कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 739, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 739
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८५ प्रसिद्ध वे आदित्यदेव हमारे नेत्रोंको दृष्टिशक्ति प्रदान करके धारण करें। '(श्रीसूर्यगायत्री) 'हम भगवान् आदित्यको जानते हैं— पूजते हैं; हम सहस्र (अनन्त) किरणोंसे मण्डित भगवान् सूर्य- नारायणका ध्यान करते हैं; वे सूर्यदेव हमें प्रेरणा प्रदान करें।'* पीछे सविता देवता हैं, आगे सविता देवता हैं, उत्तर-मार्गमें भी सविता देवता हैं, और दक्षिण मार्गमें भी (तथा ऊपर-नीचे भी) सविता देवता हैं। सविता देवता हमारे लिये सब कुछ प्रसव करें (सभी अभीष्ट वस्तुएँ दें)। सविता देवता हमें दीर्घ आयु प्रदान करें। 'ॐ' यह एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि.' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है, 'सूर्य' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है। 'आदित्य' इस मन्त्रमें तीन अक्षर हैं। इन सबको मिलाकर सूर्यनारायणका अष्टाक्षर महामन्त्र—'ॐ घृणि. सूर्य आदित्योम्' बनता है। यही अथर्वाङ्गिरस सूर्यमन्त्र है। इस मन्त्रका जो प्रतिदिन जप करता है, वही ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) होता है, वही ब्राह्मण होता है। सूर्यनारायणकी ओर मुख करके जपनेसे महाव्याधिके भयसे मुक्त हो जाता है। उसका दारिद्रय नष्ट हो जाता है। सारे दोषों—पापोंसे वह मुक्त हो जाता है। मध्याह्न- में सूर्यकी ओर मुख करके इसका जप करे। यों करनेसे मनुष्य सद्यःउत्पन्न पञ्च महापातकोंसे छूट जाता है। यह सावित्री विद्या है, इसकी कहीं कुछ भी प्रशंसा न करे। जो महाभाग इसका प्रातः पाठ करता है, वह भाग्यवान् हो जाता है, उसे गौ आदि पशु प्राप्त होते हैं, वेदार्थ-ज्ञानकी प्राप्ति होती है। तीनों काल इसका जप करनेसे सैकड़ों यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो सूर्यदेवताके हस्त नक्षत्रपर रहते समय (अर्थात् आश्विन मासमे) इसका जप करता है, वह महामृत्यु- से तर जाता है, जो इस प्रकारसे जानता है, वह भी महामृत्यु- से तर जाता है। ॥ अथर्ववेदीय सूर्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! जगतकी दुःखमयता और आनन्दमयता अज्ञस्य दुःखौघमयं ज्ञस्यानन्दमयं जगत् । अन्धं भुवनमन्धस्य प्रकाशं तु सुचक्षुषाम् ॥ (वराहोपनिषद् २२) जैसे अन्धेके लिये जगत् अन्धकारमय है और अच्छी आँखोंवालेके लिये प्रकाशमय है, वैसे ही अज्ञानी (जगत्को भगवान्से रहित विषयमय देखनेवाले) के लिये जगत् दुःखोंका समूहमय है और ज्ञानी (समस्त जगत्में भगवान्से पूर्ण देखनेवाले) के लिये आनन्दमय है।
- 'आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि। तन्न सूर्य प्रचोदयात्।'