भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 729, कुल 832 में से

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पृष्ठ 729
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७५ योगी जिससे मार्ग देखता है, अर्थात् मनके द्वारा जिस- जिस स्थानको उसमें प्रवेश करके गमन करनेयोग्य मानता है, प्राण उसी मार्ग (द्वार) से मनके साथ गमन करता है। अतएव प्राण श्रेष्ठ मार्गसे जाय, इसके लिये नित्य अभ्यास करना चाहिये। हृदयद्वार ही वायुके प्रवेशका द्वार है। इसी हृदय- द्वारसे प्राण सुषुम्णामार्गमें प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्व- गमनका मार्ग है। सबसे ऊपर इस सुषुम्णामार्गमें मोक्षका द्वार (जिस मार्गसे प्राणोत्सर्ग होनेपर योगी मोक्ष प्राप्त करता है) ब्रह्मरन्ध्र है। इसीको योगी सूर्यमण्डल जानते है। (इसी सूर्यमण्डल या ब्रह्मरन्ध्रको वेधकर प्राण छोड़नेसे मुक्ति होती है) ॥ २५-२६ ॥ भय, क्रोध, आलस्य, अत्यन्त निद्रा, अधिक जागना, बहुत भोजन करना और सर्वथा निराहार रहना—इनको योगी सर्वदा छोड़ दे। इस विधिसे भली प्रकार जो क्रमशः (उत्तरोत्तर बढाता हुआ) नित्य अभ्यास करता है, उसे तीन महीनोंमें स्वयं ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है— इसमें सन्देह नहीं। चार महीनोंमें वह देवताओंको देखने लगता है, पाँच महीनोंमें देवताओंके समान शक्तिशाली हो जाता है और नि सन्देह छः महीनोमे यदि उसकी इच्छा हो तो वह कैवल्य (जीवन्मुक्तावस्था) को प्राप्त कर लेता है।। २७-२९।। पृथिवीतत्त्वकी धारणाके समय प्रणवकी पाँच मात्राओंका, जल- तत्त्वकी धारणाके समय चार मात्राओंका, अग्नितत्त्वकी धारणाके समय तीन मात्राओंका, वायुतत्त्वकी धारणाके समय दो मात्राओं- का, आकाशतत्त्वकी धारणाके समय एक मात्रा का और स्वयं प्रणव- के रूपमें उसके अर्धमात्रास्वरूपका चिन्तन करे। अपने शरीरमें ही मनके द्वारा (पैरसे मस्तकटक क्रमश. पृथिवी आदिकी) धारणा करके पञ्चभूतोंकी सिद्धि करके उनका चिन्तन करे। इस प्रकार प्रणव-धारणाद्वारा पञ्चभूतोंपर अधिकार प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥ तीस अगुल लबा प्राण (श्वास) जिसमें प्रतिष्ठित है, वही इस प्राणवायुका अधिष्ठान (आश्रय) वास्तविक प्राण है। यही 'प्राण' नामसे विख्यात है। जो बाह्य प्राण है, वह तो इन्द्रियगोचर है, इस बाह्य प्राणमे एक लाख तेरह हजार छः सौ अस्सी निःश्वास (श्वास प्रश्वास) एक दिन-रात्रिमें आते हैं ॥ ३२-३३ ॥ आदि प्राण हृदयस्थानमे, अपान गुदास्थानमें, समान नाभिदेशमें तथा उदानं कण्ठमें निवास करता है। व्यान सम्पूर्ण अङ्गोंमें सर्वदा व्यापक होकर रहता है। अब क्रमशः प्राणादि पाँचों वायुओका रग वर्णन किया जाता है। प्राणवायु लाल रगकी मणिके समान कहा जाता है। अपान-वायु गुदाके मध्यमे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ेके समान लाल है। नाभिके मध्यभागमे समानवायु गायके दूधके समान अथवा स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। उदानवायु धूसर (मटमैले) और व्यान-वायु अग्नि-शिखाके रगका अर्थात् प्रकाशमय है ॥ ३४-३७ ॥ जिसका प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-स्थान, वायु-स्थान एव हृदयादि द्वारों) को वेधकर मस्तकमें चला जाता है, वह जहाँ-कहीं भी मरे, फिर जन्म नहीं लेता। वह फिर जन्म नहीं लेता ॥ ३८ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अमृतनादोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भीतर-बाहर नारायण ही व्याप्त हैं यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥ ( नारायणोप० ) जो कुछ जगत् देखने या सुननेमें आता है, उस सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके नारायण स्थित हैं।
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