भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 742

६८८ * अक्ष्युपनिषद् * [ खण्ड २ पाँचवीं भूमिकाको प्राप्त होनेपर साधकका चित्त शरत्- विदेहमुक्तिकी अवस्था ही सातवीं भूमिका बतायी गयी है। कालके मेघखण्डोंके समान आकाशमे विलीन हो जाता है, यह भूमिका परम शान्त एव वाणीके द्वारा अगम्य है। यही और केवल सत्तामात्र अवशिष्ट रहता है। इसमे चित्तके विलीन सब भूमिकाओंकी अन्तिम सीमा है, यहाँ योगकी सारी भूमिकाएँ हो जानेके कारण सासारिक विकल्पोंका उदय ही नहीं होता। समाप्त हो जाती हे। लोकाचारका अनुगमन करना छोड़कर, सुषुप्तपद नामकी इस पाँचवीं भूमिकाके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण देहाचारका अनुमरण छोड़कर तथा शास्त्रानुगमनको त्यागकर विशेषाश (भेद) शान्त हो जाते हैं, और साधक केवल अपने अध्यासको दूर करो। विश्व, प्राज्ञ और तैजस आदि- (निर्विशेष) अद्वैत स्थितिमें आ जाता है। द्वैतका आभास रूप समस्त जगत् 'ॐकार' मात्र है, क्योंकि वाच्य और नष्ट हो जाता है और आत्मज्ञानसे सम्पन्न प्रसन्न साधक पाँचवीं वाचकमे भेद नहीं होता (ॐकार वाचक है और परमात्मरूप भूमिकामें पहुँचकर सुषुप्तघन (आनन्दमयी) स्थितिमें ही सम्पूर्ण विश्व वाच्य है)। भेदमे इसकी उपलब्धि नहीं होती। रहता है। वह बाहरके व्यवहार करता हुआ भी सदा अन्तर्मुख प्रणवकी पहली मात्रा अकार ही 'विश्व' है, उकार 'तैजस' ही रहता है और सदा परिश्रान्त होकर निद्रा लेनेवालेके है और मकार 'प्राज्ञ' स्वरूप है--ऐसा क्रमशः अनुभव समान दिखलायी देता है। इस भूमिकामें अभ्यास करता हुआ करे। समाधिकालसे पूर्व ही अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चिन्तन वह वासना रहित होकर क्रमशः तुर्या नामकी छठी भूमिशामे करके स्थूल और सूक्ष्मके क्रमसे सबको चिदात्मामें विलीन कर पदार्पण करता है। जहाँ न सत् है न असत् है, न अहङ्कार है दे। चिदात्माको अपना स्वरूप समझे। मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, न अनहङ्कार है, उस विशुद्ध अद्वैतावस्थामे वह अत्यन्त निर्भय मुक्त, सत्तामात्र, अद्वय परमानन्द-सन्दोहमय एव वासुदेव- होकर मननात्मक वृत्तिसे रहित हो जाता है। उसके हृदयकी स्वरूप ॐकार हूँ-ऐसी दृढ भावना करे। क्योंकि यह सारा ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं, संदेह शान्त हो जाते हैं, वह प्रपञ्च आदि, मध्य और अन्तमें केवल दुःखमय ही है, जीवन्मुक्त होकर भावाशून्य हो जाता है और निर्वाणको न अतएव हे अनघ ! सबको छोड़कर तत्त्वनिष्ठ बनो। मैं प्राप्त होनेपर भी निर्वाणको प्राप्त हुआ-सा हो जाता है। उस अविद्यारूपी अन्धकारसे परे, सब प्रकारके आभाससे रहित, समय वह चित्रलिखित दीपककी भाँति निश्चेष्ट रहता है। इस आनन्दस्वरूप, निर्मल, शुद्ध, मन और वाणीकी पहुँचके परे, छठी भूमिकामें स्थित होनेके पश्चात् वह सातवीं भूमिकाको प्रज्ञानघन और आनन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ-इस प्रकारकी भावना प्राप्त होता है ॥ ३३-४० ॥ करनी चाहिये। यह उपनिषद् है ॥ ४१-४९ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अक्ष्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! परमात्माका चिन्तन करो निद्राया लोकवार्त्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥ (अध्यात्मोपनिषद् ५) नींद, लोकचर्चा, इन्द्रियोंके शब्दादि विषय और आत्मविस्मृति (परमात्माका स्मरण न करना) इन (चारों) को कहीं तनिक-सा भी अवसर न देकर मनसे निरन्तर आत्मा (परमात्मा) का चिन्तन करो।