भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 741

खण्ड २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८७

दूसरोंपर प्रकट नहीं करता । परंतु सदा पुण्यकर्मोंका ही सेवन करता रहता है और जिनके द्वारा किसी प्राणीको उद्वेग न हो, ऐसे मृदु ( दया और उदारतासे पूर्ण ) सौम्य कर्मोंका सेवन करता है। निरन्तर पापसे डरता है और भोगकी आकाङ्क्षा नहीं करता। वह ऐसे वचन बोलता है, जिनमें स्नेह और प्रेम भरा हो, मृदुल और उचित हों तथा देश-कालके अनुकूल हों । मन, वचन और कर्मसे वह सज्जन पुरुषोंका सङ्ग करता है और जहाँ कहींसे भी सग्रह करके नित्य सत्-शास्त्रोंका अनुशीलन करता है। ऐसी स्थिति आनेपर वह प्रथम भूमिका- को प्राप्त होता है। संसार-सागरको पार करनेके लिये जो इस प्रकारके विचारोंमें संलग्न रहता है, वह भूमिकावान् कहलाता है और दूसरे 'आर्य' कहलाते हैं। जो योगकी विचार नाम- की दूसरी भूमिकाको प्राप्त होता है, उसके लक्षण ये हैं—॥ १-१० ॥ वह ऐसे श्रेष्ठ विद्वानोंका आश्रय लेता है जो श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा और ध्यानकी उत्तम व्याख्या करनेके कारण अधिक विख्यात हों। वह पद और पदार्थोंके विभागको ठीक ठीक जानता है और श्रवण करनेयोग्य शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेनेके कारण कर्तव्य-अकर्तव्यके निर्णयको ठीक उसी प्रकार जानता है, जैसे घरका स्वामी घरके पदार्थोंको जानता है। मद, अभिमान, मत्सरता (डाह), लोभ और मोहकी अधिकता उसके मनमें रहती नहीं, किंतु बाह्य आचरणमे भी जो थोड़ी-बहुत इन दोषोंकी स्थिति देखी जाती है, उसको भी वह उसी भाँति त्याग देता है, जैसे साँप केंचुलको। ऐसी बुद्धिवाला साधक शास्त्र, गुरु और संतजनोंकी सेवाके द्वारा रहस्यपूर्वक सारी बातोंको यथावत् जान लेता है॥११-१४॥ इसके बाद वह असंसर्गा नामकी तीसरी योगभूमिकामें प्रवेश करता है—ठीक वैसे ही, जैसे एक सुन्दर पुरुष स्वच्छ पुष्प-शय्यापर आरूढ होता है। शास्त्रोंके वाक्य जिस अर्थको प्रकट करते हैं, उसमे विधिपूर्वक अपनी निश्चल बुद्धिको लगाकर (शास्त्रोके वचनोंपर पूर्ण श्रद्धा रखकर), तपस्वियोंके आश्रममें रहकर तथा अध्यात्मशास्त्रकी चर्चा करते हुए वह पत्थरकी शय्यापर आसीन होकर अपनी विस्तृत आयु व्यतीत करता है । वह नीतिज्ञ पुरुष चित्तको शान्ति प्रदान करनेके कारण अधिक भानेवाले वनभूमि-विहार ( वनके स्थानोंमें भ्रमण ) द्वारा विषयोंमें अनासक्त हो स्वाभाविक सुख-सौख्यका उपभोग करता हुआ अपना समय विताता है। सत्-शास्त्रोंके अभ्याससे तथा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जीवकी यह यथार्थ वस्तुदृष्टि निर्मल होती है। इस तृतीय भूमिकाको प्राप्त करके वह स्वयं बुद्ध (ज्ञानी) होकर अनुभव करता है ॥ १५-१९ ॥ असंसर्ग दो प्रकारका होता है, उसके इस भेदको सुनो। यह असंसर्ग सामान्य और श्रेष्ठ—दो प्रकारका है। मै न तो कर्ता हूँ न भोक्ता हूँ, न बाध्य हूँ और न बाधक ही हूँ— इस प्रकार विषयोंमें आसक्त न होनेका भाव ही सामान्य असंसर्ग कहलाता है। सब कुछ पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके फल-रूपमें उपस्थित है, अथवा सब कुछ ईश्वराधीन है, अतएव सुख हो या दुःख, इसमे मेरा कर्तृत्व ही क्या है। भोगोंका विस्तार (अधिक संग्रह) महारोग है; सब प्रकारकी सम्पदाएँ परम आपदाएँ हैं। सारे संयोग एक दिन वियोगके लिये ही हैं, आधियाँ (मानसिक चिन्ताएँ) अज्ञानियोंके लिये व्याधिरूप हैं। समस्त पदार्थोंको काल निरन्तर अपना ग्रास बनानेमे लगा है, अतएव सारे पदार्थ अस्थायी है,—इस प्रकार शास्त्रोंके वचनोंको समझनेसे सर्वत्र अनास्था हो जानेके कारण जो मनमें उनके अभावकी भावना होती है, उसे सामान्य असंसर्ग कहते हैं। इस प्रकार क्रमशः महात्माओके सत्सङ्गसे 'मै कर्ता नहीं हूँ, ईश्वर कर्ता है अथवा-मेरे पुराकृत कर्म ही कर्ता हैं' ऐसा निश्चय करके सब प्रकारकी चिन्ताओं तथा शब्द-अर्थकी भावनाको भी अत्यन्त दूर कर देनेके पश्चात् जो मौन (मन इन्द्रियोंका पूर्ण सयम), आसन (आन्तरिक स्थिति) और शान्तभाव (बाह्य भावोका विस्मरण) हो जाता है—वह श्रेष्ठ असंसर्ग कहलाता है ॥ २०-२६ ॥ सतोष और आनन्दमयी होनेसे मधुर प्रतीत होनेवाली पहली भूमिका इस प्रकार उदय होती है, मानो वह अन्त.करण की भूमिमे उगा हुआ अमृतका छोटा-सा अङ्कुर हो। इस भूमिकाके उदित होनेके पश्चात् अन्तःकरणमे अन्य भूमिकाओके प्रकट होनेके लिये एक भूमि (क्षेत्र) हो जाती है। उसके बाद साधक क्रमशः द्वितीय और तृतीय भूमिकाओंको भी प्राप्त कर लेता है। इनमे यह तीसरी भूमिका ही सर्वश्रेष्ठ होती है, क्योकि इसमे पुरुष सम्पूर्ण सङ्कल्पात्मक वृत्तियोंना त्याग कर देता है। इन तीनों भूमिकाओके अभ्याससे अज्ञानके क्षीण होनेपर चतुर्थी भूमिकाको प्राप्त हुए साधक सर्वत्र समभावसे देखते हैं। उस समय अद्वैतभाव दृढ होकर द्वैतभावकी शान्ति हो जाती है, इससे चौथी भूमिकामर पहुँचे हुए साधक इस लोकको स्वप्नवत् देखते हैं । पहली तीनो भूमिकाएँ जाग्रत्-स्वरूपा हैं तथा यह चौथी भूमिका स्वप्न कहलाती है ॥ २७-३२ ॥