि, गौ आदि पशुओंका स्वामित्व—ये सब भी उसे प्राप्त होते हैं । तदनन्तर वह अमृतत्वको प्राप्त होता है, अमृतत्वको प्राप्त होता है (अर्थात् भगवान् नारायणके अमृतमय परमधाममें जाकर परमानन्दका अनुभव करता है)। यह सामवेदीय उपनिषद्का कथन है॥ ३ ॥ आन्तरिक आनन्दमय ब्रह्मपुरुष प्रणवस्वरूप है, 'अ' 'उ' 'म्'—ये उसकी मात्राएँ हैं। ये अनेक हैं, इनका ही सम्मिलित रूप 'ॐ' इस प्रकार हुआ है । इस प्रणवका जप करके योगी जन्म-मृत्युरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रकी उपासना करनेवाला साधक वैकुण्ठधाममें जायगा । वह यह वैकुण्ठधाम विज्ञानघन