कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 740, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अक्ष्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड नेत्ररोगहरी विद्या कथा है कि एक समय भगवान् सांकृति आदित्यलोकको पधारे । वहाँ सूर्यनारायणको प्रणाम करके उन्होंने चाक्षुष्मती विद्याके द्वारा उनकी स्तुति की । ॐ चक्षु-इन्द्रियके प्रकाशक भगवान् श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार है । ॐ आकाशमें विचरण करनेवाले सूर्यनारायणको नमस्कार है। ॐ महासेन ( सहस्रों किरणोंकी भारी सेना साथ रखनेवाले ) श्रीसूर्य- नारायणको नमस्कार है। ॐ तमोगुणरूपमें भगवान् सूर्य- नारायणको नमस्कार है । ॐ रजोगुणरूपमें भगवान् सूर्य- नारायणको नमस्कार है । ॐ सत्त्वगुणके रूपमें भगवान् श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार है। ॐ हे भगवन् ! मुझे असत्से सत्की ओर ले चलिये, मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले चलिये, मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले चलिये । भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं, और वे अप्रतिरूप भी हैं—उनके रूपकी कहीं भी तुलना नहीं है। जो अखिल रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा रश्मिमालाओंसे मण्डित हैं, उन जातवेदा (सर्वज्ञ) स्वर्णसदृश प्रकाशवाले ज्योतिःस्वरूप और तपनेवाले भगवान् भास्करको हम स्मरण करते हैं। ये सहस्रों किरणोंवाले और शत शत प्रकारसे वर्तमान भगवान् सूर्यनारायण समस्त प्राणियोंके समक्ष उदित हो रहे हैं। जो हमारे नेत्रोंके प्रकाश हैं, उन अदिति- नन्दन भगवान् श्रीसूर्यको नमस्कार है। दिनका भार वहन करनेवाले विश्ववाहक सूर्यदेवके प्रति हमारा सब कुछ सादर समर्पित है। इस प्रकार चाक्षुष्मती विद्याके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् सूर्यनारायण अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले—'जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको आँख- का रोग नहीं होता, उसके कुलमें अन्धे नहीं होते । आठ ब्राह्मणों- को इसका ग्रहण करा देनेपर इस विद्याकी सिद्धि होती है। जो इस प्रकार जानता है, वह महान् हो जाता है ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड ब्रह्मविद्याका उपदेश तदनन्तर सांकृति मुनिने सूर्यनारायणसे कहा, 'भगवन् ! मेरे लिये ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये ।' उनसे भगवान् आदित्य बोले—'सांकृति ! सुनो, तुमसे अत्यन्त दुर्लभ तत्त्व ज्ञानका वर्णन करता हूँ, जिसके विज्ञानमात्रसे तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे । सबको एक, अज, शान्त, अनन्त, ध्रुव, अन्यय तथा तत्त्वत चैतन्यरूप देखते हुए तुम शान्ति और सुखसे रहो । असवेदन अर्थात् आत्मा अथवा परमात्माके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुका भान न हो—ऐसी स्थितिको ही योग मानते हैं; यही वास्तविक चित्तक्षय है । अतएव योगस्थ होकर कर्मोंको करो; नीरस अर्थात् विरक्त होकर कर्म मत करो । अब असवेदनरूपी योगकी प्रथम भूमिका बतलाते हैं— योगमें प्रवृत्त होनेपर अन्त:करण प्रतिदिन वासनाओंसे विरक्त होता जाता है और नित्यप्रति उदार कर्मोंमें संलग्न होता और उन्हींमें प्रसन्नताका अनुभव करता है । मूर्ख मनुष्योंकी ग्राम्य-चेष्टाओं ( अश्लील विषयभोगकी प्रवृत्तियों ) से वह सदा घृणा करता है। किसीकी छिपी हुई मार्मिक बातोंको