भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

६७४ * अमृतनादोपनिषद् * ॐ तपः, ॐ सत्यम्-इस प्रकार) व्याहृतियों तथा प्रणव- सहित सम्पूर्ण गायत्री मन्त्रका (ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् इस) शिरोभागके साथ पूरक, कुम्भक और रेचक करते समय जब तीन-तीन बार मानस-पाठ करे, तब उसे एक 'प्राणायाम' कहते हैं ॥ ७-१० ॥ प्राणवायुको आकाशमें निकालकर हृदयको वायुशून्य एव चिन्तनशून्य करके शून्यभावमें मनको लगा दे; यह रेचक प्राणायामका लक्षण है। जैसे मनुष्य मुखसे कमल नालद्वारा धीरे-धीरे जलको खींचता है, उसी प्रकार धीरे-धीरे वायुको अपने भीतर ग्रहण करना चाहिये-यह पूरकका लक्षण है। न तो श्वासको भीतर खींचे, न बाहर ही निकाले और न शरीरको हिलाये ही-इस प्रकार प्राणवायुका निरोध करे; यह कुम्भक प्राणायामका लक्षण है ॥ ११-१३ ॥ रूपोंको अंधेके समान देखे, शब्दको बहरेके समान सुने तथा शरीरको लकड़ीके समान समझे। अर्थात् रूप, शब्द तथा शरीरके सुख दुःखादिसे तनिक भी प्रभावित न हो । यह 'प्रशान्त' का लक्षण है। बुद्धिमान् पुरुष मनको सकल्पात्मक (सङ्कल्पस्वरूप) समझकर उसे आत्मामे (बुद्धिमें) विलीन कर दे तथा उस बुद्धिको भी परमात्म- चिन्तनमे स्थापित करे-लगाये। इसीको 'धारणा' कहा गया है। शास्त्रोंके अनुकूल ऊहा (युक्तिपूर्वक विचार) 'तर्क' कहा जाता है और जिसे प्राप्त करके दूसरे समस्त प्राप्तव्योंका अपमान कर देता है-सबको तुच्छ समझ लेता है, उस स्थितिको 'समाधि' कहा जाता है ॥ १४-१६ ॥ भूमिके समान एव रमणीय तथा (अशुद्धता, विषमता, कीटादियुक्तता प्रभृति) सम्पूर्ण दोषोंसे रहित भागमें मानसिक रक्षा (दिग्बन्धादि) करके और मण्डल (यदेतन्मण्डल तपति---इत्यादि मण्डल ब्राह्मण) का जप करके पद्मासन, स्वस्तिकासन अथवा भद्रासनमेंसे किमी योगासनको भली प्रकार लगाकर उत्तरकी ओर मुख करके बैठे। फिर एक अँगुलीसे नासिकाके एक छिद्रको बद करके दूसरे खुले छिद्रसे वायुको खींचकर, दोनों नासापुटोंको बदकर उस वायुको धारण करे। उस समय तेजोमय शब्द (प्रणव) का ही चिन्तन करे। वह शब्द 'ॐकार' स्वरूप एकाक्षर ब्रह्म ही है। फिर इसी 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका ही चिन्तन करता हुआ रेचक करे-वायुको धीरे-धीरे छोड़े। इस प्रकार अनेकों बार इस प्रणवस्वरूप दिव्य-मन्त्रके द्वारा (प्राणायाम करते हुए) अपने चित्तके मलको दूर करे ॥ १७-२० ॥ इस प्रकार प्राणायामद्वारा पापराशिका नाश करके पहले बताये हुए (अकार, उकार, मकार, बिन्दु तथा नादरूप) प्रणव-मन्त्रका ध्यान करे अर्थात् प्रणवकी प्रत्येक मात्राके साथ उसके लोक, गुण एव अधिदेवताका चिन्तन करते हुए प्राणायाम करे। इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामको स्थूलाति- स्थूल मात्रा*से अधिक कभी न करे। अपनी दृष्टिको तिर्यक् (सामनेकी ओर), ऊपरकी ओर अथवा नीचेकी ओर स्थिर करके महामति (परम बुद्धिमान्) साधक स्थिरतापूर्वक स्थित होकर, निष्कम्प (अङ्गचालनहीन) रहकर तब योगका अभ्यास करे ॥ २१-२२ ॥ यह योग तालवृक्षके समान कुछ समयमे फल देनेवाला है और इसका धारण नियत योजनापूर्वक (अर्थात् जितना प्रथम प्रारम्भ करे, उसे उतना ही रक्खे या बढाता जाय; पर न तो घटाये और न मध्यमे उसका विराम करे-इस प्रकार) करनेयोग्य है। इसमे द्वादश मात्राओकी (प्रणवकी अ, उ, म तथा नादरूप चारों मात्राओंकी तीनों प्राणायामोंमे) आवृत्ति भी कालसे निश्चित कही गयी है। अर्थात् एक मात्राके लिये जितना समय दिया जाय, दूसरीके लिये भी उतना ही समय देना चाहिये। कोई मात्रा शीघ्र एवं कोई देरतक मनमे न जपी जाय ॥ २३ ॥ यह प्रणव नामक घोष बाह्य प्रयत्नसे उच्चारित होनेवाला नहीं है। यह व्यञ्जन नहीं है। स्वर भी नहीं है। कण्ठ, तालु, ओष्ठ और नासिकासे उच्चारित होनेवाला (सानुनासिक) भी नहीं है। यह रेफजातीय (अर्थात् मूर्द्धासे उच्चारित होनेवाला भी) नहीं है। दोनों ओष्ठोंके भीतर स्थित दन्तनामक स्थानसे भी इसका उच्चारण नहीं हो सकता। यह वह अक्षर है, जो कभी क्षरित (च्युत) नहीं होता अर्थात् यह नादके अव्यक्त- रूपसे नित्य प्रकृतिमे विद्यमान रहता है। कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रणवका प्राणायामके रूपमें तो उपर्युक्त प्रकारसे समयादि- सयमसे अभ्यास करना चाहिये और निरन्तर नादके रूपमें मनको उसमें लगाये रहना चाहिये ॥ २४ ॥

  • एक समय इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामकी अस्सी आवृत्तियोंको 'स्थूल मात्रा' कहते हैं। एक बार वायु रोककर अस्सी बार प्रणवके जप करनेको 'अतिस्थूलमात्रा' प्राणायाम कहते हैं और ऐसे प्राणायामकी अस्सी बार आवृत्ति 'स्थूलातिस्थूलमात्रा' प्राणायाम है। इससे अधिक प्राण रोकना या अधिक आवृत्ति करना हानिकर है। प्राणायाम प्रात, मध्याह्न, साय एव अर्धरात्रिमैं---इस प्रकार चार बार नित्य करना चाहिये।